यूसीसी क्या है? शादी, तलाक और विरासत के नियम कैसे बदलेंगे
समान नागरिक संहिता विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और अन्य व्यक्तिगत मामलों के लिए समान कानूनी व्यवस्था से जुड़ा विषय है। संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। उत्तराखंड में यह लागू है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश के विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रतीक्षा में हैं।
दि राइजिंग न्यूज | नई दिल्ली | 18 सितंबर 2026
समान नागरिक संहिता को लेकर एक बार फिर देश में चर्चा तेज है। केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन शासित राज्यों में इसे लागू करने की बात कही गई है। इस बीच यह समझना जरूरी है कि समान नागरिक संहिता वास्तव में क्या है, संविधान में इसका आधार क्या है और इसे लेकर अलग-अलग पक्षों की क्या दलीलें हैं।
समान नागरिक संहिता आखिर है क्या
समान नागरिक संहिता का अर्थ ऐसे समान नागरिक कानून से है, जिसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और कुछ अन्य पारिवारिक मामलों के लिए धर्म के आधार पर अलग-अलग नियमों के बजाय समान कानूनी प्रावधान लागू किए जाएं। अभी भारत में व्यक्तिगत मामलों से जुड़े कई विषय अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों और प्रथाओं से संचालित होते हैं। हालांकि आपराधिक कानून जैसे कई प्रमुख क्षेत्रों में पूरे देश के लिए समान केंद्रीय कानून पहले से मौजूद हैं।समान नागरिक संहिता का उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों के क्षेत्र में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। इसके समर्थक इसे समान नागरिक अधिकारों से जोड़ते हैं, जबकि इसके आलोचक भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता तथा परंपरागत कानूनों पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाते हैं। इसलिए यूसीसी की बहस केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक विविधता से भी जुड़ी हुई है।
संविधान में यूसीसी का क्या आधार है
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। यह प्रावधान संविधान के राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है। इसका अर्थ यह है कि यह सरकार के लिए एक संवैधानिक दिशा-निर्देश है, लेकिन मौलिक अधिकारों की तरह सीधे अदालत में लागू कराने योग्य अधिकार नहीं है।दूसरी ओर संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 29 नागरिकों के सांस्कृतिक हितों की रक्षा से संबंधित है। इसी वजह से यूसीसी पर बहस में समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता जैसे संवैधानिक पहलू एक साथ सामने आते हैं। किसी भी प्रस्तावित कानून को संविधान के अन्य प्रावधानों और न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहना होगा।
अभी व्यक्तिगत कानूनों की स्थिति क्या है
भारत में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और कुछ पारिवारिक मामलों के लिए अलग-अलग समुदायों पर अलग कानून या परंपरागत नियम लागू होते रहे हैं। हिंदू समुदाय के लिए हिंदू विवाह अधिनियम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे कानून हैं। ईसाई और पारसी समुदायों के लिए भी अलग व्यक्तिगत कानून मौजूद हैं, जबकि मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के लिए 1937 का मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू करने संबंधी कानून महत्वपूर्ण आधार है।इसके अलावा कई जनजातीय समुदायों की परंपरागत प्रथाओं को भी विशेष संवैधानिक और कानूनी संरक्षण प्राप्त है। इसलिए देश में व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था एक जैसी नहीं है। यूसीसी की प्रस्तावित व्यवस्था इसी अलग-अलग कानूनी ढांचे की जगह एक समान नागरिक व्यवस्था लाने से संबंधित है।
यूसीसी के समर्थन में क्या तर्क दिए जाते हैं
यूसीसी के समर्थकों का मुख्य तर्क है कि नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े कानून धर्म के आधार पर अलग नहीं होने चाहिए। उनका कहना है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और भरण-पोषण जैसे मामलों में समान कानूनी प्रावधान होने से नागरिकों के अधिकारों में एकरूपता आ सकती है। समर्थक विशेष रूप से महिलाओं के समान अधिकारों को यूसीसी के महत्वपूर्ण पहलुओं में गिनाते हैं।समर्थकों का यह भी तर्क है कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की वजह से उत्पन्न कानूनी जटिलताओं को कम किया जा सकता है। उनके अनुसार समान कानून से नागरिकों के बीच कानूनी समानता की भावना मजबूत हो सकती है। हालांकि यूसीसी के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके अंतिम स्वरूप और लागू किए जाने वाले प्रावधानों पर निर्भर करेगा।
यूसीसी का विरोध करने वालों की मुख्य आपत्तियां क्या हैं
यूसीसी के विरोध में सबसे प्रमुख तर्क धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता से जुड़ा है। आलोचकों का कहना है कि अलग-अलग समुदायों की धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को एक ही कानूनी ढांचे में लाने से उनके पारंपरिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसी कारण वे व्यापक सामाजिक और कानूनी विमर्श की मांग करते रहे हैं।आलोचकों का एक अन्य सवाल यह है कि समान कानून बनाने की प्रक्रिया में सभी समुदायों की अलग-अलग परिस्थितियों को किस तरह ध्यान में रखा जाएगा। अनुसूचित जनजातियों को कई राज्यों के यूसीसी कानूनों में बाहर रखा गया है, जिसे लेकर भी बहस हुई है। असम में यूसीसी विधेयक पारित होने के दौरान अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखने और साथ ही व्यक्तिगत संबंधों के पंजीकरण जैसे प्रावधानों पर चर्चा हुई थी।
महिलाओं के अधिकारों से इसका क्या संबंध है
यूसीसी के समर्थक इसे महिलाओं के कानूनी अधिकारों से भी जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे मामलों में सभी महिलाओं के लिए समान प्रावधान होने चाहिए। इससे अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद संभावित असमानताओं को दूर करने का रास्ता खुल सकता है।हालांकि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का रास्ता भी बहस का हिस्सा रहा है। 2018 में 21वें विधि आयोग के परिवार कानून सुधार संबंधी परामर्श पत्र में अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रावधानों में सुधार पर जोर दिया गया था। आयोग ने उस समय कहा था कि उस चरण में समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक थी और न ही वांछनीय।
विधि आयोग ने क्या कहा था
21वें विधि आयोग ने 31 अगस्त 2018 को ‘परिवार कानून में सुधार’ विषय पर परामर्श पत्र जारी किया था। इसमें समान नागरिक संहिता के बजाय विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में ऐसे सुधारों पर चर्चा की गई थी, जिनसे महिलाओं के अधिकार और समानता मजबूत हो सके। इसलिए यह कहना अधिक सही है कि 21वें आयोग ने इस विषय पर परामर्श पत्र दिया था, कोई अंतिम विधि आयोग रिपोर्ट नहीं।इसके बाद 22वें विधि आयोग ने वर्ष 2023 में समान नागरिक संहिता पर आम जनता और धार्मिक संगठनों से सुझाव मांगे थे। लेकिन उसका कार्यकाल 31 अगस्त 2024 को समाप्त हो गया और वह इस विषय पर अंतिम रिपोर्ट तैयार नहीं कर सका। इसके बाद 23वें विधि आयोग का गठन किया गया।
किन राज्यों में यूसीसी की स्थिति क्या है
उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जहां राज्य-विशिष्ट समान नागरिक संहिता लागू हुई। इसे 27 जनवरी 2025 को लागू किया गया था। इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की विधानसभाओं ने भी समान नागरिक संहिता से जुड़े विधेयक पारित किए हैं, लेकिन सितंबर 2026 तक इन तीनों राज्यों के विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी। असम विधानसभा ने मई 2026 में अपना समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया था। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और साथ रहने वाले संबंधों के पंजीकरण से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। राज्य के अनुसूचित जनजाति समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
आगे की राह क्या है
समान नागरिक संहिता को लेकर आगे की प्रक्रिया उसके कानूनी प्रारूप, संवैधानिक परीक्षण और विभिन्न राज्यों में लागू होने वाले प्रावधानों पर निर्भर करेगी। एक तरफ समान नागरिक अधिकारों और लैंगिक समानता का तर्क है, तो दूसरी तरफ धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और पारंपरिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न हैं।इसलिए यूसीसी की बहस को समझने के लिए केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं हैं। संविधान के अनुच्छेद 44, मौलिक अधिकारों, व्यक्तिगत कानूनों और राज्यों में पारित कानूनों के वास्तविक प्रावधानों को साथ देखकर इसकी तस्वीर समझी जा सकती है। फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर एक समान नागरिक संहिता लागू नहीं है और अलग-अलग राज्यों की स्थिति अलग है।
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