मेरठ के गगोल गांव में दशहरे पर नहीं जलते चूल्हे:1857 की क्रांति में 9 पूर्वजों को फांसी देने की मान्यता, शहीदों को याद कर करते हैं हवन

Oct 20, 2026 - 06:13
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मेरठ के गगोल गांव में दशहरे पर नहीं जलते चूल्हे:1857 की क्रांति में 9 पूर्वजों को फांसी देने की मान्यता, शहीदों को याद कर करते हैं हवन
देशभर में दशहरे पर रावण दहन और आतिशबाजी की तैयारियां हैं, लेकिन मेरठ के गगोल गांव में इस दिन शोक मनाया जाता है। शहर से करीब 14 किमी दूर इस गांव के ज्यादातर घरों में दशहरा नहीं मनाया जाता और न ही चूल्हे जलते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने गांव के 9 क्रांतिकारियों को दशहरे के दिन फांसी दी थी। तभी से गांव के लोग इस दिन उत्सव मनाने के बजाय अपने शहीद पूर्वजों को याद करते हैं। दशहरे पर ग्रामीण गगोल तीर्थ पहुंचकर झंडारोहण करते हैं और हवन कर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं। गांव में एक मान्यता यह भी है कि दशहरे के दिन जिस घर में बेटे का जन्म हुआ हो, केवल उसी घर में त्योहार मनाया जाता है। 3 तस्वीरें देखिए…. पीपल के पेड़ से जुड़ी है शहादत की कहानी ग्रामीणों के मुताबिक, गांव के बाहर मौजूद विशाल पीपल के पेड़ पर ही अंग्रेजों ने नौ क्रांतिकारियों को फांसी दी थी। पेड़ के नीचे समाधि भी बनी हुई है। दशहरे के दिन गांव के लोग यहां पहुंचकर अपने शहीद पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं। गगोल गांव, गगोल तीर्थ से करीब एक किलोमीटर दूर है। ग्रामीणों के लिए यह जगह धार्मिक आस्था के साथ स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वजों के बलिदान की याद भी दिलाती है। 1857 की क्रांति के दौरान मेरठ और आसपास के इलाकों में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को कठोर सजा दी जाती थी। ग्रामीणों का कहना है कि गगोल के लोगों ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया था। इसी दौरान क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया और मुकदमे के बाद उन्हें फांसी दे दी गई। ग्रामीणों के मुताबिक, शहीदों में रम्मन सिंह, राम सहाय, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, शिब्बा सिंह, कढ़ेरा सिंह, घसीटा सिंह, बैरम और दरबा सिंह के नाम लिए जाते हैं। दशहरे पर झंडारोहण और हवन कर शहीदों को करते हैं नमन स्थानीय निवासी हरवीर सिंह के मुताबिक, गांव के बुजुर्गों को दशहरे के दिन फांसी दी गई थी। उन्हें पहले जेल में बंद किया गया और फिर मुकदमे के बाद सजा सुनाई गई। इसी घटना की याद में गांव में दशहरा नहीं मनाने की परंपरा चली आ रही है। दशहरे के दिन ग्रामीण गगोल तीर्थ पहुंचते हैं। यहां शहीदों की स्मृति में झंडारोहण और हवन किया जाता है। ग्रामीण अपने पूर्वजों की कुर्बानी को याद करते हैं और नई पीढ़ी को भी इसके बारे में बताते हैं। गांव में यह मान्यता भी प्रचलित है कि दशहरे के दिन जिस घर में बेटे का जन्म हुआ हो, उसी घर में त्योहार मनाया जा सकता है। बाकी गांव में दिन शोक के रूप में बीतता है। देश के ज्यादातर हिस्सों में दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन गगोल में यह दिन आजादी के लिए बलिदान देने वाले क्रांतिकारियों की याद से जुड़ा है।

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