हाईकोर्ट बोला- मजिस्ट्रेट को एफआईआर कराना अनिवार्य:शिकायत में गंभीर अपराध का खुलासा तो एक्शन लेना जरूरी

Oct 11, 2026 - 00:31
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हाईकोर्ट बोला- मजिस्ट्रेट को एफआईआर कराना अनिवार्य:शिकायत में गंभीर अपराध का खुलासा तो एक्शन लेना जरूरी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रामपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का 25 मई 2026 का आदेश रद्द कर दिया है। इस आदेश में धारा 173(4) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत एफआईआर दर्ज कराने की मांग खारिज कर दिया गया था। न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने मामला नए सिरे से तय करने के लिए मजिस्ट्रेट को वापस भेज दिया। जानिये क्या है केस राज कौर ने आरोप लगाया था कि 4 अप्रैल 2026 को सुबह करीब 10 बजे खेत पर आरोपियों और 2-3 अज्ञात लोगों ने उनके पति और बेटे को गाली-गलौज के बाद तलवार से जानलेवा हमला कर गंभीर रूप से घायल कर दिया। उनका कहना था कि राजनीतिक दबाव के कारण थाना बिलासपुर (जिला रामपुर) में उनकी एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने सी जे एम के समक्ष आवेदन दायर किया। बारीकियों को पकड़ा गया मजिस्ट्रेट ने थाने से रिपोर्ट मांगी। रिपोर्ट में बताया गया कि उसी दिन दोनों पक्षों में मारपीट हुई थी, जिस पर केस दर्ज है और जांच चल रही है। मजिस्ट्रेट ने माना कि राज कौर ने यह तथ्य छिपाया कि उनके पति और बेटे उस एफआईआर में आरोपी हैं, और घायलों के मेडिकल कागज भी पेश नहीं किए। इसलिए वे स्वच्छ हृदय" से अदालत नहीं आई हैं, और आवेदन खारिज कर दिया गया। याची ने दी दलीलें याची की ओर से कहा गया कि मजिस्ट्रेट ने न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं किया। संज्ञेय अपराध बनता हो तो एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देना उनका कर्तव्य था। साथ ही, उन्हें थाने और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का रिकॉर्ड मंगाकर सच्चाई जांचनी चाहिए थी। याची ने कहा सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा हो तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है और ऐसे में प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं है। राज्य सरकार का जवाब राज्य सरकार और विपक्षी संख्या 2 से 5 की ओर से कहा गया कि आवेदन झूठे और गढ़े हुए तथ्यों पर आधारित है। याची पक्ष के खिलाफ पहले ही एफआईआर में आरोप-पत्र दाखिल हो चुका है और बचाव के लिए यह आवेदन दिया गया। दोनों पक्ष एक ही परिवार के हैं। एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देना मजिस्ट्रेट का विवेकाधिकार है, वह आवेदन को परिवाद मान सकता है या खारिज कर सकता है। कोर्ट ने निर्देश जारी किया अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट का निष्कर्ष स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है। मजिस्ट्रेट ने यह देखा ही नहीं कि आवेदन की विषयवस्तु से संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। पुलिस रिपोर्ट से ही स्पष्ट था कि दोनों पक्षों में मारपीट और गाली-गलौज हुई थी और एक ही पक्ष की एफआईआर दर्ज है। उसी घटना का एक दूसरा संस्करण याची ने बताया था, इसलिए पुलिस के लिए इस कोण से भी जांच करना जरूरी था। चोटों के बारे में याची ने 4 अप्रैल 2026 रात 23:25 बजे की जी.डी. संख्या 75 की प्रति दाखिल की थी। इसके मुताबिक पति कुलदीप सिंह और बेटे गुरशन सिंह को थाने लाया गया था, जहां उनके शरीर पर चोटें पाई गईं और बेटे ने दर्द की शिकायत की। अदालत ने कहा कि केवल मेडिकल कागज दाखिल न करने और पति-बेटे के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने से यह नहीं माना जा सकता कि याची साफ हाथों से नहीं आई, खासकर जब पुलिस रिपोर्ट खुद दोनों ओर से मारपीट की बात कहती है और जी.डी. में चोटों की प्रविष्टि मौजूद है। हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए 25.मई.2026 का आदेश रद्द कर दिया और निचली अदालत को याची का आवेदन कानून के अनुसार नए सिरे से तय करने का निर्देश दिया।

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