बिजली–उपभोक्ताओं पर अधिग्रहण का बोझ नहीं डालें:5,500 करोड़ का टेंडर रद्द होने के बाद इंटेलीस्मार्ट अधिग्रहण पर सवाल, नियामक अयोग दर्ज कराया विरोध
उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) में अलखनंदा हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना के टैरिफ निर्धारण की शुक्रवार को सुनवाई हुई। 5500 करोड़ का टेंडर रद्द होने पर अडानी समूह द्वारा इंटेलीस्मार्ट अधिग्रहण का विरोध किया गया। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा इन अधिग्रहणों को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने ऊर्जा क्षेत्र में कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों के बढ़ते नियंत्रण पर चिंता जताते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। वर्मा ने MVVNL में करीब 5,500 करोड़ रुपए का स्मार्ट मीटर टेंडर रद्द होने के बाद इंटेलीस्मार्ट के अधिग्रहण और GVK समूह की अलखनंदा हाइड्रो परियोजना से जुड़े घटनाक्रम को एक साथ देखने की जरूरत बताई। उन्होंने सवाल किया कि क्या दिवाला समाधान प्रक्रिया (NCLT) के जरिए महत्वपूर्ण ऊर्जा परिसंपत्तियों का नियंत्रण कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों में केंद्रित होता जा रहा है? मांग की कि इससे प्रतिस्पर्धा और बिजली उपभोक्ताओं के हित प्रभावित होने की आशंका की जांच होनी चाहिए। अधिग्रहण की लागत बिजली उपभोक्ताओं पर न डालने की मांग 330 मेगावाट की अलखनंदा/श्रीनगर हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना के आगामी पांच वर्षों के मल्टी ईयर टैरिफ निर्धारण के लिए UPERC में सार्वजनिक सुनवाई हुई। इसमें आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार, सदस्य संजय कुमार सिंह और गिरिश कुमार वैश्य मौजूद रहे। अलखनंदा कंपनी के अधिकारियों और UPPCL के प्रतिनिधियों ने भी सुनवाई में भाग लिया। अवधेश वर्मा ने आयोग से मांग की कि GVK इनर्जी लिमिटेड के अडानी पावर लिमिटेड द्वारा अधिग्रहण की कीमत, इसके लिए लिए गए कर्ज का ब्याज, एक्विजिशन प्रीमियम, गुडविल और कॉरपोरेट देनदारियों का बोझ उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाए। उन्होंने कहा कि कंपनी के अधिग्रहण की लागत और बिजली परियोजना की नियामकीय लागत अलग-अलग रखी जानी चाहिए। वर्मा के मुताबिक, यदि GVK समूह के अधीन मौजूदा व्यवस्था में उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं को अधिक लाभ मिल रहा है, तो उसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए। केवल कॉरपोरेट अधिग्रहण या NCLT की प्रक्रिया के आधार पर परियोजना की लागत बढ़ाना उपभोक्ताओं के हित में नहीं होगा। 88% बिजली हिस्सेदारी और पुराने समझौते के अधिकार सुरक्षित रखने की मांग उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने कहा कि 28 जून 2006 के संशोधित और पुनर्निर्धारित बिजली खरीद समझौते (PPA) के तहत उत्तर प्रदेश को मिलने वाली 88% बिजली हिस्सेदारी और उससे जुड़े अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहने चाहिए। उन्होंने UPERC से परियोजना की पूर्व स्वीकृत लागत, प्रस्तावित बदलावों और उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय प्रभाव का स्वतंत्र तुलनात्मक परीक्षण कराने की मांग की। स्मार्ट मीटरिंग क्षेत्र में भी बाजार संकेंद्रण की समीक्षा हो वर्मा ने इंटेलीस्मार्ट के अधिग्रहण और स्मार्ट मीटरिंग क्षेत्र में बाजार संकेंद्रण के संभावित प्रभावों की समीक्षा की भी मांग की। उन्होंने कहा कि इंटेलीस्मार्ट पहले EESL और NIIF का संयुक्त उपक्रम रही है। ऐसे में इसके अधिग्रहण और स्मार्ट मीटर टेंडर से जुड़े घटनाक्रम की पारदर्शिता के साथ जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ऊर्जा क्षेत्र सीधे जनहित से जुड़ा है। इसलिए टेंडर और अधिग्रहण की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हित सर्वोपरि होने चाहिए। परिषद ने पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा कर यह सुनिश्चित करने की मांग की कि उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं पर किसी भी तरह का अनुचित वित्तीय बोझ न पड़े।
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