क्या ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त हैं? पिछले 8 सालों में दिवाली के अगले दिन क्या रही एयर क्वालिटी
हरित पटाखों से पारंपरिक पटाखों की तुलना में प्रदूषण कम हो सकता है, लेकिन वे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं हैं। जानिए दिल्ली में वर्ष 2018 से 2025 तक दिवाली के दिन दर्ज वायु गुणवत्ता सूचकांक, पटाखों में इस्तेमाल होने वाले रसायनों और सूक्ष्म कणों से स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान के बारे में।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 14 अक्टूबर 2026
दिवाली के दौरान पटाखों का इस्तेमाल हर साल वायु प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ाता है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में त्योहार के आसपास हवा की गुणवत्ता खराब होने के पीछे पटाखों का धुआं, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और मौसम की परिस्थितियां जैसे कई कारण जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में हरित पटाखों को पारंपरिक पटाखों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या इन पटाखों से वायु प्रदूषण पूरी तरह समाप्त हो जाता है या इनके इस्तेमाल से केवल प्रदूषण की मात्रा कम होती है।सर्वोच्च न्यायालय ने त्योहारों के मौसम से पहले पटाखों के इस्तेमाल और उनके नियमन को लेकर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए इस विषय पर फिर चर्चा तेज हो गई है। हरित पटाखों की तकनीक, उनमें इस्तेमाल होने वाले रसायनों और दिवाली के दौरान वायु गुणवत्ता के आंकड़ों से यह समझने में मदद मिलती है कि प्रदूषण कम करने के प्रयास कितने प्रभावी रहे हैं।
हरित पटाखे क्या होते हैं
हरित पटाखे ऐसे पटाखे हैं, जिन्हें पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम हानिकारक उत्सर्जन करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक मिश्रण में बदलाव करके कुछ हानिकारक पदार्थों की मात्रा कम की जाती है या उनके स्थान पर दूसरे पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। इनका उद्देश्य जलने के दौरान निकलने वाले प्रदूषक कणों और हानिकारक गैसों को कम करना है। हालांकि, इन पटाखों को जलाने पर भी धुआं, कण और अन्य प्रदूषक निकल सकते हैं।वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान ने हरित पटाखों के विकास और परीक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रामाणिक हरित पटाखों की पहचान के लिए निर्धारित चिह्न और संकेतांक का इस्तेमाल किया जा सकता है। इनकी खरीद करते समय उत्पाद की प्रामाणिकता और संबंधित अनुमति की जांच करना जरूरी है। केवल किसी पटाखे पर हरित या पर्यावरण-अनुकूल होने का दावा लिखा होने से यह प्रमाणित नहीं हो जाता कि वह वास्तव में निर्धारित मानकों के अनुरूप है।
हरित पटाखों में किन हानिकारक रसायनों पर नियंत्रण किया जाता है
पारंपरिक पटाखों में धमाका, तेज रोशनी और अलग-अलग रंग पैदा करने के लिए ईंधन, ऑक्सीकारक तथा विभिन्न रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ पटाखों में मौजूद रसायन जलने के बाद वायु प्रदूषण बढ़ा सकते हैं और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं। हरित पटाखों में इन पदार्थों की मात्रा कम करने या उनके विकल्प अपनाने का प्रयास किया जाता है। इसका उद्देश्य पटाखों से होने वाले प्रदूषण को कम करना है, न कि उसे पूरी तरह समाप्त करना।सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में बेरियम और बेरियम लवण वाले पटाखों पर प्रतिबंध लगाया था। बेरियम नाइट्रेट जैसे रसायनों का उपयोग पटाखों में ऑक्सीकारक के रूप में किया जा सकता है और इनसे हरा रंग भी उत्पन्न होता है। ऐसे रसायनों के इस्तेमाल पर नियंत्रण का उद्देश्य प्रदूषण तथा संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करना है। इसलिए पटाखों की संरचना और उनमें मौजूद रसायनों की जानकारी पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
पटाखों की लड़ियों को लेकर क्या है सरकार का रुख
केंद्र सरकार ने न्यायालय के समक्ष हरित पटाखों की नई तकनीक और उनके नियमन से संबंधित प्रस्ताव रखे हैं। उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, संबंधित विशेषज्ञ संस्थानों की सलाह पर नए स्वरूप वाली पटाखों की लड़ियों को कुछ शर्तों के साथ अनुमति देने की सिफारिश की गई थी। पटाखों की लड़ियों में कई छोटे पटाखे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, जिन्हें एक साथ या क्रमवार जलाया जाता है। ऐसी लड़ियों के इस्तेमाल से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना महत्वपूर्ण माना जाता है।न्यायालय की ओर से ऐसे पटाखों के आकार, संख्या और विस्फोटों के बीच के अंतराल को लेकर सीमाएं निर्धारित किए जाने की जानकारी दी गई है। इन नियमों का उद्देश्य पटाखों के इस्तेमाल को नियंत्रित करना और उससे होने वाले नुकसान को कम करना है। हालांकि, किसी विशेष प्रकार के पटाखे की अनुमति और उसके इस्तेमाल की शर्तें संबंधित न्यायिक आदेशों तथा स्थानीय प्रशासन के निर्देशों पर निर्भर करती हैं। इसलिए लोगों को पटाखे जलाने से पहले लागू नियमों की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए।
क्या हरित पटाखे पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त होते हैं
इस सवाल का सीधा जवाब है—नहीं। हरित पटाखों का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों की तुलना में प्रदूषक पदार्थों के उत्सर्जन को कम करना है, लेकिन इन्हें पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं माना जा सकता। किसी भी पटाखे को जलाने पर रासायनिक अभिक्रिया होती है, जिससे धुआं, गैसें और हवा में मौजूद कणों की मात्रा बढ़ सकती है। इसलिए कम प्रदूषण फैलाने वाले पटाखे भी पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकते हैं।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वायु प्रयोगशाला के पूर्व प्रमुख दीपांकर साहा के अनुसार, दहन की प्रक्रिया को पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त नहीं बनाया जा सकता। हरित पटाखों में हानिकारक रसायनों की मात्रा घटाने या कुछ पदार्थों को बदलने से उत्सर्जन कम हो सकता है। इसके बावजूद पटाखों से निकलने वाले सूक्ष्म कण हवा में जमा हो सकते हैं और सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। यही कारण है कि हरित पटाखों को प्रदूषण का पूर्ण समाधान मानने के बजाय प्रदूषण कम करने का एक सीमित उपाय समझना चाहिए।
प्रयोगशाला परीक्षणों में कितना कम उत्सर्जन पाया गया
उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान द्वारा किए गए प्रयोगशाला परीक्षणों में कुछ नए हरित पटाखों से निकलने वाले दस माइक्रोमीटर तक के कणों के उत्सर्जन में लगभग 45 से 60 प्रतिशत तक की कमी दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई है। यह कमी परीक्षण किए गए पटाखों और निर्धारित परिस्थितियों से संबंधित है। इसलिए इस आंकड़े को हरित पटाखों की सभी श्रेणियों पर समान रूप से लागू नहीं माना जा सकता।प्रयोगशाला में प्राप्त परिणाम वास्तविक वातावरण में होने वाले प्रदूषण से अलग हो सकते हैं। खुले स्थानों पर हवा की गति, तापमान, नमी, पटाखों की संख्या और अन्य प्रदूषण स्रोत वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इसी कारण संबंधित संस्थानों द्वारा दिल्ली, भोपाल, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में वास्तविक परिस्थितियों के दौरान परीक्षण करने का प्रस्ताव महत्वपूर्ण है। ऐसे परीक्षणों से यह समझने में सहायता मिल सकती है कि हरित पटाखों से प्रदूषण में वास्तव में कितनी कमी आती है।
पिछले आठ वर्षों में दिवाली पर दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 से 2025 के बीच दिवाली के दिन दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक अलग-अलग स्तर पर दर्ज किया गया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि त्योहार के दौरान दिल्ली की हवा कई वर्षों में खराब से लेकर गंभीर श्रेणी तक पहुंची। हालांकि, वायु गुणवत्ता पर केवल पटाखों का प्रभाव नहीं पड़ता; मौसम और दूसरे प्रदूषण स्रोत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
|
वर्ष |
औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक |
वायु गुणवत्ता की श्रेणी |
|---|---|---|
|
2018 |
281 |
खराब |
|
2019 |
337 |
बहुत खराब |
|
2020 |
414 |
गंभीर |
|
2021 |
382 |
बहुत खराब |
|
2022 |
312 |
बहुत खराब |
|
2023 |
218 |
खराब |
|
2024 |
328 |
बहुत खराब |
|
2025 |
345 |
बहुत खराब |
वायु गुणवत्ता सूचकांक के सामान्य मानकों के अनुसार, 201 से 300 के बीच का स्तर खराब, 301 से 400 के बीच का स्तर बहुत खराब और 401 से 500 के बीच का स्तर गंभीर माना जाता है। इन आंकड़ों में वर्ष 2020 में सबसे अधिक सूचकांक 414 दर्ज किया गया, जबकि वर्ष 2023 में यह 218 रहा। वर्ष 2025 में सूचकांक फिर बढ़कर 345 पहुंच गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि दिवाली के दौरान हवा की गुणवत्ता में साल-दर-साल काफी अंतर देखने को मिलता है।
प्रतिबंध के बावजूद दिल्ली में प्रदूषण क्यों बढ़ता है
दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध और उनके इस्तेमाल को नियंत्रित करने के प्रयासों के बावजूद प्रदूषण की समस्या बनी रही है। इसके पीछे नियमों का उल्लंघन, अवैध पटाखों की बिक्री और निर्धारित मानकों का पालन न करना जैसे कारण हो सकते हैं। इसके अलावा, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण स्थलों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने जैसी गतिविधियां भी हवा को प्रदूषित कर सकती हैं। इन सभी कारणों का संयुक्त प्रभाव त्योहारों के समय वायु गुणवत्ता को और खराब बना सकता है।केवल पटाखों पर प्रतिबंध लगाने से दिल्ली की वायु गुणवत्ता में स्थायी सुधार सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए प्रदूषण के विभिन्न स्रोतों पर एक साथ नियंत्रण करना आवश्यक है। नियमों का प्रभावी पालन, अवैध पटाखों की बिक्री पर रोक और प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों की निगरानी महत्वपूर्ण कदम हैं। साथ ही, लोगों की भागीदारी और पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी प्रदूषण कम करने में सहायता कर सकती है।
मौसम वायु प्रदूषण को किस तरह प्रभावित करता है
दिवाली के दौरान प्रदूषण का स्तर केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि कितने पटाखे जलाए गए। हवा की गति, तापमान, नमी और वातावरण में प्रदूषकों के फैलने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है। जब हवा धीमी होती है और वातावरण में प्रदूषक फैल नहीं पाते, तब धुआं तथा सूक्ष्म कण जमीन के आसपास जमा होने लगते हैं। इसके विपरीत, अनुकूल मौसम में प्रदूषक अपेक्षाकृत तेजी से फैल सकते हैं, जिससे वायु गुणवत्ता सूचकांक में कुछ सुधार दिखाई दे सकता है।वर्ष 2023 में दिवाली के दिन दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 218 दर्ज किया गया था, जो अन्य कई वर्षों के मुकाबले कम था। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उस समय अनुकूल मौसमी परिस्थितियों ने इसमें भूमिका निभाई थी। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि आतिशबाजी से प्रदूषण नहीं हुआ। पटाखे जलाने के बाद हवा में मौजूद कणों की मात्रा बढ़ सकती है, भले ही पूरे दिन का औसत सूचकांक अपेक्षाकृत कम दिखाई दे।
सूक्ष्म कणों का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है
वायु प्रदूषण में मौजूद सूक्ष्म कण स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। विशेष रूप से ढाई माइक्रोमीटर या उससे छोटे कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि वे सांस के जरिए फेफड़ों के भीतर गहराई तक पहुंच सकते हैं। इनके संपर्क में आने से आंखों में जलन, खांसी, सांस लेने में परेशानी और पहले से मौजूद श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं। प्रदूषण का अधिक प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों पर पड़ सकता है।उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, वर्ष 2025 की दिवाली की रात दिल्ली के कई निगरानी केंद्रों पर सूक्ष्म कणों का स्तर बहुत अधिक दर्ज किया गया था। आठ प्रमुख निरंतर निगरानी केंद्रों का औसत स्तर 785.6 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर बताया गया। नेहरू नगर में यह स्तर 1,763 और आनंद विहार में 1,710 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंचने की जानकारी दी गई। ये आंकड़े उस रात के प्रदूषण की गंभीरता को दर्शाते हैं, हालांकि इनकी तुलना करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रति घंटे के आंकड़े और पूरे दिन के औसत आंकड़े अलग-अलग होते हैं।
दिवाली पर प्रदूषण कम करने के लिए क्या जरूरी है
दिवाली के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए सबसे प्रभावी कदम पटाखों के इस्तेमाल को सीमित करना और लागू नियमों का पालन करना है। केवल प्रमाणित हरित पटाखों का इस्तेमाल करने से भी प्रदूषण पूरी तरह समाप्त नहीं होगा, इसलिए कम से कम आतिशबाजी करना अधिक उपयोगी हो सकता है। लोगों को अवैध पटाखों से बचना चाहिए और बच्चों तथा बुजुर्गों को धुएं के सीधे संपर्क में आने से सुरक्षित रखना चाहिए। अधिक प्रदूषण वाले दिनों में बाहरी गतिविधियों को सीमित करना भी उपयोगी हो सकता है।सरकार और संबंधित संस्थानों को पटाखों के उत्सर्जन की निगरानी, अवैध बिक्री पर रोक और प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर नियंत्रण के लिए लगातार कदम उठाने की जरूरत है। हरित पटाखों की वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन प्रयोगशाला के साथ-साथ खुले वातावरण में भी किया जाना चाहिए। साथ ही, वायु गुणवत्ता के आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करना आवश्यक है, ताकि लोगों को प्रदूषण की वास्तविक स्थिति का पता चल सके। सामूहिक प्रयासों से ही त्योहारों की खुशियों के साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
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