अखिलेश बोले- बात सीट की नहीं, जीत की:तय ये करना है कि जीत 'गठबंधन' की हो; भाजपा बोली- ये 'लठबंधन' है

Oct 04, 2026 - 12:54
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अखिलेश बोले- बात सीट की नहीं, जीत की:तय ये करना है कि जीत 'गठबंधन' की हो; भाजपा बोली- ये 'लठबंधन' है
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कांग्रेस से गठबंधन को लेकर अपनी राय स्पष्ट कर दी है। उन्होंने रविवार, 4 अक्टूबर को 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा- ‘बात सीट की नहीं, जीत की है। लड़ाई इस बात की नहीं है कि किसे कितनी सीटें मिलेंगी, बल्कि असली मकसद गठबंधन की जीत तय करना है।’ अखिलेश यादव का ये बयान ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस और सपा के बीच सीटों को लेकर तल्खी बढ़ती दिख रही थी। वहीं, दूसरी ओर भाजपा इस 'गठबंधन' को 'लठबंधन' बताया है। सपा की रणनीति जिताऊ उम्मीदवार को ही मिले टिकट यूपी के सियासी गलियारों में पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और सपा के बीच सीट शेयरिंग को लेकर खींचतान की खबरें आ रही थीं। कांग्रेस पार्टी आगामी चुनाव को लेकर ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी ठोक रही है और सपा पर दबाव बना रही है। सपा का मानना है कि सीटों की गिनती से ज्यादा जरूरी ये देखना है कि कौन सी सीट पर किस पार्टी का प्रत्याशी मजबूत है। भाजपा को कौन हरा सकता है। ऐसे माहौल में अखिलेश यादव ने खुद सामने आकर स्थिति को संभालने की कोशिश की है। उन्होंने अपने बयान से ये जताने की कोशिश की है कि सपा बड़े दिल के साथ गठबंधन को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है, लेकिन शर्त बस इतनी है कि उम्मीदवार जिताऊ होना चाहिए। अखिलेश पहले भी कई मौकों पर कह चुके हैं कि "टिकट सिर्फ उसी को मिलेगा जो भाजपा को हराने का दम रखता हो।" अखिलेश बोले- देश में साम्प्रदायिकता रोकना जरूरी अखिलेश ने अपने पोस्ट में लिखा, मकसद जब साफ हो तो हाथ-में-हाथ होता है, निगाह मंजिल पर हो तो सफर आसान होता है! बात बड़ी ये नहीं है कि गठबंधन में कितनी सीटें या कौन सी सीट किसके पास जा रही है, बात बड़ी ये है कि हम सबको ये सुनिश्चित करना है कि जीत गठबंधन की हो। फिर दोहराते हैं: बात सीट की नहीं जीत की है। उन्होंने आगे लिखा कि ये जीत सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल की नहीं होगी, बल्कि उस साझा संघर्ष की जीत होगी जो लगातार जमीन पर जारी है। इस संघर्ष का असली मकसद देश में साम्प्रदायिकता को रोकना, संविधान, लोकतंत्र और आरक्षण पर आ रही 'भाजपाई आंच' से देश को बचाना और सौहार्द को बढ़ावा देना है। भाजपा का पलटवार- ‘ये गठबंधन नहीं, लठबंधन है’ अखिलेश यादव के ‘जीत वाले फॉर्मूले’ पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा- 'सपा और कांग्रेस का ये गठबंधन असल में 'लठबंधन' बन चुका है, जहां दोनों दलों के नेता एक-दूसरे पर बयानों के तीर चला रहे हैं।' भाजपा प्रवक्ता ने दावा किया कि दोनों पार्टियों के बीच हालात बिगड़ चुके हैं। आपस में सीधी बातचीत तक बंद है और अब अखिलेश यादव को सोशल मीडिया के जरिए अपने सहयोगियों को नसीहत देनी पड़ रही है। भाजपा ने आरोप लगाया कि सपा-कांग्रेस दोनों ही दल अहंकार से भरे हुए हैं। सपा के नेता कांग्रेस को और कांग्रेस के नेता सपा को उसकी 'हैसियत' दिखाने में लगे हुए हैं। अखिलेश के बयान के 3 बड़े सियासी मायने हैं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव का ये पोस्ट महज एक आम बयान नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी रणनीतिक सोच है। 1. कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव- अखिलेश यादव ने 'जीत' को 'सीटों की संख्या' से ऊपर रखकर गेंद कांग्रेस के पाले में डाल दी है। अब अगर कांग्रेस ज्यादा सीटों की जिद करती है, तो उस पर गठबंधन को कमजोर करने का आरोप लग सकता है। सपा ये संदेश देने में कामयाब रही है कि वह समझौते के लिए तैयार है, बशर्ते कांग्रेस व्यावहारिक रुख अपनाए। 2. 'जिताऊ उम्मीदवार' का कार्ड- सपा साफ कर चुकी है कि वह केवल नाममात्र के लिए सीटें नहीं बांटेगी। अगर किसी सीट पर कांग्रेस का आधार कमजोर है, तो सपा वह सीट कांग्रेस को देने के मूड में नहीं है। अखिलेश का ये फॉर्मूला उन सीटों पर सपा का दावा मजबूत करता है जहां उसका कैडर ज्यादा सक्रिय है। 3. संविधान और PDA के मुद्दे पर एकजुटता- अखिलेश यादव लगातार संविधान, लोकतंत्र, आरक्षण और सौहार्द की बात कर रहे हैं। वे अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और 'जय संविधान' के नैरेटिव से हटना नहीं चाहते। उनका मानना है कि भाजपा को घेरने के लिए विचारधारा की ये लड़ाई सीटों के गणित से कहीं ज्यादा बड़ी है। ------------- ये भी पढ़ें- पूर्व IAS दिव्या मित्तल कहां से चुनाव लड़ेंगी:मिर्जापुर से ताल ठोकेंगी या राजा भैया के साथ जाएंगी; क्या नई पार्टी बनाकर करेंगी राजनीति पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल राजनीति में कदम रखेंगी। राजा भैया के साथ वायरल तस्वीर और मिर्जापुर में अनुप्रिया पटेल से पुराने विवाद ने सियासी गलियारों में अटकलें तेज कर दी हैं। सपा-कांग्रेस की ओर से उन्हें पार्टी में शामिल होने का ऑफर भी मिल चुका है। इसके बावजूद वो किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं होना चाहतीं। इसके बाद लोगों के जेहन में 3 बड़े सवाल हैं। इनके जवाब सिलसिलेवार जानिए…

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