महाअष्टमी पर प्रयागराज के अलोप शंकरी मंदिर में भीड़:चुनरी-नारियल चढ़ाए, दिव्यांग भी पहुंचे; झूले वाली देवी के दर्शन को लगीं कतारें
शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी के पावन अवसर पर तीर्थराज प्रयागराज स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां अलोप शंकरी मंदिर में श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ पड़ा। भोर के चार बजे से ही मंदिर के कपाट खुलते ही भक्तों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गईं। पूरा मंदिर परिसर 'जय माता दी' और 'हर-हर महादेव' के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठा। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और मां का आशीर्वाद पाने के लिए दूर-दराज से आए श्रद्धालु घंटों कतार में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करते नजर आए। मां के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचे भक्त लाल चुनरी, नारियल, फूल-माला और रोली अर्पित कर रहे हैं। कई श्रद्धालु नंगे पांव हाथों में लाल ध्वज (निशान) थामे नाचते-गाते मंदिर पहुंचे। आस्था की इस अविरल धारा में शारीरिक सीमाएं भी आड़े नहीं आईं; बड़ी संख्या में दिव्यांग और बुजुर्ग श्रद्धालु भी परिजनों के सहारे मां के दरबार में माथा टेकने पहुंचे है। नवरात्रि में अष्टमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। ज्योतिषाचार्यों और पुरोहितों के अनुसार, यह दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप 'मां महागौरी' को समर्पित है। मान्यता है कि अष्टमी के दिन मां के दर्शन व पूजन से भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट, रोग और भय दूर होते हैं तथा जीवन में अक्षय सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। अष्टमी के दिन ही घर-घर और मंदिरों में कन्या पूजन की विशेष परंपरा निभाई जाती है। छोटी बालिकाओं को साक्षात् देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन, चरण वंदन और भोज कराया जाता है। प्रयागराज का यह पावन धाम 51 शक्तिपीठों में अत्यंत दुर्लभ माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती का दाहिना पंजा गिरा था और यहीं मां अंतर्ध्यान यानी 'अलोप' हो गई थीं। यही कारण है कि मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक पवित्र झूले (पालने) की पूजा की जाती है। भक्त इस झूले पर रक्षासूत्र बांधकर अपनी मुरादें मांगते हैं। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन और पुलिस बल की ओर से सुरक्षा एवं यातायात के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं, ताकि भक्तों को सुगमता से दर्शन प्राप्त हो सकें।
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