बच्चों का इंटरनेट इस्तेमाल मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी!

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच बच्चों के मौलिक अधिकारों से जुड़ी है और उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना उचित नहीं होगा। अदालत ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए अभिभावकों की निगरानी, निजी खाते, उम्र के अनुसार सुरक्षा उपाय और बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को हटाने की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया। इन उपायों को लागू करने का तरीका केंद्र सरकार तय कर सकती है।

Oct 17, 2026 - 14:24
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बच्चों का इंटरनेट इस्तेमाल मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी!

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 17 अक्टूबर 2026

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच बच्चों का भी मौलिक अधिकार है। बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के नाम पर उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह वंचित करना उचित समाधान नहीं है। न्यायालय के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता दोनों महत्वपूर्ण हैं। इसलिए ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जिससे बच्चे इंटरनेट का लाभ उठा सकें और उन्हें यौन शोषण, अनुचित सामग्री तथा अन्य ऑनलाइन खतरों से भी सुरक्षित रखा जा सके।

बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े मामले में यह महत्वपूर्ण बात कही। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट आज शिक्षा, जानकारी हासिल करने और विचारों को व्यक्त करने का एक प्रमुख माध्यम बन चुका है। ऐसे में बच्चों को इससे पूरी तरह दूर रखना उनके विकास और सीखने के अवसरों को प्रभावित कर सकता है। अदालत ने जोर दिया कि बच्चों को सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना जरूरी है।

 संविधान के तहत इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार

न्यायालय ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और अनुच्छेद 21 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लेख किया। अदालत ने इंटरनेट तक पहुंच को इन अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय माना। पीठ के अनुसार, बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह वंचित करने के बजाय उनके लिए सुरक्षित इस्तेमाल की व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए। इसके लिए ऑनलाइन मंचों पर मौजूद खतरों को कम करना और बच्चों के हितों की रक्षा करना आवश्यक है।

 इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने से बढ़ सकती हैं मुश्किलें

सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने के अनचाहे परिणाम हो सकते हैं। प्रतिबंध के बावजूद बच्चे छिपकर इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं और ऐसे असुरक्षित मंचों तक पहुंच सकते हैं, जहां उनकी सुरक्षा को अधिक खतरा हो। ऐसी परिस्थितियों में बच्चे ऑनलाइन धमकी, उत्पीड़न या शोषण की जानकारी अपने माता-पिता और भरोसेमंद लोगों को देने से भी डर सकते हैं। इसलिए अदालत ने पूर्ण प्रतिबंध के बजाय सुरक्षा और जागरूकता पर आधारित उपायों की आवश्यकता पर बल दिया।

दूरदराज के बच्चों के लिए इंटरनेट शिक्षा का प्रमुख साधन

न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि शिक्षा, रचनात्मकता और जानकारी हासिल करने का भी महत्वपूर्ण साधन है। दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले कई बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने और जरूरी जानकारियां प्राप्त करने का एकमात्र उपलब्ध माध्यम हो सकता है। इसके जरिए वे शैक्षणिक सामग्री तक पहुंच सकते हैं और अपनी प्रतिभा विकसित कर सकते हैं। विशेष जरूरतों वाले बच्चों को भी इंटरनेट के माध्यम से दूसरे लोगों से जुड़ने और अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिलता है।

बच्चों के सामाजिक माध्यम खातों पर अभिभावकों की निगरानी

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए उम्र के अनुसार अलग-अलग उपाय अपनाने का सुझाव दिया। पीठ के अनुसार, बच्चों के सामाजिक माध्यम खातों के लिए माता-पिता की सहमति और उचित निगरानी की व्यवस्था की जा सकती है। बच्चों के खाते प्रारंभ से ही निजी रखे जा सकते हैं, ताकि अनजान लोग आसानी से उनसे संपर्क न कर सकें। इसके अलावा, बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री और विज्ञापनों पर नियंत्रण तथा छोटे बच्चों के लिए अलग बाल-सुरक्षा व्यवस्था भी उपयोगी हो सकती है।

 हानिकारक सामग्री से बच्चों को बचाने की जिम्मेदारी

अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए इंटरनेट मंचों पर मौजूद कमियों को दूर करना जरूरी है। बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री की पहचान कर उसे हटाने की व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए। इसके लिए संबंधित संस्थाओं और ऑनलाइन मंचों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है। न्यायालय ने ऐसी सामग्री को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

आपत्तिजनक सामग्री की पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से संबंधित सामग्री की पहचान और उसे हटाने में सहायता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक डेटाबेस तैयार करने सहित आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए। ऐसी व्यवस्था से विभिन्न सामाजिक माध्यमों पर मौजूद अवैध सामग्री की पहचान करने और उसके प्रसार को रोकने में मदद मिल सकती है। इसका उद्देश्य बच्चों को शोषण और दुर्व्यवहार से बचाना तथा ऑनलाइन मंचों को अधिक सुरक्षित बनाना है। इस दिशा में प्रभावी कार्यवाही के लिए संबंधित पक्षों की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण होगी।

केंद्र सरकार तय करेगी सुरक्षा उपाय लागू करने का तरीका

न्यायालय ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कई संभावित उपाय सुझाए, लेकिन उन्हें लागू करने की विस्तृत व्यवस्था केंद्र सरकार पर छोड़ी। सरकार उम्र के आधार पर सुरक्षा उपाय निर्धारित कर सकती है और बच्चों को वयस्कों के लिए बनी सामग्री तथा अन्य हानिकारक सेवाओं से दूर रखने के लिए उचित प्रतिबंध लगा सकती है। अदालत की टिप्पणी का मुख्य उद्देश्य बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर करने के बजाय सुरक्षित उपयोग के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार करना जरूरी है।

पुराने फैसलों का भी किया गया उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में वर्ष 2020 के अनुराधा भसीन मामले और वर्ष 2025 के प्रज्ञा प्रसून मामले का भी उल्लेख किया। इन फैसलों में इंटरनेट तक पहुंच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल पहुंच से जुड़े अधिकारों पर विचार किया गया था। वर्तमान मामले में भी अदालत ने बच्चों की सुरक्षा के साथ उनके अधिकारों को ध्यान में रखने की जरूरत बताई। न्यायालय का दृष्टिकोण इस बात पर केंद्रित रहा कि तकनीक से मिलने वाले लाभ बच्चों तक पहुंचें और उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाने के प्रभावी उपाय भी मौजूद रहें।

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