पितृपक्ष पर सैकड़ो श्रद्धालुओं ने किया पितरों का तर्पण:उन्नाव में गंगा तटों पर उमड़ी भीड़, विशेष फलदायी माना जाता है यह दिन
उन्नाव में पितृपक्ष के 13वें दिन गुरुवार को गंगा तटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ रही। लोगों ने आस्था के साथ गंगा स्नान कर अपने पितरों का तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किया। मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के निमित्त किए गए तर्पण से उन्हें तृप्ति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। पितृपक्ष के 13वें दिन गंगा तट पर तर्पण करना विशेष फलदायी माना जाता है। सुबह से ही गंगाघाट, शुक्लागंज और आसपास के विभिन्न घाटों पर श्रद्धालु पहुंचने लगे। लोगों ने गंगा में स्नान के बाद पितरों का स्मरण किया। इसके बाद गंगाजल, काले तिल, कुश, पुष्प और जल से विधि-विधान के साथ तर्पण किया। कई परिवारों ने पुरोहितों के निर्देशन में पिंडदान और श्राद्ध कर्म भी कराया। घाटों पर धार्मिक अनुष्ठान और मंत्रोच्चार से वातावरण भक्तिमय नजर आया। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना महत्व होता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाता, उनके लिए भी पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा है। तर्पण करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति गंगा तट पर किए गए कर्मकांड को विशेष पुण्यदायी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि गंगा में तर्पण करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगा तट पर पहुंचे परिवारों में बुजुर्गों के साथ बच्चे और युवा भी नजर आए। बुजुर्गों ने उन्हें पितृ तर्पण की विधि और पूर्वजों के प्रति सम्मान की परंपरा के बारे में बताया। परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाना जरूरी लोगों ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बावजूद पितरों के प्रति श्रद्धा और परिवार की परंपराओं को आगे बढ़ाना जरूरी है। श्रद्धालुओं ने तर्पण के बाद जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और दक्षिणा भी दान की। कई लोगों ने गाय को चारा खिलाया और ब्राह्मणों को भोजन कराया। प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर घाटों पर सुबह से दोपहर तक धार्मिक गतिविधियां चलती रहीं। गंगा किनारे सुरक्षा और साफ-सफाई को लेकर भी लोग सजग दिखाई दिए। श्रद्धालुओं का कहना था कि पितृपक्ष केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। यही वजह है कि पितृपक्ष के 13वें दिन गंगा तट पर पहुंचकर तर्पण करने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।
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