ज्ञानेश कुमार से पहले भी उठी CEC को हटाने की मांग, टीएन शेषन से नवीन चावला तक जानिए पूरा विवाद

ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के बीच जानिए इससे पहले किन मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों को हटाने की मांग उठी थी। टीएन शेषन से लेकर नवीन चावला तक के विवाद और वर्तमान मामले का पूरा घटनाक्रम पढ़िए।

Oct 05, 2026 - 15:16
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ज्ञानेश कुमार से पहले भी उठी CEC को हटाने की मांग, टीएन शेषन से नवीन चावला तक जानिए पूरा विवाद

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 5 अक्टूबर 2026

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग को लेकर 5 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई ने चुनाव आयोग की शक्तियों और मुख्य चुनाव आयुक्त की संवैधानिक स्थिति को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है। याचिकाकर्ताओं ने विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े निर्णयों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्वतंत्र उच्चस्तरीय न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल गठित करने की मांग भी की है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग के आंकड़ों की स्वतंत्र जांच कर यह पता लगाया जाना चाहिए कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम किन परिस्थितियों में हटाए गए।

सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानेश कुमार को हटाने पर क्या कहा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने का कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी करते हुए एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल समाचार रिपोर्टों के आधार पर कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। न्यायालय मामले में उपलब्ध आधिकारिक तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही आगे निर्णय करेगा।

क्या सर्वोच्च न्यायालय मुख्य चुनाव आयुक्त को हटा सकता है

संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सामान्य संवैधानिक पदों से अलग है। मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक होता है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय सीधे किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश नहीं दे सकता।हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय चुनाव आयोग के निर्णयों की संवैधानिक और कानूनी वैधता की जांच कर सकता है। यदि कोई निर्णय संविधान या कानून के विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायालय उसके संबंध में उचित आदेश दे सकता है। यही वजह है कि ज्ञानेश कुमार के मामले में भी न्यायालय का ध्यान मुख्य रूप से चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और उसके संवैधानिक दायरे पर है। तत्काल पद से हटाने का अधिकार न्यायालय के पास नहीं है।

टी.एन. शेषन के समय पहली बार उठी थी हटाने की मांग

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग का इतिहास नया नहीं है। वर्ष 1992 में टी.एन. शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए उनके खिलाफ हटाने की मांग उठी थी। शेषन अपने कठोर चुनावी सुधारों और चुनाव आचार व्यवस्था को सख्ती से लागू कराने के लिए प्रसिद्ध थे। उनके कई फैसलों से राजनीतिक दलों का एक वर्ग नाराज था और उन्हें हटाने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू करने की मांग की गई थी।हालांकि, उस समय यह प्रयास सफल नहीं हो पाया। संसद में आवश्यक समर्थन नहीं जुट सका और शेषन अपने पद पर बने रहे। इसके बावजूद यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग का शुरुआती और चर्चित उदाहरण था। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि मुख्य चुनाव आयुक्त का पद राजनीतिक और संवैधानिक विवादों से पूरी तरह अलग नहीं है।

टी.एन. शेषन खुद पहुंचे थे सर्वोच्च न्यायालय

वर्ष 1993 में टी.एन. शेषन स्वयं सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे थे, लेकिन उनका मामला पद से हटाने से संबंधित नहीं था। उस समय केंद्र सरकार ने चुनाव आयोग में दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कर दी थी। शेषन का मानना था कि इससे मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों और प्रभाव में कमी आई है। उन्होंने न्यायालय के सामने यह सवाल उठाया कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य चुनाव आयुक्तों के निर्णयों को अपने अधिकार से बदल सकते हैं।14 जुलाई 1995 को सर्वोच्च न्यायालय ने शेषन की याचिका खारिज कर दी थी। न्यायालय ने चुनाव आयोग के सदस्यों की शक्तियों को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी और कहा कि प्रशासनिक मामलों को छोड़कर चुनाव आयोग के सदस्यों की शक्तियां व्यापक रूप से समान हैं। इसलिए शेषन का यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की संरचना और अधिकारों से जुड़ा संवैधानिक विवाद था।

नवीन चावला को हटाने की भी उठी थी मांग

वर्ष 2006 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की मांग ने भी राजनीतिक और संवैधानिक विवाद पैदा किया था। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने चावला को चुनाव आयुक्त के पद से हटाने की मांग की थी। यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने से अलग था, क्योंकि चावला उस समय चुनाव आयुक्त के पद पर थे। संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया अलग-अलग रखी गई है।वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को नवीन चावला को हटाने की सिफारिश भेजी थी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया। यह पूरा विवाद राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर चर्चा में रहा, लेकिन यह मामला उस रूप में सर्वोच्च न्यायालय के सामने नहीं पहुंचा, जिस तरह वर्तमान में ज्ञानेश कुमार का मामला पहुंचा है।

वर्ष 2018 में भी सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा था चुनाव आयुक्तों की सुरक्षा का मामला

वर्ष 2018 में भारतीय जनता पार्टी के नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इसमें मांग की गई थी कि अन्य चुनाव आयुक्तों को भी मुख्य चुनाव आयुक्त के समान मजबूत संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की जाए। इस मांग के पीछे मुख्य तर्क यह था कि चुनाव आयोग के सभी सदस्यों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उनकी पद-सुरक्षा मजबूत होनी चाहिए।केंद्र सरकार ने इस मांग का विरोध किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पुराने निर्णयों और विशेष रूप से टी.एन. शेषन से जुड़े मामले में तय किए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखा। न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया में मौजूद अंतर को बरकरार रखा। इसलिए यह मामला भी किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग वाला प्रत्यक्ष मामला नहीं था।

ज्ञानेश कुमार का मामला पहले के विवादों से क्यों अलग है

वर्ष 2026 में ज्ञानेश कुमार से जुड़ा विवाद कई मायनों में पहले के मामलों से अलग है। इस बार याचिकाकर्ताओं ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने की मांग सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखी है। आरोपों का संबंध विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े निर्णयों और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों में अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए। याचिकाकर्ताओं ने इस पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की मांग की है। उनका कहना है कि केवल चुनाव आयोग के आंतरिक आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय किसी स्वतंत्र संस्था से आंकड़ों की जांच कराई जानी चाहिए। इसी उद्देश्य से स्वतंत्र उच्चस्तरीय न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल बनाने की मांग सामने आई है।

13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने की जांच की मांग

याचिकाकर्ताओं के अनुसार चुनाव आयोग के आंकड़ों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण कराया जाना चाहिए। उनका दावा है कि करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने की परिस्थितियों की जांच आवश्यक है। जांच के माध्यम से यह पता लगाया जाना चाहिए कि नाम हटाने की प्रक्रिया किन नियमों और आधारों पर की गई। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रभावित मतदाताओं को अपना नाम दोबारा दर्ज कराने के लिए क्या प्रक्रिया उपलब्ध कराई गई।याचिकाकर्ताओं की मांग है कि स्वतंत्र जांच में चुनाव आयोग के आंकड़ों और संबंधित अभिलेखों का परीक्षण किया जाए। उनका कहना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि मतदाता सूची में बदलाव निर्धारित नियमों के अनुसार हुआ या नहीं। यदि किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है, तो उसके लिए जिम्मेदारी तय की जा सकेगी। हालांकि, इन आरोपों और दावों पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक जांच तथा संबंधित पक्षों के जवाब के बाद ही निकलेगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर होने चाहिए। इस टिप्पणी को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है। ऐसे में उसके निर्णयों में संस्थागत प्रक्रिया और सभी सदस्यों की भूमिका का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।न्यायालय ने फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है। चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है, जिसके बाद मामले की आगे सुनवाई होगी। यदि न्यायालय को किसी निर्णय में कानूनी या संवैधानिक कमी दिखाई देती है, तो वह उस निर्णय की वैधता पर विचार कर सकता है। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के माध्यम से ही पूरी होती है।

अब आगे क्या होगा

अब इस मामले में चुनाव आयोग और संबंधित पदाधिकारियों के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। सर्वोच्च न्यायालय यह देख सकता है कि विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिए गए और क्या उनमें संवैधानिक तथा कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ। न्यायालय याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजों की भी समीक्षा करेगा। इसके बाद ही यह तय होगा कि मामले में आगे किस प्रकार की न्यायिक कार्रवाई आवश्यक है।इस पूरे विवाद ने एक बार फिर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मुख्य चुनाव आयुक्त की संवैधानिक सुरक्षा और मतदाता सूची की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। टी.एन. शेषन से लेकर नवीन चावला और अब ज्ञानेश कुमार तक के मामलों से यह स्पष्ट होता है कि चुनाव आयोग से जुड़े विवाद समय-समय पर न्यायपालिका और संसद दोनों के सामने आते रहे हैं। हालांकि, वर्तमान मामला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के निलंबन की मांग सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखी गई है।

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