ट्रंप के ‘स्टोन एज’ अल्टीमेटम को मोजतबा ने कैसे किया डिफ्यूज? ईरान-अमेरिका समझौते की असली कहानी
ट्रंप के ‘स्टोन एज’ अल्टीमेटम को मोजतबा ने कैसे किया डिफ्यूज? ईरान-अमेरिका समझौते की असली कहानी
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव उस समय चरम पर पहुंच गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उसने अमेरिकी शर्तें नहीं मानीं तो उसे “स्टोन एज” में पहुंचा दिया जाएगा। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी और आशंका जताई जाने लगी कि दोनों देशों के बीच बड़ा सैन्य संघर्ष हो सकता है।
इस तनावपूर्ण माहौल के बीच ईरान की सत्ता में अहम भूमिका निभा रहे ने ऐसा दांव चला, जिसने हालात को अचानक बदल दिया। जहां पहले ईरान का रुख सख्त और टकराव वाला माना जा रहा था, वहीं मोजतबा ने बातचीत का रास्ता खोलते हुए एक रणनीतिक नरमी दिखाई।
बताया जाता है कि मोजतबा खामेनेई ने पर्दे के पीछे कूटनीतिक कोशिशें तेज कीं और मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका तक यह संदेश पहुंचाया कि ईरान बातचीत के लिए तैयार है। इस पहल ने दोनों देशों के बीच सीधे टकराव को टालने में अहम भूमिका निभाई। इससे अमेरिका को भी बिना पीछे हटे बातचीत की दिशा में बढ़ने का अवसर मिला।
आखिरकार, दोनों देशों के बीच एक अस्थायी समझौता हुआ, जिसके तहत सीमित अवधि के लिए सीजफायर लागू करने पर सहमति बनी। ईरान ने रणनीतिक समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खुला रखने का भरोसा दिया, जबकि अमेरिका ने बड़े सैन्य हमलों को रोकने का फैसला किया।
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर ने इसे अपनी बड़ी जीत बताया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यह दरअसल एक संतुलित कूटनीतिक समाधान था, जिसमें दोनों पक्षों ने टकराव से बचने के लिए लचीला रुख अपनाया।
यह घटनाक्रम साफ दिखाता है कि जहां एक ओर आक्रामक बयानबाजी ने दबाव बनाया, वहीं दूसरी ओर शांत और रणनीतिक कूटनीति ने संकट को टाल दिया। हालांकि, यह समझौता अभी अस्थायी माना जा रहा है और भविष्य में तनाव दोबारा बढ़ सकता है, लेकिन फिलहाल इसने दुनिया को एक बड़े युद्ध के खतरे से जरूर बचा लिया है।