नवरात्रि स्पेशल: कूड़े से चिप्स उठाकर खा रहा था बच्चा:उसे देखकर सोना कपूर ने शुरू किया बच्चों को पढ़ाना; लोगों अधिकारों के लिए करती है जागरुक

Oct 16, 2026 - 11:47
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नवरात्रि स्पेशल: कूड़े से चिप्स उठाकर खा रहा था बच्चा:उसे देखकर सोना कपूर ने शुरू किया बच्चों को पढ़ाना; लोगों अधिकारों के लिए करती है जागरुक
मोनू नाम का बच्चा कूड़े से चिप्स उठाकर खा रहा था। सोना कपूर ने उसे ऐसा करते देखा, तो रोककर पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं आता। वह पहले से बच्चों को पढ़ाती थीं, लेकिन मोनू की हालत ने उन्हें बच्चों की जरूरतों के लिए और गंभीरता से काम करने की प्रेरणा दी। धीरे-धीरे बच्चों को पढ़ाने का काम आगे बढ़ा और उन्हें सद्भावना पार्क में जगह मिली। आज वह ‘फिक्स माई लाइफ फाउंडेशन’ के जरिए बच्चों की पढ़ाई, महिलाओं के सशक्तीकरण और दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रही हैं। कूड़े से चिप्स उठाकर खा रहा था बच्चा, यहीं से मिली प्रेरणा सोना कपूर बताती हैं कि जब वह छोटे बच्चों को पढ़ाती थीं, तब एक दिन उन्होंने मोनू नाम के बच्चे को कूड़े से चिप्स उठाकर खाते देखा। उस समय वहां से एक अधिकारी भी गुजरे थे। उन्होंने सोना से कहा कि वह बच्चे से पूछें कि वह स्कूल क्यों नहीं आता। अधिकारी सोना को पहले भी बच्चों को पढ़ाते हुए देख चुके थे। सोना ने बच्चे से बात की। उनके मुताबिक, मोनू अकेला बच्चा नहीं था, ऐसे कई बच्चे थे जिन्हें पढ़ाई और दूसरी जरूरी सुविधाओं की जरूरत थी। उन्होंने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और धीरे-धीरे यह काम व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ने लगा। सोना बताती हैं कि यही बच्चे उनके लिए प्रेरणा बने। सद्भावना पार्क में मिली जगह सोना के मुताबिक, बाद में उन्हें सद्भावना पार्क में बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह दी गई। इस जगह को धर्मनिरपेक्ष सोच के साथ बनाया गया था। पार्क में मंदिर भी है और मजार भी। उनका मानना था कि जरूरतमंदों की मदद धर्म देखकर नहीं होनी चाहिए। जो भी व्यक्ति जरूरतमंद है, उसे सहायता मिलनी चाहिए। सोना बताती हैं कि कई बार लोगों को पता ही नहीं होता कि सरकार उन्हें राशन कार्ड या दूसरी बुनियादी सुविधाएं दे रही है। कुछ लोग अपनी तरफ से भी जरूरतमंदों की मदद करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि सहायता सही व्यक्ति तक कैसे पहुंचाई जाए। संस्था शुरू करने का उद्देश्य जरूरतमंदों को सुविधाओं से जोड़ना और मदद करने वाले लोगों को लाभार्थियों तक पहुंचने का माध्यम देना भी था। सरकारी नौकरी करना चाहती थीं, फिर समाजसेवा में जुट गईं सोना कपूर बताती हैं कि उन्होंने ग्रेजुएशन के बाद सेल्स एंड मार्केटिंग में एमबीए किया। शादी के बाद बीएड भी पूरा किया। उनकी इच्छा थी कि बीएड के आधार पर उन्हें सरकारी नौकरी मिल जाए। इसके लिए उन्होंने प्रयास किया और उनके नंबर भी अच्छे आए थे। उन्हें इंटरव्यू के लिए भी बुलाया गया था। लेकिन बच्चों और जरूरतमंद परिवारों के बीच काम करते हुए उनकी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा समाजसेवा से जुड़ गया। वह बताती हैं कि संस्था चलाना आसान नहीं है। समाजसेवा में आने के बाद ऐसे लोगों से रोज मुलाकात होती है, जो आर्थिक तंगी, बीमारी, दिव्यांगता या दूसरी परेशानियों से जूझ रहे होते हैं। उनके मुताबिक, जरूरतमंद व्यक्ति को उसी समय जिस चीज की जरूरत है, उसे वही सुविधा मिलनी चाहिए। अगर किसी को अस्पताल में खून की जरूरत है, तो उसे दूसरी चीजें देकर उसकी जरूरत पूरी नहीं की जा सकती। इसलिए उनके लिए समाजसेवा का मतलब जरूरत के समय सही सहायता उपलब्ध कराना है। ‘नीड बैंक’ बनाया, पुराने कपड़ों से लेकर मोबाइल तक पहुंचाए सोना कपूर की संस्था ने ‘नीड बैंक’ नाम से भी काम शुरू किया। इसका उद्देश्य जरूरतमंदों तक ऐसी चीजें पहुंचाना है, जो उनके काम आ सकें। सोना बताती हैं कि उन्होंने लोगों से अपील की कि वे पुराने कपड़े सीधे इधर-उधर देने के बजाय संस्था को दें, ताकि उन्हें जरूरतमंदों तक सही तरीके से पहुंचाया जा सके। संस्था में पुराने कपड़ों को धुलवाया जाता है, जरूरत पड़ने पर प्रेस कराया जाता है और खराब होने पर उनकी मरम्मत भी की जाती है। संस्था में महिलाओं को सिलाई सिखाई जाती है। यहां प्रशिक्षण लेने वाली महिलाएं कपड़ों को ठीक करने में मदद करती हैं। इस तरह कपड़े जरूरतमंदों तक पहुंचते हैं और महिलाओं को काम सीखने का अवसर भी मिलता है। सोना बताती हैं कि नीड बैंक के माध्यम से जरूरतमंदों को लैपटॉप, मोबाइल फोन और साइकिल जैसी चीजें भी दी गई हैं। कोरोना के समय भी मोबाइल फोन उपलब्ध कराने में मदद की गई। उनका कहना है कि अगर किसी व्यक्ति के पास कोई उपयोगी सामान है और वह किसी की मदद करना चाहता है, तो संस्था के माध्यम से उसे जरूरतमंद तक पहुंचाया जा सकता है। मदद सही व्यक्ति तक पहुंचे, इसलिए भरवाते हैं फॉर्म सोना बताती हैं कि संस्था जरूरतमंदों को सामान देने से पहले उनकी जानकारी जुटाती है। इसके लिए एक फॉर्म भरवाया जाता है। इसमें राशन कार्ड और जरूरतमंद होने से संबंधित जानकारी, गवाह तथा पासपोर्ट साइज फोटो ली जाती है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मदद सही व्यक्ति तक पहुंचे। सोना के मुताबिक, जो व्यक्ति सामान दे रहा है, उसे भी भरोसा होना चाहिए कि उसकी मदद जरूरतमंद तक पहुंची है। संस्था इस प्रक्रिया के जरिए मदद करने वालों और लाभार्थियों के बीच एक माध्यम का काम करती है। महिलाओं को सिलाई, ब्यूटीशियन का प्रशिक्षण संस्था में महिला सशक्तीकरण के लिए सिलाई और ब्यूटीशियन जैसे प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं। सोना बताती हैं कि महिलाएं यहां हुनर सीखती हैं और फिर उसी हुनर से कमाई करने की कोशिश करती हैं। संस्था की ओर से लड़कियों और महिलाओं के लिए स्वास्थ्य शिविर भी लगाए जाते हैं। डॉक्टरों और दूसरे विशेषज्ञों को बुलाकर उन्हें पोषण, खानपान और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दी जाती है। सोना कहती हैं कि कई घरों में लड़कियों को लड़कों की तुलना में अच्छा खाना नहीं मिलता। बेटों के खानपान पर ध्यान दिया जाता है, जबकि बेटियों की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। उनके मुताबिक, लड़कियों को यह जानकारी देना जरूरी है कि उन्हें कितना प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा चाहिए। मासिक धर्म या किसी दूसरी स्वास्थ्य समस्या पर भी कई लड़कियां खुलकर बात नहीं कर पातीं। ऐसे में महिला डॉक्टरों को बुलाकर उन्हें सही जानकारी देने की कोशिश की जाती है, ताकि वे समय पर डॉक्टर से संपर्क कर सकें। दिव्यांग को मसालों का काम शुरू कराया सोना कपूर बताती हैं कि संस्था का काम केवल सहायता देने तक सीमित नहीं है। कोशिश यह रहती है कि जरूरतमंद व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो सके। वह एक दृष्टिबाधित व्यक्ति का उदाहरण देती हैं, जिन्हें मसाले बनाने का काम शुरू करने का सुझाव दिया गया। सोना के मुताबिक, शुरुआत में उन्हें मसाले पीसने के लिए पांच मिक्सर-ग्राइंडर दिलवाए गए। इसके बाद मसाले तैयार करने, उनकी पैकेजिंग करने और पैकेट बनवाने का काम शुरू हुआ। धीरे-धीरे उनके मसाले शहर में बिकने लगे। सोना बताती हैं कि अब उस व्यक्ति के घर का खर्च इसी काम से चलता है। उनका कहना है कि दिव्यांग व्यक्ति को केवल सहानुभूति की नहीं, बल्कि ऐसा अवसर देने की जरूरत है, जिससे वह खुद कमाई कर सके। जब व्यक्ति आत्मनिर्भर बनता है, तो उसके परिवार की स्थिति भी बदलती है। दिव्यांगों दिलाती है सरकारी सहायता सोना बताती हैं कि संस्था के माध्यम से कई लोगों को अलग-अलग तरह की सहायता मिली है। वह माया नाम की एक मूक-बधिर महिला का उदाहरण देती हैं, जो संस्था में आती हैं। सोना के अनुसार, उनकी शादी के समय सरकारी सहायता की प्रक्रिया के बारे में जानकारी दिलाई गई थी। अब उनका एक बच्चा भी है। इसके अलावा संस्था के माध्यम से कुछ जरूरतमंदों को व्हीलचेयर और ट्राइसाइकिल दिलाने में मदद की गई। लड़कियों को साइकिल मिली, ताकि वे अपने काम या पढ़ाई के लिए आसानी से आ-जा सकें। सोना एक ऐसे विद्यार्थी का भी जिक्र करती हैं, जिसकी आर्थिक स्थिति के कारण इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी रह सकती थी। संस्था से जुड़े लोगों की मदद से उसे मोबाइल फोन उपलब्ध कराया गया। सोना बताती हैं कि उस विद्यार्थी ने अपनी इंजीनियरिंग पूरी की और अब नौकरी कर रहा है। उनके मुताबिक, ऐसे सैकड़ों बच्चे और जरूरतमंद लोग हैं, जिन्हें किसी न किसी रूप में मदद मिली है। सोना बताती हैं कि कई बार दिव्यांग लोगों और उनके परिवारों को सरकारी योजनाओं की जानकारी नहीं होती। संस्था उन्हें दिव्यांगता प्रमाणपत्र, यूडीआईडी कार्ड और उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी देने का प्रयास करती है। उनके मुताबिक, जरूरी दस्तावेज होने पर पात्र लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकता है। संस्था का काम लोगों को यह समझाना भी है कि उन्हें किन सुविधाओं के लिए आवेदन करना चाहिए और प्रक्रिया क्या है। सोना कहती हैं कि सिर्फ जानकारी देना पर्याप्त नहीं है, जरूरतमंदों को सुविधाएं प्राप्त करने की प्रक्रिया में भी सहयोग देना पड़ता है। बेटियों के पोषण और पढ़ाई पर भी देती हैं जोर सोना के मुताबिक, समाज में बेटियों को लेकर सोच में बदलाव आया है, लेकिन कई परिवारों में अभी भी लड़कियों के पोषण, पढ़ाई और सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। कुछ परिवार बच्चों को कमाई का जरिया मानते हैं। ऐसे में लड़कियों को भी शिक्षा और हुनर के जरिए आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए। वह कहती हैं कि लड़कियों को पोषण देना, उनकी पढ़ाई सुनिश्चित करना और उन्हें सुरक्षित माहौल देना बेहद जरूरी है। संस्था की कोशिश है कि जरूरतमंद परिवारों को इन विषयों पर जागरूक किया जाए, ताकि लड़कियां भी आत्मनिर्भर बन सकें। गांव के बच्चों की जन्मतिथि से लेकर पढ़ाई तक की समस्या सोना ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की पढ़ाई से जुड़ी एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाती हैं। उनके मुताबिक, कुछ जगहों पर बच्चों के जन्म के समय उनकी जन्मतिथि दर्ज नहीं होती। स्कूल में दाखिले के समय उम्र दर्ज होने से उनकी पढ़ाई और कक्षा के बीच अंतर पैदा हो सकता है। वह बताती हैं कि कई बार उम्र में बड़े बच्चे भी छोटी कक्षाओं में पढ़ते हैं। ऐसे बच्चों को दूसरे बच्चों के साथ तालमेल बैठाने में परेशानी होती है। सोना का मानना है कि बच्चों के दस्तावेज और शिक्षा से जुड़ी प्रक्रियाओं को समय पर पूरा करना जरूरी है, ताकि वे पढ़ाई में पीछे न रह जाएं। जरूरतमंदों को जोड़ने के लिए दानदाताओं और संस्थाओं की मदद सोना कपूर बताती हैं कि संस्था को चलाने के लिए अलग-अलग शहरों में रहने वाले दानदाताओं और सामाजिक संगठनों से मदद ली जाती है। बनारस के अलावा दिल्ली, गुरुग्राम और दूसरे शहरों में रहने वाले लोग भी सहयोग करते हैं। संस्था रोटरी, भारत विकास परिषद, राउंड टेबल और विभिन्न सामाजिक समुदायों से जुड़े लोगों के साथ मिलकर जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने का काम करती है। इसमें बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य शिविर, महिलाओं का प्रशिक्षण और दिव्यांगों को जरूरी सामान उपलब्ध कराना शामिल है। सोना के मुताबिक, कभी किसी बच्चे को आने-जाने के लिए वाहन की जरूरत होती है, तो कभी किसी परिवार को दूसरी सुविधा की। ऐसी जरूरतों के लिए दानदाताओं से संपर्क किया जाता है। उनका प्रयास है कि आर्थिक परेशानी या दिव्यांगता के कारण कोई बच्चा या महिला संस्था तक पहुंचने से वंचित न रह जाए। परिवार के साथ समाजसेवा के लिए भी निकालती हैं समय सोना मानती हैं कि समाजसेवा का काम चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इसमें समय की कोई तय सीमा नहीं होती। वह सुबह संस्था जाती हैं और जरूरत के अनुसार दिन में या शाम को भी काम करती हैं। कभी दानदाता से मिलना होता है, तो कभी किसी लाभार्थी की जरूरत पूरी करने के लिए जाना पड़ता है। उनकी दो बेटियां हैं। एक बेटी की शादी हो चुकी है और दूसरी दिल्ली में पढ़ती है। सोना बताती हैं कि संयुक्त परिवार होने और परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से उन्हें काम आगे बढ़ाने में मदद मिली। वह कहती हैं कि समाजसेवा में सबसे जरूरी है जरूरतमंद की वास्तविक जरूरत को समझना। उनके लिए उद्देश्य सिर्फ किसी को सहायता देना नहीं, बल्कि उसे इस स्थिति तक पहुंचाना है कि वह आगे चलकर खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके और समाज में अपनी भूमिका निभा सके।

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