लखनऊ में बाढ़ पीड़ित नाव देख दौड़ पड़ते हैं:चोरी हो जाएगी, इसलिए घर नहीं छोड़ा; छत पर तिरपाल डालकर समय काट रहे

Oct 14, 2026 - 05:44
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लखनऊ में बाढ़ पीड़ित नाव देख दौड़ पड़ते हैं:चोरी हो जाएगी, इसलिए घर नहीं छोड़ा; छत पर तिरपाल डालकर समय काट रहे
लखनऊ का फैजुल्लागंज करीब 2 हफ्तों से बाढ़ के पानी से घिरा है। गोमती नदी का जलस्तर बढ़ने से स्थिति भयावह हो चुकी है। 50 हजार से ज्यादा घरों में 5 फीट तक पानी भरा है। एक मंजिला मकानों में रहने वाले लोग छतों पर तिरपाल डालकर दिन काट रहे हैं। चारों तरफ पानी होने के बावजूद लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। हैंडपंप डूब गए हैं। बिजली नहीं होने से सबमर्सिबल भी नहीं चल पा रहे। छोटे बच्चों को दूध नहीं मिल रहा। बीमार लोग दवाओं के लिए परेशान हैं। जब भी प्रशासन या राहत सामग्री लेकर कोई नाव दिखाई देती है, लोग मदद की आस में हाथ हिलाने लगते हैं। दैनिक भास्कर की टीम बाढ़ में घिरे लोगों के बीच पहुंची। वहां तबाही, नुकसान और लोगों के दर्द को करीब से समझा। साथ ही, प्रशासन की ओर से दी जा रही मदद का भी जायजा लिया। बाढ़ प्रभावित लोगों ने क्या बताया और मौके पर क्या हालात दिखे? आइए, जानते हैं… राहत सामग्री से भरा एक सरकारी ट्रक फैजुल्लागंज के दाउदनगर इलाके में आकर रुका। ट्रक से राशन और राहत सामग्री की बोरियां उतारकर नाव पर लादी जाने लगीं। शुरुआती पॉइंट पर मौजूद कुछ स्थानीय लोग चाहते थे कि उन्हें वहीं सामान बांट दिया जाए। लेकिन, टीम ने वहां सामान बांटने से साफ इनकार कर दिया। वजह पूछने पर अधिकारियों ने बताया- अगर हमने मेन रोड पर ही राशन बांटना शुरू कर दिया, तो गलियों और कॉलोनियों में फंसे पीड़ितों तक राशन-पानी पहुंच ही नहीं पाएगा। बात जायज थी। इसके बाद हम भी राहत सामग्री से लदी नाव पर सवार होकर जलमग्न इलाकों की तरफ निकल पड़े। इस नाव पर करीब 25 राशन किट रखी गई थीं। इसमें- इसके अलावा नाव पर स्थानीय विधायक नीरज बोरा की तरफ से तैयार कराए गए खाने के पैकेट, केले, बिस्कुट और पानी की बोतलें भी रखी थीं। विधायक की टीम के 3 वॉलंटियर, प्रशासन की तरफ से एक लेखपाल और सुरक्षा के लिए यूपी पुलिस के एक दरोगा भी नाव पर मौजूद थे। पानी के बीच 'पीने के पानी' की सबसे ज्यादा किल्लत हम दाउदनगर की 60 फीट चौड़ी मुख्य सड़क पर नाव चलाते हुए मामा कॉलोनी की ओर बढ़े। यह पूरी सड़क अब किसी गहरी नदी जैसी दिख रही थी। करीब 1 किलोमीटर आगे जाने पर एक मकान की छत से महिला ने आवाज दी- भैया, खाने से पहले पानी की बोतल दे दीजिए…। महिला ने छत से रस्सी के सहारे एक बाल्टी नीचे लटकाई। नाव पर मौजूद वॉलंटियर्स ने बाल्टी में पानी की 4 बोतलें, खाने के पैकेट और केले रखकर ऊपर भिजवाए। इस वक्त पूरे इलाके में सबसे ज्यादा मांग सिर्फ और सिर्फ पीने के पानी की है। इसके बाद नाव एक संकरी गली की तरफ मुड़ गई। गली के मोड़ पर ही छत पर खड़े कुछ लोगों से जब पूछा गया कि राशन किट मिली या नहीं, तो उन्होंने बेबसी से कहा- हम लोग तो किराएदार हैं साहब, हमें कोई किट नहीं मिली। उनकी बेबसी देखकर लेखपाल और दरोगा जी ने ऑन-द-स्पॉट फैसला लिया। उन्होंने किराएदारों से अपना आधार कार्ड दिखाने को कहा। नाव अब मामा कॉलोनी के अंदर पहुंच चुकी थी, जो इस बाढ़ में सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक है। यहां कई जगहों पर 15 फीट तक पानी भरा है। इलाके के करीब 60% मकान एक मंजिला हैं, जो पिछले 3-4 सालों में बने हैं। कई जगहों पर 'फ्री-होल्ड प्लॉट' लिखे हुए डूबे बोर्ड नजर आ रहे थे। नाव पर मौजूद वॉलंटियर्स सीटी बजाकर और माइक से आवाज लगा रहे थे- कोई भूखा-प्यासा है क्या? खाना-पानी चाहिए? तभी एक मकान की छत से बुजुर्ग महिला ने हाथ उठाकर बुलाया। नाव घर की दीवार के पास पहुंची। महिला ने अपनी साड़ी के पल्लू से बाल्टी बांधकर नीचे लटकाई। उसमें पानी, भोजन और लाई का पैकेट रखकर ऊपर भिजवाया गया। जब उनसे राशन किट के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि नहीं मिली। नाव पर मौजूद लोग उन्हें भारी राशन किट देना चाहते थे, लेकिन 10-12 किलो राशन साड़ी या पतली रस्सी से छत तक पहुंचाना मुश्किल था। उस जगह पर करीब 8 फीट तक पानी था। नाव से उतरकर किट पहुंचाना भी संभव नहीं था। भारी मन से टीम को नाव आगे बढ़ानी पड़ी। ‘पूरा बिजनेस पानी में डूबा, घर छोड़ें तो कहां जाएं’ मामा कॉलोनी से निकलकर हमारी नाव शिवपुरम कॉलोनी की तरफ बढ़ी। पूरा इलाका जलमग्न था। नाव देखते ही छतों पर खड़े लोग चिल्लाने लगते थे। यहां हमारी मुलाकात शब्बीर अहमद से हुई। शब्बीर ने 1 साल पहले ही करीब ढाई लाख रुपए खर्च करके केक बनाने की मशीन लगाई थी। वह कहते हैं- 20-25 दिन पहले हुई बारिश के बाद से ही पानी जमा होना शुरू हुआ था। धीरे-धीरे यह बाढ़ में बदल गया। घर-मशीन सब डूब गए। मशीन का मेन चैंबर खराब हो गया है। सीधे 65 हजार रुपए का नुकसान हो चुका है। बर्नर को जैसे-तैसे बचाकर छत पर रखा है। अब सब कुछ यहीं डूबा है, इसे छोड़कर कहां चले जाएं?’ इलाके की गलियों में दर्जनों कारें पानी में डूबी नजर आईं। शुरुआत में तेज बारिश की वजह से गाड़ियां निकल नहीं पाईं और फिर पानी इतनी तेजी से बढ़ा कि सब कुछ डूब गया। महिला बोली- आप लोग मदद कर रहे हैं… चाय पी लीजिए राहत सामग्री बांटते हुए नाव दाउदनगर के एक दूसरे मोहल्ले की ओर बढ़ी। रास्ते में एक बुजुर्ग सिर पर अपनी शर्ट रखकर गर्दन तक भरे पानी में चले आ रहे थे। पूछने पर उन्होंने बताया- हमारी तरफ नावें नहीं जातीं। इसलिए मजबूरी में राशन लेने के लिए ऐसे ही पानी पार करके जाना पड़ता है। आगे बढ़े, तो दो मंजिला मकान की छत से महिला ने पानी मांगा। दरोगा ने पानी की बोतलें उन तक पहुंचाईं। महिला का नवरात्रि का व्रत था, इसलिए उन्हें केले भी दिए गए। सामान लेने के बाद महिला ने मुस्कुराकर कहा- आप लोग सुबह से इतनी मेहनत कर रहे हैं, थोड़ी देर रुक जाइए... मैं आप सबके लिए चाय बनाकर लाती हूं। जहां हर तरफ सिर्फ शिकायतें सुनने को मिल रही थीं, वहां उस महिला की ये बात नाव पर सवार पूरी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए काफी थी। राशन खत्म होने पर दूर जाती नाव को देखती रहीं नम आंखें दाउदनगर में हाल ही में बना नया 100 बेड वाला अस्पताल भी बाढ़ के पानी में डूब चुका है। हम इस अस्पताल के पीछे वाले हिस्से में पहुंचे। वहां छत पर एक बुजुर्ग दंपती खड़े थे। महिला ने साड़ी से बंधी बाल्टी नीचे गिराई, तो वॉलंटियर्स ने जरूरत का सामान रख दिया। ऊपर से उनके पति ने कहा- भैया, खाने का ये पैकेट किसी ज्यादा जरूरतमंद को दे देना, हमें बस पीने का पानी दे दो। आपदा के इस दौर में भी लोगों के अंदर दूसरों की चिंता और इंसानियत जिंदा दिखी। जब नाव अगले मोहल्ले में पहुंची, तो भूखे-प्यासे लोग कमर तक भरे पानी में दौड़ते हुए नाव के पास आ गए। महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लेकर पहुंचीं। उसी मोहल्ले के दूसरे मोड़ पर बड़ी संख्या में महिलाओं की भीड़ जमा हो गई। किसी के घर में गैस खत्म थी, तो किसी के घर में राशन का एक दाना भी नहीं बचा था। कुछ महिलाएं खुलकर अपनी मजबूरी बता पा रही थीं, तो कुछ झिझक और शर्म की वजह से शांत खड़ी थीं। नाव पर बचा हुआ सारा सामान महिलाओं में बांट दिया गया। लेकिन लाचार लोगों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि आधे लोगों को खाली हाथ ही लौटना पड़ा। ये निराश लोग पानी के बीच खड़े होकर दूर जाती नाव को देखते रहे, इस उम्मीद में कि अगली नाव आएगी तो शायद उन्हें भी दो वक्त का खाना और पीने का पानी मिल पाएगा। पानी सड़ चुका है, बाढ़ खत्म होने पर बीमारी फैलने का खतरा फिलहाल इस भयानक प्राकृतिक आपदा के बीच प्रशासन अपनी पूरी क्षमता से पीड़ितों तक राहत पहुंचाने में जुटा है। हर दिन प्रभावितों के बीच पीने के पानी की 10 हजार से ज्यादा बोतलें, करीब 2 हजार राशन किट, 2 हजार से ज्यादा पके हुए भोजन के पैकेट, जरूरी दवाएं और अन्य सामग्रियां बांटी जा रही हैं। फैजुल्लागंज इलाके में राहत कार्य चलाने के लिए प्रशासन ने 60 से ज्यादा लेखपालों और 100 से ज्यादा पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई है। कई सामाजिक संगठन भी अपनी ओर से मदद पहुंचाने में लगे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले एक हफ्ते में पानी घटने से लोगों को बाढ़ से राहत मिल जाएगी। हालांकि, पानी उतरने के बाद भी चुनौती कम नहीं होगी। पिछले 2 हफ्तों से जमा पानी काला और बदबूदार हो चुका है। घरों के सेप्टिक टैंक चोक हो गए हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद बीमारियां फैलने का खतरा भी रहेगा। ऐसे में पूरे इलाके में तेजी से सैनिटाइजेशन कराना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होगी। -------------------------- यह खबर भी पढ़ें- लखनऊ में हॉस्पिटल डूबा, इकाना तक पहुंची गोमती, आज इंडिया का मैच, 35 हजार दर्शकों के पहुंचने से पहले सड़क पर पानी भरा लखनऊ में गोमती नदी की बाढ़ से हालात बेकाबू हो गए हैं। फैजुल्लागंज का 100 बेड का 4 मंजिला अस्पताल डूब चुका है। लाचार डॉक्टर नाले के किनारे बैठकर संक्रमित मरीजों का इलाज कर रहे हैं। सर्विस लेन में भरे पानी को दिनभर निकाला जाता रहा। पढ़िए बाढ़ पर पूरी रिपोर्ट…

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