छतारी पुलिस को बिना नोटिस गिरफ्तारी महंगी पड़ी:कोर्ट ने आरोपी की रिमांड अर्जी खारिज कर SSP को जांच के निर्देश दिए
नए आपराधिक कानूनों और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस को ताक पर रखकर बिना नोटिस आरोपी को गिरफ्तार करना छतारी पुलिस को भारी पड़ गया। रिमांड मजिस्ट्रेट (जेएम प्रथम) निवेदिता सिंह की अदालत ने पुलिस की मनमानी पर कड़ा रुख अपनाते हुए 7 साल से कम सजा वाले मामले में की गई गिरफ्तारी को अवैध करार दिया और आरोपी की रिमांड अर्जी खारिज कर दी। अदालत ने इस लापरवाही को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना मानते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) बुलंदशहर को जांच व दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। मामला छतारी थाने में दर्ज पॉक्सो एक्ट का है, जिसमें पुलिस ने आरोपी दीपक कुमार (निवासी रामनगर, बीकूपुर) को गिरफ्तार कर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजने के लिए कोर्ट में पेश किया था। उपनिरीक्षक व विवेचक प्रमोद कुमार ने आरोपी की रिमांड की मांग की। अदालत ने केस डायरी और पुलिस प्रपत्रों के अवलोकन के बाद पाया कि जिन धाराओं में मामला दर्ज है, उनमें अधिकतम सजा 7 साल या उससे कम है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(3) के तहत ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पूर्व अभियुक्त को नियमानुसार नोटिस दिया जाना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि फाइल में न तो नोटिस का कोई सबूत था और न ही जीडी में इसका उल्लेख। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक अरणेश कुमार बनाम बिहार राज्य और सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि 7 वर्ष तक की सजा वाले मामलों में सीधे गिरफ्तारी अनुचित है। विवेचक द्वारा नियमों को दरकिनार करना शीर्ष अदालत के स्पष्ट आदेशों का उल्लंघन है। अदालत ने पुलिस की रिमांड अर्जी खारिज करते हुए आरोपी को 20,000 रुपये के व्यक्तिगत मुचलके पर सशर्त रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस के तहत केवल विवेचक ही नहीं, बल्कि पर्यवेक्षण (सुपरविजन) करने वाले थाना प्रभारी की भी समान जवाबदेही बनती है। कोर्ट द्वारा एसएसपी को आदेश की प्रति भेजे जाने के बाद दोषी पुलिसकर्मियों पर विभागीय जांच और अवमानना की तलवार लटक गई है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)