भाजपा ने 40% विधायकों के टिकट काटे, तो बगावत होगी:यूपी में पुराने चेहरे ज्यादा कामयाब रहे, तीसरी बार सत्ता में लौटने की चुनौती
राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने पुराने सांसद रिपीट नहीं किए। सभी 8 चेहरे बदल दिए। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने 32% प्रत्याशियों के टिकट काटे थे। 2027 में जीत की हैट्रिक लगाने और लोगों की नाराजगी दूर करने के लिए भाजपा नए चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी में है। यूपी में गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और असम का पैटर्न अपनाने के संकेत भाजपा से लगातार मिल रहे हैं। इन राज्यों में भाजपा तीन या इससे ज्यादा बार से लगातार सत्ता में वापसी करती रही है। वहां एंटी-इंकंबेंसी से निपटने के लिए बड़ी संख्या में विधायकों के टिकट काटती रही है। भाजपा ने संकेत दिए हैं कि इस बार मौजूदा 40% विधायकों के टिकट कट सकते हैं। इसकी 2 मुख्य वजहें बताई जा रही हैं- सवाल है, एंटी-इंकंबेंसी से बचने के लिए विधायकों के टिकट काटने का यह फॉर्मूला यूपी जैसे जातिगत समीकरण वाले राज्य में कितना सफल होगा? क्या टिकट कटने से विधायक बागी नहीं होंगे? पहले जानिए, विधायकों के टिकट बड़ी संख्या में कटने के 5 संकेत 77% नए चेहरे जीते, 85% पुराने चेहरों ने जीत दर्ज की भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव में कितने विधायकों के टिकट काटेगी? इसे समझने के लिए पहले यूपी भाजपा के ट्रेंड को समझना होगा। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा यूपी में मजबूत हुई थी। इसके 3 साल बाद 2017 में उसने लंबे अरसे के बाद अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। पार्टी के विधायकों की संख्या 312 तक पहुंच गई। 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के पास 47 विधायक थे। चुनाव में पार्टी ने इनमें से 12 के टिकट काट दिए थे, जो करीब 25.53% होता है। 35 विधायकों को फिर से चुनावी मैदान में उतारा था। भाजपा का यह दांव काम कर गया। परिणाम आया, तो बदलाव वाली सभी 12 सीटों पर भाजपा जीतने में सफल रही, यानी इन सीटों पर 100% सफलता मिली। 5 साल की सत्ता के बाद 2022 में भाजपा के सामने दोबारा सरकार बनाने की चुनौती थी। यूपी में पिछले 37 साल से कोई सरकार लगातार दोबारा रिपीट नहीं हुई थी। भाजपा ने एक बार फिर नाराजगी से बचने के लिए 104 मौजूदा विधायकों के टिकट काटे थे। यह लगभग 32% होता है। इनमें से 80 सीटों पर वह फिर से जीत गई। यानी 77% सीटें जीत लीं। वहीं, दोबारा मौका पाए 205 विधायकों में से 175 यानी 85.37% जीतने में सफल रहे। 30 विधायकों को हार का सामना करना पड़ा। यूपी में पिछले दो लोकसभा चुनावों का ट्रेंड- टिकट नहीं काटने से नुकसान हुआ 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी की 80 में से 71 सीटें जीती थीं। 2019 में पार्टी के सामने अपना पुराना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती थी। इस बार भाजपा ने 21 मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए, 4 सांसदों की सीट बदल दी। यानी पार्टी ने करीब 35% सीटों पर अपने उम्मीदवार बदल दिए। इसका फायदा भी मिला। जिन 21 सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे गए थे, उनमें से 14 पर भाजपा जीत गई। वहीं, जिन 4 सांसदों की सीट बदली गई थी, उनमें से 3 भी चुनाव जीतने में सफल रहे। कुल मिलाकर भाजपा ने 2019 में यूपी की 62 सीटें जीतीं। यानी 2014 के मुकाबले सिर्फ 9 सीटों का नुकसान हुआ। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने 62 सांसदों में से 16 के टिकट काटे। इनमें से 11 सीटों पर पार्टी नए उम्मीदवारों के साथ जीतने में सफल रही। इसके अलावा, पिछली बार हारी हुई 4 सीटों पर नए चेहरों को मौका दिया गया। इनमें से 2 सीटों पर भाजपा जीत गई। हालांकि, 2024 में भाजपा ने 2019 के मुकाबले कम सांसदों के टिकट काटे। पार्टी ने 46 मौजूदा सांसदों को दोबारा टिकट दिया। इनमें से 26 चुनाव हार गए। यानी पुराने सांसदों को फिर से मौका देने के बावजूद पार्टी को कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के सामने ऐसी ही चुनौती हो सकती है। खासकर उन विधायकों को लेकर, जो लगातार 10 साल से जीतते आ रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव- भाजपा के लिए सबक वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं- 2024 का लोकसभा चुनाव यूपी भाजपा के लिए सबक हो सकता है। लगातार 10 साल सांसद रहने के बाद भी जब भाजपा ने तीसरी बार प्रत्याशी बनाया, तो उनमें से ज्यादातर हार गए। 2024 के चुनाव में जनता की नाराजगी भाजपा के लिए उतनी नहीं थी, जितनी स्थानीय प्रत्याशियों के खिलाफ थी। इसके बावजूद भाजपा ने उस अनुपात में टिकट नहीं काटे। यही कारण रहा कि भाजपा के केवल 33 सांसद ही जीत सके। इनमें 11 सीटें वे थीं, जहां पार्टी ने टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया था। 2027 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा के सामने यही चुनौती होगी। वर्तमान में भाजपा के 186 विधायक ऐसे हैं, जो दो या उससे ज्यादा कार्यकाल से जीत रहे हैं। जबकि, केवल 69 विधायक पहली बार जीतने वाले हैं। भाजपा के आंतरिक सर्वे और अन्य एजेंसियों के सर्वेक्षणों में यह साफ दिख रहा है कि जनता में विधायकों के प्रति नाराजगी है। जबकि, सरकार और मुख्यमंत्री के कामकाज से लोग संतुष्ट हैं। ऐसे में अगर बड़ी संख्या में चेहरे बदले नहीं गए, तो 2024 जैसे परिणाम देखने को मिल सकते हैं। टिकट कटने पर क्या विधायक बागी होकर नुकसान नहीं पहुंचाएंगे? वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी के अनुसार, यूपी में भाजपा के पास 2 तरह के विधायक हैं- एमएलसी चुनाव में इसका उदाहरण देखा जा चुका है, जहां गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट पर टिकट नहीं मिलने पर डॉ. संजयन त्रिपाठी सपा में चले गए थे। 30-40% विधायकों के टिकट पर चल सकती है कैंची? राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी का मानना है- विधायकों के खिलाफ नाराजगी और मुख्यमंत्री की लोकप्रियता को देखते हुए भाजपा को तीसरे कार्यकाल के लिए कठोर फैसले लेने होंगे। अगर असम, हरियाणा, गुजरात और मध्य प्रदेश के औसतन 30 से 40% टिकट काटने के आंकड़े को यूपी पर लागू किया जाए, तो यह संख्या लगभग 102 विधायकों तक पहुंचती है। 2022 के चुनाव में भी भाजपा ने 104 विधायकों के टिकट काटे थे। जेन-जी का असर साधने के लिए पार्टी की तैयारी लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश वाजपेयी के अनुसार, युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए भाजपा इस बार बड़ी संख्या में युवा चेहरों को मौका दे सकती है। विशेषकर, उन सीटों पर जहां पार्टी पिछली बार हार गई थी। सोर्स बताते हैं कि पार्टी 50 से ज्यादा नए और युवा चेहरों को टिकट दे सकती है। इसके अलावा, मध्य प्रदेश और राजस्थान की तर्ज पर भाजपा अपने हारे हुए लोकसभा प्रत्याशियों या पूर्व सांसदों को भी विधानसभा चुनाव में उतार सकती है। साथ ही, लंबे समय से संगठन में समर्पित कार्यकर्ताओं को भी टिकट दिया जा सकता है। जिन राज्यों में भाजपा तीसरी बार लौटी, वहां सांसद-विधायकों को बदलने का ट्रेंड वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह के अनुसार, वर्तमान में गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, असम और हरियाणा जैसे राज्य भाजपा के मजबूत गढ़ बन चुके हैं। गुजरात में भाजपा 1998 से लगातार सत्ता में है। मध्य प्रदेश में 13 महीने के कांग्रेस शासन को छोड़ दें, तो पार्टी 2003 से सत्ता में है। आइए समझते हैं कि इन राज्यों में एंटी-इंकंबेंसी कम करने के लिए पार्टी ने क्या रणनीति अपनाई थी- ---------------------------- यह खबर भी पढ़ें- राहुल से बिना मिले दिल्ली से लौटे अजय राय, क्या कांग्रेस छोड़ेंगे, अनुप्रिया के साथ सियासी पारी शुरू की तो सीट पर पेंच फंसेगा यूपी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय राय ने शनिवार को वाराणसी के पिंडरा में शक्ति प्रदर्शन किया। वह पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं। इसकी वजह 11 अक्टूबर को लखनऊ के पार्टी मुख्यालय में ममता चौधरी के साथ हुआ विवाद है। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या अजय राय कांग्रेस छोड़ देंगे? अगर पार्टी छोड़ते हैं, तो क्या पुराने दल में वापसी करेंगे या अनुप्रिया पटेल के साथ नई सियासी पारी शुरू करेंगे? पढ़िए पूरी स्टोरी…
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)