1971 में पति शहीद हुए, 1974 में शुरू किया कारोबार:पूर्वांचल की ‘आयरन लेडी’ का मिला था टैग, CM भी कर चुके हैं सम्मानित

Oct 15, 2026 - 06:28
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1971 में पति शहीद हुए, 1974 में शुरू किया कारोबार:पूर्वांचल की ‘आयरन लेडी’ का मिला था टैग, CM भी कर चुके हैं सम्मानित
पति के शहीद होने के बाद दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी अकेले उठाना आसान नहीं था। एक तरफ पति को खोने का दुख था, तो दूसरी तरफ बच्चों के भविष्य की चिंता। लेकिन उर्मिल तुली ने मुश्किलों के आगे हार नहीं मानी। उन्होंने खुद को संभाला, दोनों बेटों को अच्छी शिक्षा दिलाई और गोरखपुर में कारोबार शुरू कर अपनी अलग पहचान बनाई। उस दौर में जब महिलाओं का घर से निकलकर व्यापार करना आसान नहीं था, तब उन्होंने गैस एजेंसी का कारोबार शुरू किया। व्यवसाय में सफलता हासिल करने के साथ ही उन्होंने समाज सेवा को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाया। आज उनकी कहानी कई महिलाओं के लिए हौसले और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। यह कहानी गोरखपुर की पहली महिला उद्यमियों में शामिल उर्मिल तुली की है। वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनके पति मेजर नरेंद्र कुमार तुली शहीद हो गए थे। उस समय उनके बड़े बेटे विवेक की उम्र महज पांच साल और छोटे बेटे विशाल की उम्र ढाई साल थी। इतनी कम उम्र में पिता का साया उठ जाने के बाद दोनों बच्चों की परवरिश से लेकर उनके भविष्य तक की पूरी जिम्मेदारी उर्मिल के कंधों पर आ गई। पति के शहीद होने के बाद खुद को संभाला, बच्चों को बनाया काबिल उर्मिल तुली मूल रूप से बरेली की रहने वाली हैं। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया। शादी के बाद वह अपने पति मेजर नरेंद्र कुमार तुली के साथ चंडीगढ़ में रहने लगी थीं। वर्ष 1971 में युद्ध के दौरान पति के शहीद होने की खबर ने उनकी जिंदगी बदल दी। वह इस दुख से टूट गईं, लेकिन दोनों बेटों के भविष्य के लिए उन्होंने खुद को मजबूत किया। बच्चों की परवरिश और उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाना उनकी पहली प्राथमिकता बन गई। उर्मिल ने अकेले ही दोनों बेटों को संभाला और उन्हें पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा किया। परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ ही उन्होंने आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का फैसला किया। 1974 में शुरू किया कारोबार, महिलाओं के लिए बनीं मिसाल पति की शहादत के बाद उर्मिल तुली ने गोरखपुर में नई शुरुआत की। वर्ष 1974 में उन्हें यहां रसोई गैस एजेंसी मिली। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर मिली इस एजेंसी के साथ उन्होंने अपने नानाजी की मदद से कारोबार शुरू किया। उस समय गोरखपुर में वर्चस्व की लड़ाई और आपराधिक घटनाओं के कारण शहर की छवि अच्छी नहीं थी। ऐसे माहौल में एक महिला के लिए व्यापार की दुनिया में कदम रखना बड़ी चुनौती थी। नई जगह, नए लोग और कारोबार की चुनौतियां होने के बावजूद उर्मिल पीछे नहीं हटीं। उन्होंने अपने आत्मविश्वास और मेहनत के दम पर व्यवसाय को आगे बढ़ाया। धीरे-धीरे उन्होंने व्यापार जगत में अपनी पहचान बनाई। उस दौर में महिलाओं के लिए कारोबार करना असामान्य माना जाता था, लेकिन उर्मिल ने अपने काम से साबित किया कि महिलाएं भी हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकती हैं। उनके साहस और उपलब्धियों के लिए उन्हें ‘आयरन लेडी ऑफ गोरखपुर’ और ‘आयरन लेडी ऑफ पूर्वांचल’ जैसे सम्मान मिले। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। कारोबार के साथ समाज सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य उर्मिल तुली ने कारोबार में सफलता मिलने के बाद भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं भूली। उन्होंने जरूरतमंदों की मदद के लिए कई काम शुरू किए। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर उन्होंने पहल की। एक दुर्घटना में समय पर एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण हुई मौत की घटना ने उन्हें झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने गोरखपुर से सहजनवा के बीच निःशुल्क एंबुलेंस सेवा शुरू की, ताकि जरूरतमंदों को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सके। उनकी इस पहल की तत्कालीन सांसद और वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सराहना की थी। इसके अलावा उन्होंने निःशुल्क मेडिकल कैंप लगवाए और दृष्टिबाधित बच्चों की मदद की। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ऐसे बच्चों, जिनके पिता नहीं हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई के लिए भी वह सहायता करती रही हैं। आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन मेधावी छात्राओं की उच्च शिक्षा का खर्च उठाकर उन्होंने उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया। ‘मां ने हर चुनौती का साहस से सामना किया’ दैनिक भास्कर से बातचीत में उनके बेटे विवेक तुली ने बताया कि वर्ष 1971 में पिता के शहीद होने के बाद उनकी मां ने परिवार की पूरी जिम्मेदारी संभाली। उस समय महिलाओं के लिए बाहर निकलकर व्यवसाय करना काफी मुश्किल था, लेकिन मां ने हिम्मत और साहस से हर चुनौती का सामना किया। उन्होंने बताया कि मां ने न केवल दोनों बेटों को अच्छी शिक्षा दिलाई, बल्कि कई महिलाओं और लड़कियों को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित भी किया। व्यवसाय के साथ-साथ उन्होंने जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लगातार काम किया। दृष्टिबाधित बच्चों की मदद करने से लेकर आर्थिक रूप से कमजोर मेधावी छात्राओं की उच्च शिक्षा का खर्च उठाने तक, मां ने हमेशा जरूरतमंदों का साथ दिया। बेटों और बहुओं के लिए आदर्श हैं उर्मिल उर्मिल तुली के दोनों बेटे विवेक तुली और विशाल तुली आज भी सामाजिक कार्यों में अपनी मां का हाथ बंटाते हैं। उनकी बहुएं मोहनी तुली और श्वेता तुली भी उन्हें आदर्श मानती हैं। वहीं, पोते-पोतियां राशि तुली, सृष्टि तुली, करण तुली और कुनाल तुली के लिए भी वह प्रेरणास्रोत हैं। अब उर्मिल तुली ने समाज सेवा से जुड़े कई कामों की जिम्मेदारी अपने दोनों बेटों को सौंप दी है। दोनों बेटे मां की ओर से शुरू किए गए सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं। उर्मिल फिलहाल अपने दोनों बेटों और परिवार के साथ गोरखपुर में रहती हैं।

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