इन चेहरों ने जोड़ी ताकत, जीत तक पहुंचा आंदोलन:AMU में भूख हड़ताल से लेकर अलीग्स को जोड़ने तक संभाला मोर्चा; डक प्वाइंट पर जश्न के साथ गूंजा एएमयू का तराना

Oct 09, 2026 - 17:09
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इन चेहरों ने जोड़ी ताकत, जीत तक पहुंचा आंदोलन:AMU में भूख हड़ताल से लेकर अलीग्स को जोड़ने तक संभाला मोर्चा; डक प्वाइंट पर जश्न के साथ गूंजा एएमयू का तराना
शुरुआत में साथ देने वाले कम थे, सामने प्रशासन था और दांव पर छात्रों का करियर। लेकिन छात्रसंघ बहाली की मांग लेकर उतरे चेहरों ने न पीछे हटने का फैसला किया, न आंदोलन को बिखरने दिया। किसी ने भूख हड़ताल से लड़ाई को धार दी, किसी ने छात्रों को जोड़ा और किसी ने अलीग्स तक समर्थन पहुंचाया। एएमयू में 19 दिन तक चले आंदोलन की यही ताकत धीरे-धीरे उसकी सबसे बड़ी पूंजी बनी। छात्रसंघ बहाली और चुनाव की घोषणा के साथ गुरुवार को जब कैंपस जश्न में डूबा, तो डक प्वाइंट पर उठते नारे, आतिशबाजी और बाइकों पर घूमते छात्रों के बीच उन चेहरों का संघर्ष भी चर्चा में था, जिन्होंने आंदोलन की शुरुआत से जीत तक मोर्चा संभाले रखा। यासिर फहद, आदिल रजा, सैफ अली खान, माज, अनस फैजान, शहंशाह, मो.इंतखाब और मो. रैयान इस संघर्ष के प्रमुख चेहरों में रहे। एएमयू की गुटबाजी और क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर इन छात्रों ने एक साझा मांग को केंद्र में रखा। शुरुआत में समर्थन सीमित था, लेकिन आंदोलन आगे बढ़ा तो छात्र-छात्राएं, अलीग्स और राजनीतिक हलकों से भी साथ मिलने लगा। आंदोलनकारियों ने इस बार पहले की तरह आश्वासन पर पीछे हटने के बजाय चुनाव की तारीख और मुख्य चुनाव अधिकारी की घोषणा तक डटे रहने की रणनीति अपनाई। किसी ने भूख हड़ताल की, किसी ने संभाली आंदोलन की रीढ़ यासिर फहद: भूख हड़ताल से बने आंदोलन का चेहरा बलरामपुर निवासी यासिर फहद पिछले करीब छह साल से एएमयू में पढ़ रहे हैं। एमए उर्दू के छात्र यासिर ने छात्रों की आवाज उठाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठने का फैसला किया। आंदोलन के दौरान उनकी भूख हड़ताल संघर्ष का प्रमुख केंद्र बनी रही। यासिर का कहना है कि यह जीत उन सभी भाई-बहनों की है, जो उनके साथ खड़े रहे। आदिल रजा: छात्रसंघ को बताया आवाज उठाने का मंच बिहार के किशनगंज निवासी आदिल रजा बीए राजनीति विज्ञान के चतुर्थ वर्ष के छात्र हैं। एएमयू में करीब छह साल से पढ़ रहे आदिल के मुताबिक, छात्रसंघ छात्रों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। इसी सोच के साथ वह आंदोलन में आगे आए। प्रॉक्टर के व्यवहार को लेकर छात्रों और समर्थन में आई छात्राओं की नाराजगी भी उन्हें हटाने की मांग के पीछे प्रमुख कारणों में रही। सैफ अली खान: दस साल से कैंपस में, यूनियन के बिना अधूरापन बिहार के चंपारण निवासी सैफ अली खान एमएससी अंतिम वर्ष के छात्र हैं। वह करीब दस साल से एएमयू में पढ़ रहे हैं। सैफ कहते हैं कि छात्रसंघ के बिना वह खुद को अधूरा महसूस करते थे। जब बहाली की मांग उठी तो उन्होंने साथियों के साथ आवाज बुलंद की। उनके लिए यह लड़ाई छात्रों के प्रतिनिधित्व को वापस पाने की थी। माज: इस बार आश्वासन पर नहीं रुकना था आजमगढ़ निवासी माज बीटेक तृतीय वर्ष के छात्र हैं। उन्हें भरोसा था कि छात्र एकजुट होकर लड़ेंगे तो जीत सकते हैं। उनका जोर इस बात पर था कि पिछली बार की तरह आंदोलन आश्वासन तक सीमित न रह जाए। इसी सोच के साथ आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने और साथियों को साथ जोड़ने की कोशिश की गई। माज के मुताबिक, सामूहिक प्रयासों से ही सफलता मिली। अनस फैजान: अलीग्स तक पहुंचाया आंदोलन का संदेश आजमगढ़ निवासी अनस फैजान लॉ के रिसर्च स्कॉलर हैं। उन्होंने सीनियर के तौर पर आंदोलनकारी छात्रों का साथ दिया। आंदोलन को मजबूती देने के लिए समर्थन जुटाने के साथ अलीग्स को जोड़ने में भी भूमिका निभाई। अनस इस जीत का श्रेय किसी एक चेहरे को देने के बजाय पूरे आंदोलन को देते हैं। शहंशाह: सीनियर के तौर पर छात्रों के साथ खड़े रहे गाजीपुर निवासी शहंशाह भी रिसर्च स्कॉलर हैं। उन्होंने छात्रसंघ बहाली को छात्रों की जरूरत बताते हुए आंदोलन का समर्थन किया। सीनियर के रूप में उनकी भूमिका आंदोलन के साथ खड़े रहने और छात्र बिरादरी की सामूहिक मांग को मजबूती देने की रही। शहंशाह के मुताबिक, जीत का श्रेय पूरी तलबा बिरादरी को जाता है। मो.इंतखाब:अब नहीं दब सकेगी छात्रों की आवाज जम्मू के रहने वाले मो.इंतखाब रिसर्च स्कॉलर हैं और उनकी भूमिका भी इस आंदोलन में सीनियर की तरह रही। वे आंदोलन को धार देने में सभी खेमों को जोड़ने में लगे रहे। आज इस जीत का श्रेय वे सभी साथियों व भाई बहनों को देते हुए कहते हैं कि अब आवाज नहीं दबेगी। मो. रैयान: पहले दिन से आंदोलन में सक्रिय अलीगढ़ के स्थानीय निवासी मो. रैयान बीए अर्थशास्त्र तृतीय वर्ष के छात्र हैं। वह पहले दिन से आंदोलन में शामिल रहे। लगातार साथ खड़े रहने वाले रैयान भी इस सफलता का श्रेय सभी आंदोलनकारियों और समर्थकों को देते हैं। 2018 के बाद चुनाव नहीं, नाराजगी कई मोर्चों पर एएमयू में 2018 के बाद छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। सीएए-एनआरसी से जुड़े घटनाक्रम, कोविड काल और बाद की प्रशासनिक परिस्थितियों के बीच चुनाव टलते रहे। आंदोलनकारियों के मुताबिक, पिछले वर्ष भी बहाली की मांग उठी थी। उस समय आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया, लेकिन बाद में कैंपस में अनुकूल माहौल और समय नहीं होने का हवाला देकर चुनाव की मांग फिर टाल दी गई। इस बार छात्रों ने पिछला अनुभव सामने रखकर रणनीति बदली। मांगों का मसौदा तैयार किया और चुनाव की तारीख व मुख्य चुनाव अधिकारी की घोषणा से पहले आंदोलन खत्म नहीं करने का फैसला लिया। उनका तर्क था कि दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव हो रहे हैं तो एएमयू में क्यों नहीं। छात्रसंघ की गैरमौजूदगी में शैक्षणिक, डाइनिंग और आवासीय समस्याओं पर छात्रों की सामूहिक आवाज कमजोर पड़ने की बात भी उठाई गई। प्रॉक्टर प्रो. मोहम्मद नवेद खान के व्यवहार को लेकर भी आंदोलनकारियों ने नाराजगी जताई। उनका आरोप था कि छात्रों से सीधे संवाद के बजाय कई बार धमकी और कार्रवाई के अंदाज में बात की जाती है। इसी कारण छात्रसंघ बहाली के साथ प्रॉक्टर को हटाने की मांग भी आंदोलन का हिस्सा बनी। जश्न में गूंजा तराना, संघर्ष को मिली पहचान छात्रसंघ बहाली की घोषणा के बाद डक प्वाइंट पर आतिशबाजी, नारेबाजी और बाइकों पर घूमते छात्रों के समूहों ने कैंपस में चुनावी रंग भर दिया। छात्र-छात्राओं के उत्साह के बीच एएमयू का पारंपरिक तराना—'ये मेरा चमन है, मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं...'—भी गूंजता रहा। मशहूर शायर मजाज लखनवी ने यह तराना 1936 में लिखा था। कैंपस की परंपरा के अनुसार, 1954 में छात्र इश्तियाक अहमद खान ने इसे पहली बार स्ट्रैची हॉल में गाया था। इसके बाद यह तराना विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक पहचान और खुशी के आयोजनों का हिस्सा बन गया। इस बार तराने के साथ 19 दिन के संघर्ष की कहानी भी जुड़ी थी। शुरुआती कम समर्थन से शुरू हुई लड़ाई छात्र-छात्राओं, अलीग्स और अन्य समर्थकों तक पहुंची। इन चेहरों की भूमिका अलग-अलग रही, लेकिन उनकी साझा मांग ने आंदोलन को दिशा दी। छात्रसंघ बहाली की घोषणा के साथ आंदोलन जश्न में बदला तो डक प्वाइंट पर गूंजते नारों ने यही संदेश दिया—यह किसी एक छात्र की नहीं, सामूहिक संघर्ष की जीत है।

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