132 साल बाद पूर्वजों का पता लगाएगा BHU:1894 में गिरमिटिया मजदूर बनकर सूरीनाम गए थे पूर्वज रामनंदन और राजवंतिया

Oct 15, 2026 - 10:05
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132 साल बाद पूर्वजों का पता लगाएगा BHU:1894 में गिरमिटिया मजदूर बनकर सूरीनाम गए थे पूर्वज रामनंदन और राजवंतिया
सात समंदर पार सूरीनाम में बसे एक परिवार को 132 साल बाद अपने पूर्वजों की जन्मभूमि तक पहुंचने का मौका मिला है। पूर्वजों की जड़ों की तलाश में जॉन मोहनलाल रामनंदनलाल और शारदा रामनंदनलाल भारत पहुंचे हैं। परिवार ने वाराणसी आने के बाद गाजीपुर के खानपुर गांव का दौरा किया। अब उन्हें बीएचयू की ज्ञान लैब में दिए गए डीएनए सैंपल के नतीजों का इंतजार है, जिससे खानपुर में संभावित रक्त संबंधों की वैज्ञानिक पुष्टि हो सके। परिवार की यह यात्रा 70 वर्षीय पिता के उस सपने को पूरा करने के लिए है, जो वह लंबे समय से संजोए हुए थे। उनकी इच्छा थी कि वे अपने पूर्वजों की उस मिट्टी को देखें, जहां से उनके परिवार की कहानी शुरू हुई थी। डॉ. पवन की मदद से परिवार बनारस पहुंचा और फिर गाजीपुर के खानपुर गांव जाकर स्थानीय लोगों से मुलाकात की। 1894 में जहाज से सूरीनाम पहुंचे थे पूर्वज जॉन मोहनलाल के मुताबिक, उनके पूर्वज रामनंदन और उनकी पत्नी राजवंतिया गाजीपुर जिले के सैदपुर थाना क्षेत्र स्थित खानपुर गांव के रहने वाले थे। वर्ष 1894 में दोनों गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम गए थे। उस समय रामनंदन की उम्र 24 वर्ष थी, जबकि राजवंतिया 22 वर्ष की थीं। परिवार के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रामनंदन के पिता का नाम होरोपुरसाद यानी हरि प्रसाद था। राजवंतिया के पिता का नाम बरम चारीलाल बताया गया है। दोनों कायस्थ समुदाय से थे। 25 अगस्त 1894 को रामनंदन और राजवंतिया कलकत्ता से 'एम्स' नामक अंग्रेजी जहाज पर सवार होकर सूरीनाम के पारामारिबो के लिए रवाना हुए थे। करीब 89 दिनों की समुद्री यात्रा के बाद वे 22 नवंबर 1894 को वहां पहुंचे। इसके बाद उन्हें निकेरी जिले के वाटरलू बागान में काम पर रखा गया। बेटे ने चुना था रामनंदनलाल उपनाम परिवार के इतिहास में एक अहम पड़ाव 20 दिसंबर 1911 को आया, जब रामनंदन और राजवंतिया ने विवाह किया। उनके बेटे जयकरम ने 15 अक्तूबर 1934 को आधिकारिक रूप से 'रामनंदनलाल' उपनाम अपनाया। इसके बाद से यह उपनाम परिवार की पहचान बना हुआ है और आज भी पीढ़ियों से चला आ रहा है। सूरीनाम में बसने के बाद परिवार के पास अपने पूर्वजों के बारे में सीमित जानकारी ही बची थी। उन्हें यह भी पता नहीं था कि भारत में अपने परिवार की तलाश कहां से शुरू करें। अब खानपुर पहुंचकर उन्होंने पूर्वजों के गांव और वहां के लोगों से जुड़ने की कोशिश की है। डीएनए जांच से रिश्तों की पुष्टि की उम्मीद पूर्वजों की वंशावली को लेकर उपलब्ध जानकारियों की वैज्ञानिक पुष्टि के उद्देश्य से परिवार ने बुधवार को बीएचयू की ज्ञान लैब में प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को डीएनए सैंपल दिया। परिवार को उम्मीद है कि जांच के नतीजों से खानपुर के लोगों के साथ उनके संभावित रक्त संबंधों का पता लगाने में मदद मिलेगी।

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