120 साल पुरानी ऐतिहासिक रामलीला, पांचवीं पीढ़ी संभाल रही कमान:मुरादाबाद में 1900 में लाला घनश्याम दास ने रखी थी लाइनपार रामलीला की नींव
मुरादाबाद में लाइनपार स्थित श्री रामलीला ग्राउंड पर पिछले 120 से अधिक वर्षों से ऐतिहासिक रामलीला का मंचन बड़ी धूमधाम से किया जा रहा है। श्रीराम लीला मैनेजिंग कमेटी (रजि०) के सह कोषाध्यक्ष संदीप बंसल ने कमेटी के गौरवशाली इतिहास की जानकारी साझा करते हुए बताया कि लगभग 1900 के दशक से शुरू हुई यह रामलीला आज भी एक ही परिवार की पांचवीं पीढ़ी द्वारा पूरी निष्ठा के साथ संचालित की जा रही है, जिसमें हर साल 3 से 4 लाख श्रद्धालु भगवान के दर्शन कर धर्मलाभ उठाते हैं। लाइनपार के श्री रामलीला ग्राउंड पर होने वाली पारंपरिक रामलीला का इतिहास बेहद गौरवशाली है। श्रीराम लीला मैनेजिंग कमेटी के सह कोषाध्यक्ष संदीप बंसल द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस भव्य रामलीला मंचन का शुभारंभ लगभग 1900 के दशक में ला० स्व० घनश्याम दास जी (पहलवान) द्वारा अपने बहनोई साहु स्व० नन्दकिशोर जी जमींदार के संरक्षण में किया गया था। शुरुआत में यह लीला हुल्का देवी मन्दिर और कपूर कम्पनी के पास होती थी, लेकिन जगह छोटी पड़ने के कारण जमींदारों के अथक प्रयासों से मझोला ढक्का कुन्दनपुर में जमीन ली गई थी। जोकि अब श्री राम लीला ग्राउंड के नाम से जानी जाती है। वर्ष 1945 में इस कमेटी का पंजीकरण सोसाइटी एक्ट के तहत 'श्रीरामलीला मैनेजिंग कमेटी' के नाम से कराया गया। इस ऐतिहासिक स्थल पर प्राचीन नन्द द्वार, अशोक वाटिका, पंचवटी मन्दिर, लंका, पैवेलियन और कुआं जैसी संरचनाएं आज भी मौजूद हैं, जिनकी देखरेख कमेटी के चौकीदारों द्वारा की जाती है। सह कोषाध्यक्ष संदीप बंसल ने बताया कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस रामलीला का सफल संचालन एक ही परिवार के सदस्यों द्वारा किया जा रहा है। *पहली पीढ़ी:* ला० स्व० घनश्याम दास (पहलवान) और साहु स्व० नन्दकिशोर जी जमींदार। *दूसरी पीढ़ी:* नन्दकिशोर के ज्येष्ठ पुत्र साहु सूरज प्रकाश (मंत्री/मैनेजर) और उनके बाद उनके छोटे भाई साहु जगत प्रकाश। *तीसरी पीढ़ी:* साहु सूरज प्रकाश के ज्येष्ठ पुत्र ओम प्रकाश गुप्ता। *चौथी पीढ़ी:* ओम प्रकाश गुप्ता के ज्येष्ठ पुत्र राजीव प्रकाश बंसल। *पांचवीं पीढ़ी (वर्तमान):* राजीव प्रकाश के उपरान्त वर्तमान में मयंक बंसल इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं। कमेटी के पदाधिकारियों के अनुसार, यह पांचवीं पीढ़ी आज भी उपरोक्त क्रम में इस ऐतिहासिक और धार्मिक कार्य को बेहद सुचारू रूप से निभा रही है और भविष्य में भी इस परंपरा को इसी तरह जीवित रखा जाएगा।
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