1800 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार:गोरखपुर की 'अम्मा' ने 450 मुस्लिमों को दी मिट्टी, बेसहारा बुजुर्ग की सेवा से मिली राह
गोरखपुर की रहने वाली पुष्पलता सिंह उर्फ अम्मा ने अब तक 1800 से ज्यादा लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। जिसमें करीब 450 शव मुस्लिम समुदाय के थे। उन्होंने उनको मिट्टी दी। 55 साल की अम्मा पिछले चार साल से इस काम में निः स्वार्थ भाव से जुड़ी हैं। उन्होंने अकेले ही यह काम करना शुरू किया था लेकिन अब उनकी मदद नगर निगम और पुलिस पुलिस प्रशासन भी करता है। पुष्पलता सिंह ने बताया कि हाल ही उन्होंने एक ऐसे शव की अंत्येष्टि भी की है, जिसकी पहचान तो हो गई थी लेकिन परिवार गरीब था। इसलिए अंतिम संस्कार करने में सक्षम नहीं था। साथ ही परिवार में शव को मुखाग्नि देने के लिए कोई पुरुष भी नहीं था। एक घटना ने बदल दी जिंदगी की राह
पुष्पलता सिंह की इस अनोखी सेवा यात्रा की शुरुआत करीब चार साल पहले हुई थी। उन्होंने सड़क के किनारे एक बेहद बीमार और लाचार बुजुर्ग को तड़पते हुए देखा। तमाशा देख रही भीड़ से अलग, वे उस बुजुर्ग को अपने घर ले आईं। उन्होंने खुद उनका इलाज कराया और पूरे दिल से सेवा की। लगभग एक साल बाद जब उन बुजुर्ग की मौत हो गई, तो उनके परिवार का कोई पता नहीं चला। ऐसे में पुष्पलता ने खुद उनका अंतिम संस्कार करने का फैसला किया। इस घटना ने उनके सोचने का तरीका बदल दिया और उन्होंने तय किया कि वे हर बेसहारा इंसान को सम्मानजनक विदाई देंगी। रूढ़ियों को दी चुनौती, हर धर्म का करती हैं सम्मान
पुष्पलता का कहना है कि हमारे समाज में महिलाओं का श्मशान घाट जाना या मुखाग्नि देना आज भी आम नहीं माना जाता। उन्होंने इन परंपराओं को पीछे छोड़कर खुद शवों को कंधा देना और मुखाग्नि देना शुरू किया। उनकी सेवा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे जाति और धर्म के बंधनों से ऊपर उठकर काम करती हैं। अगर मृत व्यक्ति हिंदू है, तो वे पूरे विधि-विधान से दाह-संस्कार करती हैं। वहीं, अगर शव किसी मुस्लिम का है, तो वे पूरे आदर के साथ उसे सुपुर्दे-खाक (दफन) करवाती हैं। वे केवल अंतिम संस्कार करके रुक नहीं जातीं, बल्कि अगले दिन श्मशान जाकर अस्थियों को चुनती हैं और उन्हें पवित्र नदियों में विसर्जित भी करती हैं। 'मातृ आंचल सेवा संस्थान' से मिल रहा जिंदगी को सहारा मृतकों को विदाई देने के साथ-साथ पुष्पलता जीवित बेसहारा लोगों की मदद के लिए भी लगातार काम कर रही हैं। उन्होंने 'मातृ आंचल सेवा संस्थान' नाम से एक आश्रम बनाया है। इस संस्था के जरिए वे 'अम्मा थाली' चलाती हैं, जो सड़क किनारे रहने वाले भूखे और गरीब लोगों को मुफ्त भोजन देती है। इसके अलावा, सड़कों पर एक्सीडेंट में घायल हुए इंसानों या बेसहारा जानवरों को अपने आश्रम लाकर उनका इलाज करवाना उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। पुष्पलता ने मानवता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए जीते जी अपने अंगों और शरीर को दान करने का शपथ पत्र भी भरा है, ताकि मरने के बाद भी वे किसी के काम आ सकें। प्रशासन का साथ और मिला 'कर्मवीर अवार्ड'
शुरुआत में पुष्पलता ने यह नेक काम बिना किसी प्रचार के अकेले ही शुरू किया था। लेकिन जब उनके इस हौसले और जज्बे की जानकारी जिला प्रशासन को मिली, तो उन्होंने पुष्पलता के साथ मिलकर 'अंतिम ममता अभियान' की शुरुआत की। अब लावारिस शवों की सूचना मिलने पर पुलिस और अस्पताल प्रशासन सीधे उनसे संपर्क करता है। उनके इस निस्वार्थ मानवीय कार्य के लिए हाल ही में उन्हें मुंबई के एक बड़े समारोह में प्रतिष्ठित 'कर्मवीर अवार्ड' से भी नवाजा गया है। साथ ही लोकल लेवल पर भी बहुत जगहों से सम्मान मिला है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)