बैंक की नौकरी में इतना दबाव क्यों? 10 साल में 500 से ज्यादा मौतों का दावा

बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ते काम के दबाव, कठिन लक्ष्यों, कर्मचारियों की कमी और आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर चिंता बढ़ रही है। बैंक कर्मचारी संगठनों के अनुसार पिछले एक दशक में 500 से अधिक बैंक कर्मचारियों ने आत्महत्या की है और 2021 के बाद ऐसे मामलों में बढ़ोतरी देखी गई। कर्मचारी संगठन काम के घंटे कम करने, सभी शनिवार को अवकाश, खाली पदों पर भर्ती और कार्यस्थल के दबाव को कम करने की मांग कर रहे हैं।

Oct 05, 2026 - 16:46
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बैंक की नौकरी में इतना दबाव क्यों? 10 साल में 500 से ज्यादा मौतों का दावा

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 5 अक्टूबर 2026


देश के बैंकिंग क्षेत्र में कर्मचारियों पर बढ़ते काम के दबाव, कठिन लक्ष्यों, कर्मचारियों की कमी और आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर चिंता बढ़ रही है। बैंक कर्मचारी संगठनों के अनुसार पिछले एक दशक में 500 से अधिक बैंक कर्मचारियों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। वहीं, 2021 के बाद सामने आए मामलों में बढ़ोतरी का दावा किया जा रहा है। ऐसे में बैंक कर्मचारी संगठन काम के घंटे तय करने, भर्ती बढ़ाने और कार्यस्थल के दबाव को कम करने की मांग कर रहे हैं।

चेन्नई की घटना ने फिर उठाए गंभीर सवाल

चेन्नई में इंडियन बैंक के 57 वर्षीय मुख्य प्रबंधक कनिष्क बाजपेई की बैंक की चौथी मंजिल से गिरकर मौत के बाद बैंक कर्मचारियों के काम के दबाव और मानसिक तनाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है। घटना से पहले उनके परिवार से बातचीत होने की बात सामने आई है। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि बैंकिंग क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों पर कितना दबाव है और उसकी निगरानी के लिए क्या व्यवस्था है।

10 साल में 500 से अधिक आत्महत्या के दावे

बैंक एम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ इंडिया के अनुसार, पिछले करीब एक दशक में देशभर में 500 से अधिक बैंक कर्मचारियों ने आत्महत्या की है। संगठन से जुड़े आंकड़ों में 2024 में करीब 15 और 2025 में 30 से अधिक मामलों का उल्लेख किया गया है। जनवरी 2025 के शुरुआती नौ दिनों में ही चार बैंक कर्मचारियों की आत्महत्या की बात कही गई थी।हालांकि, 2014 से 2026 तक के करीब 90 मामलों वाला एक अलग आंकड़ा भी बैंकिंग क्षेत्र में प्रसारित हो रहा है। इसमें 2021 के बाद मामलों में तेजी आने का दावा किया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आंकड़ा सरकार का आधिकारिक अखिल भारतीय आंकड़ा नहीं है, इसलिए इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

बैंक कर्मचारियों पर इतना दबाव क्यों

1. कठिन लक्ष्य और प्रदर्शन का दबाव

बैंक कर्मचारियों को केवल जमा और ऋण से जुड़े लक्ष्य ही पूरे नहीं करने होते, बल्कि बीमा, ऋण कार्ड, निवेश योजनाओं और सरकारी योजनाओं से जुड़े लक्ष्य भी दिए जाते हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि लक्ष्य पूरा नहीं होने पर वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से लगातार दबाव बनाया जाता है। कई कर्मचारी संगठनों का कहना है कि इस तरह का दबाव लंबे समय तक रहने पर काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बिगड़ जाता है।

2. कर्मचारियों की कमी से बढ़ रहा काम

सरकारी बैंकों में हजारों पद खाली होने का दावा कर्मचारी संगठनों की ओर से किया जाता रहा है। दूसरी ओर बैंक की शाखाओं और ग्राहकों की संख्या बढ़ने के साथ कर्मचारियों की जिम्मेदारियां भी बढ़ रही हैं। कर्मचारियों का कहना है कि कम लोगों पर अधिक काम होने से उन्हें लंबे समय तक काम करना पड़ता है। इससे लक्ष्य का दबाव और काम का बोझ दोनों बढ़ जाते हैं।

3. लंबे काम के घंटे और थकान

कई बैंक कर्मचारियों के अनुसार उन्हें निर्धारित समय से अधिक समय तक काम करना पड़ता है। केरल के कोल्लम जिले में 282 बैंक कर्मचारियों पर हुई एक अध्ययन में काम के अधिक घंटे और थकान के बीच संबंध सामने आने की बात कही गई। अध्ययन के अनुसार आठ घंटे से अधिक काम करने वाले कर्मचारियों में काम से जुड़ी अत्यधिक थकान और तनाव का जोखिम अधिक पाया गया।

4. ऋण का बोझ भी बड़ी चिंता

बैंक कर्मचारियों को संस्थान की ओर से अपेक्षाकृत सुविधाजनक दरों पर आवास और वाहन ऋण मिलने की व्यवस्था होती है। कर्मचारी संगठनों का दावा है कि बड़ी संख्या में कर्मचारी इन सुविधाओं का लाभ लेते हैं और लंबे समय तक किस्तों का भुगतान करते हैं। ऐसे में नौकरी छोड़ना उनके लिए आसान नहीं रहता। कर्मचारी संगठनों के अनुसार आर्थिक जिम्मेदारियां कई बार कार्यस्थल के दबाव को सहने की मजबूरी को और बढ़ा देती हैं।

5. कार्यस्थल के व्यवहार पर भी सवाल

कुछ मामलों में कर्मचारियों के परिवारों और संगठनों ने वरिष्ठ अधिकारियों पर लगातार दबाव और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि लक्ष्य पूरा कराने के लिए डर या दबाव का इस्तेमाल करने के बजाय बेहतर कार्य वातावरण बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि सम्मानजनक व्यवहार, पर्याप्त कर्मचारी और स्पष्ट काम के घंटे बैंक कर्मचारियों की स्थिति सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

बैंक कर्मचारी संगठन क्यों कर रहे हैं आंदोलन?

बैंक कर्मचारी संगठनों ने काम की परिस्थितियों को लेकर लंबे समय से कई मांगें उठाई हैं। संयुक्त बैंक कर्मचारी मंच की ओर से पांच दिन का कार्य सप्ताह, कर्मचारियों की संख्या बढ़ाना, पेंशन से जुड़े सुधार और प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन व्यवस्था में बदलाव जैसी मांगें प्रमुख हैं। संगठनों का कहना है कि इन मांगों का संबंध केवल कर्मचारियों की सुविधा से नहीं बल्कि बैंकिंग व्यवस्था को बेहतर बनाने से भी है।

पांच दिन का कार्य सप्ताह

बैंक कर्मचारी संगठनों की प्रमुख मांग सभी शनिवार को अवकाश घोषित करने की है। मार्च 2024 में हुए वेतन समझौते से संबंधित प्रक्रिया में इस प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति होने का दावा संगठनों ने किया था। प्रस्ताव के अनुसार सोमवार से शुक्रवार तक प्रतिदिन कुछ अतिरिक्त समय काम करने के बदले सभी शनिवार को अवकाश देने की व्यवस्था हो सकती है। हालांकि इस विषय में अंतिम सरकारी मंजूरी को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन व्यवस्था में बदलाव

कर्मचारी संगठन प्रदर्शन से जुड़ी प्रोत्साहन व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि ऐसी व्यवस्था से कर्मचारियों के बीच अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और लक्ष्य का दबाव बढ़ सकता है। संगठन इस व्यवस्था में बदलाव या इसे वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

पेंशन व्यवस्था में सुधार

पेंशन को लेकर भी बैंक कर्मचारी संगठनों की कई मांगें हैं। इनमें नई पेंशन व्यवस्था में बदलाव, पुराने पेंशनभोगियों की पेंशन में संशोधन और सेवानिवृत्ति से जुड़े लाभों में वृद्धि जैसी मांगें शामिल हैं। संगठनों का कहना है कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा जरूरी है।

बड़े पैमाने पर भर्ती की मांग

कर्मचारी संगठनों का कहना है कि बैंक शाखाओं में काम और ग्राहकों की संख्या बढ़ने के साथ पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों की भर्ती जरूरी है। उनका तर्क है कि यदि एक कर्मचारी पर जरूरत से ज्यादा काम होगा तो लक्ष्य का दबाव और काम के घंटे दोनों बढ़ेंगे। इसलिए खाली पदों को भरना बैंक कर्मचारियों की समस्याओं को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

सरकार का क्या कहना है

सरकार की ओर से बैंक कर्मचारियों की भर्ती को लेकर अलग आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। सरकारी पक्ष के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में करीब 4.82 लाख कर्मचारियों की भर्ती हुई। वहीं, पांच दिन के कार्य सप्ताह को लेकर वित्त मंत्रालय के स्तर पर अंतिम मंजूरी नहीं दिए जाने की बात सामने आई है।बैंक कर्मचारी संगठन और सरकार के आंकड़ों तथा दावों में अंतर दिखाई देता है। जहां सरकार भर्ती बढ़ने की बात कहती है, वहीं कर्मचारी संगठन वर्तमान कार्यस्थल पर कर्मचारियों की कमी का मुद्दा उठाते हैं। ऐसे में वास्तविक स्थिति समझने के लिए बैंक शाखाओं में काम के बोझ, खाली पदों और कर्मचारियों के काम के घंटों के आंकड़ों का व्यापक अध्ययन जरूरी है।

आगे क्या बदलने की जरूरत

बैंक कर्मचारियों की आत्महत्या से जुड़े मामलों ने काम के दबाव और कार्यस्थल की परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। केवल भर्ती बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कर्मचारियों पर डाले जाने वाले लक्ष्यों, काम के घंटे और वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार की भी निगरानी जरूरी होगी। साथ ही कर्मचारियों के लिए भरोसेमंद शिकायत और सहायता व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।चेन्नई की घटना ने एक बार फिर बैंकिंग क्षेत्र में कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आत्महत्या जैसे मामलों के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार मानना उचित नहीं होगा, लेकिन काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां और कार्यस्थल का वातावरण ऐसे मुद्दे हैं जिनकी गंभीरता से जांच और समाधान जरूरी है।

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