किस धर्म की महिलाएं रोजगार में सबसे आगे ?आंकड़े चौंकाने वाले
भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी वर्ष 2023-24 में 41.7 प्रतिशत पहुंच गई। उपलब्ध शोध के अनुसार ईसाई और बौद्ध महिलाओं की रोजगार में भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि मुस्लिम और सिख महिलाएं पीछे हैं। हालांकि महिलाओं के रोजगार को केवल धर्म से नहीं समझा जा सकता, क्योंकि शिक्षा, विवाह, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
दि राइजिंग न्यूज | नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026
भारत में महिलाओं के रोजगार से जुड़े आंकड़े देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं। महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है, लेकिन पुरुषों की तुलना में अब भी बड़ा अंतर बना हुआ है। अलग-अलग धार्मिक समुदायों में भी महिलाओं की रोजगार में भागीदारी एक जैसी नहीं है। उपलब्ध शोध और सर्वेक्षणों के अनुसार शिक्षा, परिवार की आर्थिक स्थिति, विवाह और रोजगार के अवसर इस अंतर को प्रभावित करते हैं।
महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी कितनी है
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 41.7 प्रतिशत रही। इसका अर्थ है कि हर सौ महिलाओं में लगभग 42 महिलाएं या तो रोजगार में हैं या रोजगार की तलाश कर रही हैं। इसी अवधि में पुरुषों की श्रम बल भागीदारी दर 78.8 प्रतिशत रही। इससे साफ है कि महिलाओं और पुरुषों के बीच रोजगार से जुड़ाव का अंतर अभी काफी बड़ा है।वर्ष 2017-18 में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर केवल 23.3 प्रतिशत थी। इसके मुकाबले 2023-24 में यह बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई। यानी कुछ वर्षों में महिलाओं की रोजगार गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी लगभग 48 प्रतिशत तक पहुंची है। वास्तविक रूप से काम कर रही महिलाओं का श्रमिक जनसंख्या अनुपात 40.3 प्रतिशत रहा।
धर्म के आधार पर कौन सी महिलाएं आगे हैं
सरकारी श्रम बल सर्वेक्षण में धर्म के आधार पर महिलाओं की श्रम बल भागीदारी का सीधा आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। हालांकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण जैसे आंकड़ों पर हुए शोध से अलग-अलग समुदायों की महिलाओं की रोजगार स्थिति को समझने की कोशिश की गई है। वर्ष 2024 में प्रकाशित सुजाता कर के शोध में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया था। इस अध्ययन में धर्म के आधार पर महिलाओं की रोजगार में भागीदारी में अंतर सामने आया।शोध के अनुसार ईसाई और बौद्ध महिलाओं के काम करने की संभावना हिंदू महिलाओं की तुलना में अधिक पाई गई। हिंदू महिलाओं को अध्ययन में तुलना के आधार के रूप में रखा गया था। वहीं मुस्लिम और सिख महिलाओं के काम करने की संभावना अपेक्षाकृत कम पाई गई। इसलिए उपलब्ध शोध के आधार पर ईसाई और बौद्ध महिलाएं आगे, हिंदू महिलाएं मध्य स्थिति में तथा मुस्लिम और सिख महिलाएं पीछे दिखाई देती हैं।
मुस्लिम महिलाओं की रोजगार में भागीदारी कम क्यों
मुस्लिम महिलाओं की कम श्रम भागीदारी के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण बताए गए हैं। शोध के अनुसार विवाह महिलाओं के रोजगार से जुड़े रहने की संभावना को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारण है। विवाह के बाद घरेलू जिम्मेदारियां बढ़ने के कारण कई महिलाएं रोजगार या रोजगार की तलाश से बाहर हो जाती हैं। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सीमित हैं, वहां महिलाओं के लिए काम करना और भी कठिन हो जाता है।शहरी क्षेत्रों में भी मुस्लिम महिलाओं की श्रम बाजार में भागीदारी अपेक्षाकृत कम पाई गई है। परिवार की सामाजिक परिस्थितियां, महिलाओं की शिक्षा, रोजगार के अवसर और घरेलू जिम्मेदारियां मिलकर उनकी आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। इसलिए केवल धर्म को महिलाओं की कम रोजगार भागीदारी का एकमात्र कारण मानना सही नहीं होगा।
सिख महिलाओं की स्थिति क्यों अलग है
सिख महिलाओं के मामले में कम श्रम भागीदारी के पीछे आर्थिक स्थिति को एक महत्वपूर्ण कारण बताया गया है। शोध के अनुसार अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों में महिलाओं के रोजगार की तलाश करने की आवश्यकता कम हो सकती है। इसे अर्थव्यवस्था में आय प्रभाव के रूप में समझा जाता है। जब परिवार की आय पर्याप्त होती है, तो कुछ महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देकर रोजगार से दूर रह सकती हैं।हालांकि कम श्रम भागीदारी के साथ सिख महिलाओं में बेरोजगारी की स्थिति भी चिंता का विषय है। उपलब्ध आंकड़ों में सिख महिलाओं के बीच बेरोजगारी अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है। इसका मतलब यह हो सकता है कि जो महिलाएं रोजगार चाहती हैं, उन्हें उपयुक्त काम मिलने में अधिक कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
बेरोजगारी के आंकड़े क्या बताते हैं
महिलाओं की रोजगार स्थिति को केवल श्रम बल भागीदारी से नहीं समझा जा सकता। बेरोजगारी दर भी यह बताती है कि रोजगार की तलाश कर रही महिलाओं को काम मिलने में कितनी कठिनाई हो रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम महिलाओं की श्रम बल भागीदारी कम होने के बावजूद उनकी बेरोजगारी दर अपेक्षाकृत कम है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि श्रम बाजार में शामिल होने वाली मुस्लिम महिलाओं में काम पाने वाली महिलाओं का अनुपात अपेक्षाकृत बेहतर है।इसके विपरीत सिख महिलाओं की स्थिति अलग दिखाई देती है। उनकी श्रम बल में भागीदारी कम होने के साथ बेरोजगारी भी अपेक्षाकृत अधिक बताई गई है। यानी जो सिख महिलाएं रोजगार की तलाश में श्रम बाजार में आती हैं, उन्हें काम हासिल करने में अधिक कठिनाई हो सकती है। यह स्थिति रोजगार के अवसरों और महिलाओं के लिए उपलब्ध काम की प्रकृति पर सवाल खड़े करती है।
क्या धर्म ही महिलाओं के रोजगार का मुख्य कारण है
महिलाओं की रोजगार स्थिति को केवल धर्म के आधार पर समझना सही नहीं होगा। उम्र, शिक्षा, परिवार का आकार, बच्चों की संख्या, छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, ग्रामीण या शहरी क्षेत्र और परिवार की आर्थिक स्थिति जैसे कई कारक महिलाओं के रोजगार को प्रभावित करते हैं। शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ते हैं। वहीं ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में रोजगार के विकल्प सीमित हो सकते हैं।
परिवार की संरचना भी महिलाओं के काम करने के फैसले को प्रभावित करती है। छोटे बच्चों की देखभाल, घरेलू जिम्मेदारियां और परिवार की सामाजिक सोच कई महिलाओं को रोजगार से दूर रख सकती है। इसलिए महिला श्रम भागीदारी बढ़ाने के लिए केवल रोजगार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, सुरक्षित कार्यस्थल, बाल देखभाल की सुविधा और सामाजिक जागरूकता को भी बढ़ाना जरूरी है।
महिलाओं की रोजगार भागीदारी बढ़ाने के लिए क्या जरूरी
महिलाओं को अधिक संख्या में रोजगार से जोड़ने के लिए शिक्षा और कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने से महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में सुधार हो सकता है। गरीब परिवारों की महिलाओं के लिए रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है। साथ ही महिलाओं के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक कार्यस्थल सुनिश्चित करना जरूरी है।महिला श्रम बल भागीदारी बढ़ने से परिवार की आय के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है। महिलाओं के रोजगार को लेकर सामाजिक सोच में बदलाव भी आवश्यक है। अलग-अलग समुदायों में मौजूद वास्तविक बाधाओं को समझकर नीतियां बनाई जाएं तो महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को और बढ़ाया जा सकता है।
महत्वपूर्ण बिंदु
- वर्ष 2023-24 में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर 41.7 प्रतिशत रही।
- इसी अवधि में पुरुषों की श्रम बल भागीदारी दर 78.8 प्रतिशत थी।
- वर्ष 2017-18 में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी 23.3 प्रतिशत थी।
- उपलब्ध शोध में ईसाई और बौद्ध महिलाओं की रोजगार भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक पाई गई।
- मुस्लिम और सिख महिलाओं की रोजगार भागीदारी अपेक्षाकृत कम पाई गई।
- सिख महिलाओं में कम भागीदारी के साथ बेरोजगारी की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई।
- महिलाओं के रोजगार पर शिक्षा, विवाह, आर्थिक स्थिति और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बड़ा प्रभाव पड़ता है।
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