CJI बोले- असहमति के साथ सम्मान जरूरी:फैसला देने से पहले सुनें, NLSIU कन्वोकेशन में शामिल, 3 महीने पहले छात्रों ने किया था विरोध
भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने शनिवार को लॉ स्टूडेंट को संबोधित करते हुए कहा कि आप किसी के साथ असहमत हो सकते हैं लेकिन उसकी गरिमा बनाए रखें। कोई भी फैसला देने से पहले सामने वाले को भी सुनें। CJI नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) बेंगलुरु के 34वें एनुअल दीक्षांत समारोह में शामिल हुए थे। CJI ने कहा कि कानूनी शिक्षा सिर्फ अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। छात्रों को अलग-अलग विचारों को समझने और समाज की सेवा करने के लिए तैयार करना भी इसका उद्देश्य होना चाहिए। यूनिवर्सिटी के 700 से ज्यादा मौजूदा और पूर्व छात्रों ने CJI सूर्यकांत और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई थी। इसके चलते 27 अगस्त को यूनिवर्सिटी ने 12 सितंबर को होना वाला दीक्षांत समारोह रद्द कर दिया था। हालांकि, पिछले महीने यूनिवर्सिटी ने दीक्षांत समारोह रद्द करने का अपना फैसला वापस ले लिया। CJI की स्पीच, 2 बड़ी बातें; कहा- प्रोफेशनल लाइफ में शॉर्टकट 1. न्याय के लिए खड़े होने का साहस जरूरी: कानूनी शिक्षा का उद्देश्य केवल आपराधिक या संवैधानिक कानून के सिद्धांतों को सीखना नहीं है। इसका मकसद ऐसे लोगों से संवाद करने का अनुभव हासिल करना भी है, जो दुनिया को हमसे अलग नजरिए से देखते हैं। कानून और न्यायिक फैसलों का ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है। न्याय के लिए खड़े होने का साहस और अनसुनी आवाजों की चिंताओं को सुनने की विनम्रता भी जरूरी है। 2. समाज में योगदान देने की भी जरूरत है: छात्रों को अपने सिद्धांतों से समझौता करने और प्रोफेशनल लाइफ में शॉर्टकट से बचना चाहिए। कानूनी पेशे के जरिए अन्याय को दूर करने, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने और संविधान को बनाए रखने से वकीलों को संतुष्टि मिल सकती है। राष्ट्र हमसे सिर्फ कानून के पेशेवर के तौर पर नहीं, बल्कि समाज में योगदान देने की भी उम्मीद करता है।
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