क्रिकेट इतिहास के लीजेंड सर-विज्जी के बड़े बेटे का निधन:वाराणसी में पूर्व भारतीय क्रिकेटर एएन वेंकटेश नारायण ने ली अंतिम सांस, नाती ने दी मुखाग्नि
भारतीय क्रिकेट की ऐतिहासिक विरासत से जुड़े महाराजा राजकुमार विजयनगरम (सर विज्जी) के बड़े पुत्र एएन वेंकटेश नारायण का 17 अक्टूबर की रात निधन हो गया। वह पिछले 15 दिनों से बीमार थे। छह दिन पहले उन्हें रवींद्रपुरी स्थित एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनका अंतिम संस्कार हरिश्चंद्र घाट पर किया गया। बता दें की एएन वेंकटेश नारायण ने दो राज्यों से रणजी मुकाबले खेले थे। उत्तर प्रदेश और आंध्रा प्रदेश। उनका भारतीय टीम में चयन नहीं हुआ पर उन्होंने क्रिकेट के लिए हमेशा योगदान दिया। उनकी मौत से खेल जगत में शोक की लहर है। 15 दिनों से चल रहे थे बीमार
नाती यादवेंद्र सिंह ने बताया कि नानाजी काफी बुजुर्ग थे और पिछले 15 दिनों से बीमार चल रहे थे। छह दिन पहले उन्हें ओरियाना अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 16 अक्टूबर को चिकित्सकों ने घर ले जाने को कहा तो उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए परिजन उन्हें शाम को घर ले आए। अगले दिन 17 अक्टूबर की रात 9 बजकर 10 मिनट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। इसके बाद 18 अक्टूबर की शाम को उनका हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार किया गया और उन्हें मैंने ही मुखाग्नि दी। बता दें की वेंकटेश की सिर्फ एक पुत्री यमुना सिंह हैं। जिनकी शादी हिमांचल प्रदेश हुई है। पिता के नाम पर होती है विज्जी ट्रॉफी
वेंकटेश नारायण के पिता महाराजा राजकुमार विजयनगरम भारतीय क्रिकेट के शुरुआती दौर की प्रमुख हस्तियों में शामिल थे। क्रिकेट जगत में वह सर विज्जी के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्हीं के नाम पर आयोजित होने वाली विज्जी ट्रॉफी देश की अंतरविश्वविद्यालयी क्रिकेट प्रतियोगिताओं में विशिष्ट स्थान रखती है। सर विज्जी ने 1936 में इंग्लैंड दौरे पर भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी की थी। भारतीय क्रिकेट के विकास और विश्वविद्यालय स्तर पर खेल प्रतिभाओं को मंच देने में भी उनका योगदान रहा। इस तरह वेंकटेश नारायण का परिवार देश के क्रिकेट इतिहास की एक महत्वपूर्ण विरासत से जुड़ा रहा। उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश की ओर से खेले रणजी
वेंकटेश नारायण स्वयं भी क्रिकेट से जुड़े रहे। उन्होंने घरेलू क्रिकेट में आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश की ओर से रणजी ट्रॉफी में हिस्सा लिया था। दो अलग-अलग राज्यों का प्रतिनिधित्व करने के कारण उनका नाम दोनों राज्यों के घरेलू क्रिकेट से जुड़ा रहा। उनका निधन ऐसे परिवार की एक महत्वपूर्ण कड़ी का अंत है, जिसकी पहचान भारतीय क्रिकेट के इतिहास और विज्जी ट्रॉफी की परंपरा से जुड़ी रही है।
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