अपराध के अनुरूप सजा देना न्यायालय का धर्म:ब्लू ड्रम हत्याकांड में DGC केके चौबे बोले- चश्मदीद नहीं साक्ष्यों की कड़ियां जोड़कर दोष साबित किया
मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में अदालत ने मुस्कान और साहिल को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत के इस फैसले के बाद अभियोजन पक्ष के जिला शासकीय अधिवक्ता (DGC) केके चौबे ने इसे न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण फैसला बताया। दैनिक भास्कर से बातचीत में चौबे ने कहा कि इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं था। पुलिस ने घटनाक्रम से जुड़े साक्ष्यों की एक-एक कड़ी जोड़ी और अभियोजन पक्ष ने उन्हें मजबूती से अदालत के सामने रखा। इसी आधार पर दोनों आरोपियों का अपराध साबित हुआ। अपराध के अनुरूप सजा देना न्यायालय का भी धर्म केके चौबे ने कहा, “हमारे द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को पूर्ण और पर्याप्त मानते हुए अदालत ने यह तय किया कि आरोपियों का अपराध सिद्ध होता है। उनका अपराध बहुत क्रूर और जघन्य है। यह अपने आप में विरल प्रकृति का अपराध है, इसलिए इन्हें अधिकतम सजा मृत्युदंड मिलना चाहिए।” उन्होंने बताया कि अदालत में सजा पर बहस के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपराध की प्रकृति और उसके सामाजिक प्रभाव को प्रमुखता से रखा था। चौबे के अनुसार, न्यायालय ने महाभारत के एक उदाहरण का उल्लेख करते हुए अपराध के अनुरूप दंड देने के दायित्व की बात कही। उन्होंने कहा कि अपराध के अनुरूप सजा देना न्यायालय का धर्म है और अदालत ने उसी धर्म का पालन किया है। चौबे ने कहा कि उनकी ओर से इस मामले में जो प्रयास किए गए थे, उनका उद्देश्य आरोपियों को दोषी सिद्ध कराना और उन्हें अपराध के अनुरूप सजा दिलाना था। फैसला आने के बाद उन्हें लगा कि अभियोजन पक्ष की अपेक्षा पूरी हुई है। चश्मदीद नहीं था, साक्ष्यों की कड़ियों ने खोला राज इस केस को चुनौतीपूर्ण बताते हुए केके चौबे ने कहा कि हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था। ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष के सामने घटनाक्रम को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर साबित करने की चुनौती होती है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने मामले से जुड़े तथ्यों और साक्ष्यों की एक-एक कड़ी को सटीक तरीके से जोड़ा। अभियोजन पक्ष ने उन साक्ष्यों को अदालत में व्यवस्थित और मजबूती से प्रस्तुत किया। चौबे के मुताबिक, इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर अदालत के सामने आरोपियों की भूमिका साबित करने का पक्ष रखा गया। इस मामले में पुलिस की ओर से कुल 34 गवाहों की सूची तैयार की गई थी, जबकि अभियोजन पक्ष ने 22 गवाहों को प्रमुख आधार बनाया। चौबे के अनुसार, इन गवाहों में दो की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। दो गवाहों की भूमिका रही अहम अभियोजन पक्ष के मुताबिक, पहले महत्वपूर्ण गवाह ने घटना वाले दिन साहिल को मुस्कान के घर जाते हुए देखा था। इस गवाही को घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया।दूसरे गवाह का संबंध सौरभ राजपूत के फोन पर लगातार की जा रही कॉल से था। चौबे के अनुसार, इस व्यक्ति ने सौरभ के फोन पर संपर्क करने की कोशिश की थी। फोन मुस्कान ने उठाया और कथित तौर पर गलत तरीके से बात करने के बाद काट दिया। अभियोजन पक्ष ने इस घटनाक्रम को इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना कि सौरभ के फोन का इस्तेमाल कर परिवार और अन्य लोगों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही थी। चौबे ने बताया कि अभियोजन पक्ष ने इन गवाहियों समेत अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को अदालत के सामने रखा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरे मामले में सभी प्रासंगिक गवाहियों और साक्ष्यों का महत्व था। ‘इस अपराध के बाद देश में ऐसी घटनाओं की बाढ़ आ गई’ केके चौबे ने बातचीत में इस मामले के सामाजिक प्रभाव का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सौरभ राजपूत हत्याकांड के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों से इस तरह की प्रकृति के अपराधों की खबरें सामने आने लगी थीं। उनके अनुसार, कुछ मामलों में हत्या के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाने की खबरें आईं। चौबे ने कहा, “इस अपराध के होने के बाद हम सबने देखा कि पूरे देश में इस प्रकार की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई थी। किसी ने पहाड़ से धक्का देकर, किसी ने जहरीला करैत सांप छोड़कर और किसी ने हत्या के बाद शव छिपाने जैसे तरीके अपनाए।” उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने यह पक्ष रखा था कि ऐसे अपराधों में ऐसी सजा दी जानी चाहिए, जिससे कानून के प्रति भय पैदा हो और समाज में एक स्पष्ट संदेश जाए। 3 मार्च 2025 को हुई थी सौरभ राजपूत की हत्या अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 3 मार्च 2025 को मुस्कान और साहिल ने मिलकर सौरभ राजपूत की हत्या की। इसके बाद शव को ठिकाने लगाने के लिए पहले उसे एक अटैची में रखने का प्रयास किया गया। जब शव के टुकड़े उसमें फिट नहीं हुए, तो दोनों नीले रंग का ड्रम खरीदकर लाए। आरोप के मुताबिक, शव के टुकड़ों को ड्रम में डालकर उसमें सीमेंट भर दिया गया। इसके बाद दोनों शिमला घूमने चले गए। सौरभ के काफी समय तक लापता रहने पर परिजनों को संदेह हुआ और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। जांच के बाद मुस्कान और साहिल को गिरफ्तार किया गया। धारा 302 और 238 के तहत दोषी ठहराए गए सौरभ राजपूत के परिवार की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह के अनुसार, अदालत ने मुस्कान और साहिल को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 238 के तहत दोषी माना। धारा 302 हत्या से संबंधित है, जबकि धारा 238 अपराध के साक्ष्य को गायब करने या अपराधी को बचाने के इरादे से गलत जानकारी देने से संबंधित है। अदालत ने हत्या के अपराध में दोनों को मृत्युदंड सुनाया। साक्ष्य छिपाने से संबंधित अपराध में भी उन्हें दोषी माना गया।
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