दंतेश्वरी, बस्तर की लोकशक्ति का रूप:ब्राह्मण नहीं, धाकड़ समाज के पुजारी करते हैं पूजा; दशहरे पर आदिवासी जंगल में छिपाते हैं देवी का रथ

Oct 19, 2026 - 04:34
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दंतेश्वरी, बस्तर की लोकशक्ति का रूप:ब्राह्मण नहीं, धाकड़ समाज के पुजारी करते हैं पूजा; दशहरे पर आदिवासी जंगल में छिपाते हैं देवी का रथ
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में देवी दंतेश्वरी की छह हाथों वाली महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा है। यहां मुख्य पूजा ब्राह्मण नहीं, धाकड़ समाज के जिया परिवार के पुजारी करते हैं। नवरात्रि की पंचमी पर रात में मंदिर के कपाट बंद करके गुप्त पूजा होती है। इसमें देवी को कुम्हड़े की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। यह बस्तर राजपरिवार की कुलदेवी का प्रमुख मंदिर है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां देवी सती का एक दांत गिरा था। इसी कारण देवी को दंतेश्वरी और इस स्थान को दंतेवाड़ा कहा जाता है। मंदिर को शक्तिपीठ माना जाता है। काले पत्थर की छह भुजाओं वाली प्रतिमा, गर्भगृह के बाहर 32 लकड़ी के खंभों पर छत मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर से बनी देवी की छह भुजाओं वाली महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा है। इसका मुख पूर्व दिशा में है। देवी का श्रृंगार वस्त्र, आभूषण और फूलों से किया जाता है। मंदिर के पांच मुख्य हिस्से हैं। गर्भगृह, उसके सामने अंतराल और मुखमंडप पत्थर से बने हैं। इनके आगे मुक्तिमंडप और नाटमंडप हैं। इनकी छत 32 लकड़ी के खंभों पर टिकी है। छत पर मिट्टी की खपरैल लगी है। प्रवेश द्वार के सामने पत्थर का गरुड़ स्तंभ है। नाटमंडप में भैरव का मंदिर भी है। पहले यह मुख्य मंदिर से अलग था। बाद में नाटमंडप को बढ़ाने पर पर भैरव मंदिर भी उसी परिसर में आ गया। मंदिर के गर्भगृह में नजदीक से दर्शन के लिए पुरुष श्रद्धालुओं को धोती पहनने का नियम है। सामान्य पैंट या दूसरे सिले हुए कपड़ों में गर्भगृह के भीतर प्रवेश नहीं मिलता। इसके लिए मंदिर परिसर में धोती उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी रही है। ब्राह्मणों के बजाय जिया परिवार को पूजा का अधिकार, 12 पारंपरिक सेवकों की अलग जिम्मेदारी दंतेश्वरी मंदिर में मुख्य पूजा का अधिकार धाकड़ समाज के जिया परिवार के पास है। इस परिवार के लोग खुद को क्षत्रिय परंपरा से जोड़ते हैं। यह पुजारी पद पीढ़ियों से इन्हीं के परिवार में चला आ रहा है। दंतेश्वरी देवी दुर्गा का रूप हैं। मंदिर में बलि की पुरानी परंपरा के कारण ब्राह्मण पुजारी नहीं रखा जाता। परिवार की धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी ने स्वयं क्षत्रिय पुजारी चुना था। मंदिर की सेवाओं में 12 तरह के पारंपरिक सेवादार हैं। इन सबको बारह लंकवार कहते हैं। इनमें नाईक, समरत, कतयार, गायता, भंडारी, चालकी और दूसरे पद शामिल हैं। हर पद की जिम्मेदारी अलग है। जैसे, भंडारी देवी के सामने चंवर डुलाता है। कतयार और समरत फागुन मड़ई में जानवरों के शिकार से जुड़े पारंपरिक नृत्य की जिम्मेदारी निभाते हैं। इस व्यवस्था के कारण बस्तर के स्थानीय समाज मंदिर की पूजा से सीधे जुड़े हुए हैं। पंचमी की रात बंद कपाट में कुम्हड़े की बलि, कुछ ही लोगों को दिया जाता है प्रसाद दंतेवाड़ा मंदिर में हर साल शारदीय नवरात्रि की पंचमी की रात कपाट बंद करके देवी की गुप्त पूजा होती है। इसमें बाहरी श्रद्धालुओं का प्रवेश नहीं होता। पुजारी दूध, दही और शहद से देवी का अभिषेक करते हैं। फिर नए वस्त्र और फूलों से श्रृंगार कर कुम्हड़े की प्रतीकात्मक बलि देते हैं। प्रसाद भी कुछ तय लोगों को ही मिलता है। इस साल 19 अक्टूबर को महानवमी पर सुबह 8 बजे से चंडीपाठ, हवन, पूर्णाहुति, नौ कन्याओं की पूजा और भंडारा होगा। इसके बाद ज्योति कलशों का विसर्जन होगा। महाअष्टमी: रात को देवी की डोली खमेश्वरी मंदिर जाती है, साल में एक बार खुलता है मंदिर, खंडित प्रतिमा की पूजा होती है बस्तर दशहरे में महाअष्टमी की रात जगदलपुर में निशा जात्रा होती है। इस साल यह रस्म 19 अक्टूबर को है। इसमें पुजारी और राजगुरु देवी की डोली लेकर इतवारी बाजार के पास खमेश्वरी मंदिर पहुंचते हैं। यह स्थानीय देवी का मंदिर है। यह मंदिर साल में केवल इसी अनुष्ठान के लिए खुलता है। यहां देवी की खंडित प्रतिमा की पूजा होती है। मान्यता है कि यहां खमेश्वरी के साथ दंतेश्वरी और माणिकेश्वरी का भी वास है। बाघनपाल के राजपुरोहित परिवार का बनाया भोग मिट्टी के मटकों में कांवड़ से लाया जाता है। पूजा के बाद मंदिर के बाहर बकरों की बलि दी जाती है। मछली और कुम्हड़ा भी चढ़ता है। 1224 के शिलालेख में देवी का नाम माणिकेश्वरी, मंदिर को दान में मिले थे 144 गांव दंतेश्वरी मंदिर का इतिहास बस्तर के चिंदक नागवंशी राजाओं से जुड़ा है। यहां जतनपाल गांव में मिले 1224 ईस्वी के शिलालेख में राजा नरसिंह जगदेक भूषण की आराध्य देवी का नाम माणिकेश्वरी है। भैरमगढ़ के अभिलेख में भी इस नाम का जिक्र है। माणिकेश्वरी को दंतेश्वरी के पुराने स्वरूप से जोड़ा गया है। मंदिर की मूल संरचना 11वीं-12वीं सदी की है। चौदहवीं सदी में वारंगल से आए अन्नमदेव ने इसका जीर्णोद्धार कराया। बाद में बस्तर राजपरिवार ने भी मंदिर का विस्तार कराया। बस्तर के पुराने राजाओं की परंपरा में देवी के दर्शन के अवसर पर मंदिर को गांव दान करने का जिक्र है। ऐसे गांवों से मिलने वाले संसाधन मंदिर की पूजा और व्यवस्थाओं के लिए इस्तेमाल होते थे। 1909 तक मंदिर को दान में मिले गांवों की संख्या 144 हो चुकी थी। आठ पहियों का रथ जंगल में छिपाते हैं आदिवासी, नए धान की खीर खाने के बाद लौटाते हैं बस्तर दशहरे में देवी के लिए पहले 12 पहियों का एक रथ था। बाद में चार पहियों का फूल रथ और आठ पहियों का विजय रथ बनाया जाने लगा। विजय रथ पर देवी का छत्र और तलवार रखकर नगर परिक्रमा होती है। इसे खींचने का अधिकार कोड़ेनार-किलेपाल क्षेत्र के माड़िया आदिवासियों को है। परिक्रमा के बाद रात में वे रथ को तीन किमी दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल में छिपा देते हैं। इस रस्म को भीतर रैनी कहते हैं। अगले दिन राजपरिवार रथ लेने जंगल पहुंचता है। वहां नए धान के चावल और गाय के दूध से खीर बनती है। पहले देवी को भोग लगता है। फिर राजपरिवार ग्रामीणों के साथ खीर खाता है। इसे नवाखाई कहते हैं। इसके बाद आदिवासी रथ वापस जगदलपुर लाते हैं। इस रस्म को बाहर रैनी कहते हैं। इस साल दोनों रस्में 21 और 22 अक्टूबर को निर्धारित हैं।

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