बाल विवाह 30% कम, फिर भी बेटियों की शादी की इतनी जल्दी क्यों...

भारत में बाल विवाह की दर वर्ष 1996 के लगभग 50 प्रतिशत से घटकर करीब 20 प्रतिशत रह गई है, लेकिन कई राज्यों में यह समस्या अब भी गंभीर बनी हुई है। गरीबी, सामाजिक मान्यताएं, माहवारी शुरू होने के बाद शादी का दबाव और लड़कियों की शिक्षा में बाधाएं इसके प्रमुख कारण हैं। कानून के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी है, ताकि वर्ष 2030 तक भारत को बाल विवाह मुक्त बनाने का लक्ष्य हासिल किया जा सके।

Oct 12, 2026 - 17:44
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बाल विवाह 30% कम, फिर भी बेटियों की शादी की इतनी जल्दी क्यों...

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 12 अक्टूबर 2026

भारत में बाल विवाह के मामलों में पिछले कुछ दशकों के दौरान उल्लेखनीय कमी आई है, लेकिन इस सामाजिक बुराई को पूरी तरह समाप्त करना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में बाल विवाह की दर वर्ष 1996 में लगभग 50 प्रतिशत थी, जो घटकर करीब 20 प्रतिशत रह गई है। इसके बावजूद देश में हर पांचवीं युवा महिला का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले होने की बात सामने आई है। इसी चुनौती को देखते हुए वर्ष 2030 तक भारत को बाल विवाह से मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

बाल विवाह के मामलों में कमी, फिर भी चुनौती बरकरार

भारत में बाल विवाह के खिलाफ लंबे समय से जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। कानून, शिक्षा और सरकारी योजनाओं के माध्यम से इस प्रथा को रोकने के प्रयास किए गए हैं, जिनका असर आंकड़ों में भी दिखाई देता है। हालांकि, बाल विवाह की दर में कमी आने का अर्थ यह नहीं है कि समस्या समाप्त हो गई है। देश के कई हिस्सों में आज भी कम उम्र में लड़कियों की शादी कर दी जाती है, जिससे उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

राष्ट्रीय औसत के पीछे छिपी राज्यों की तस्वीर

बाल विवाह की समस्या पूरे देश में एक जैसी नहीं है। बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय औसत कई राज्यों और ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों के बीच मौजूद बड़े अंतर को छिपा देता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बाल विवाह की समस्या विशेष रूप से चिंता का विषय बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल, बिहार और त्रिपुरा में 40 प्रतिशत से अधिक महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले हुआ था।

मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में अधिक मामले

मध्य प्रदेश में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच बाल विवाह की दर में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य के ग्रामीण इलाकों में लगभग 23.4 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पहले हुआ, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा करीब 9 प्रतिशत रहा। राज्य में वर्ष 2025 के दौरान बाल विवाह के 538 मामले दर्ज किए गए, जबकि वर्ष 2020 में यह संख्या 366 थी। ये आंकड़े बताते हैं कि बाल विवाह रोकने के लिए लगातार निगरानी और स्थानीय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।

बेटी की माहवारी शुरू होते ही शादी की चिंता क्यों

विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ ग्रामीण और रूढ़िवादी परिवारों में लड़की की माहवारी शुरू होते ही उसकी शादी के बारे में सोचना शुरू कर दिया जाता है। इसके पीछे सामाजिक मान्यताएं, परिवार की प्रतिष्ठा को लेकर चिंता और लड़की के किसी के साथ संबंध में पड़ने का डर जैसे कारण हो सकते हैं। कई परिवारों में लड़कियों की इच्छा, शिक्षा और भविष्य के बजाय उनकी शादी को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसी सोच लड़कियों को अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने के अधिकार से वंचित कर सकती है।

गरीबी भी बाल विवाह की बड़ी वजह

बाल विवाह के पीछे आर्थिक तंगी एक महत्वपूर्ण कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ गरीब परिवार अपनी बेटियों की जिम्मेदारी से जल्दी मुक्त होने के लिए कम उम्र में उनकी शादी कर देते हैं। परिवारों को लगता है कि इससे उनके खर्च में कमी आएगी, लेकिन वास्तव में यह कदम लड़की की शिक्षा और रोजगार के अवसरों को सीमित कर सकता है। इससे गरीबी का चक्र अगली पीढ़ी तक जारी रहने का खतरा बढ़ जाता है।

शिक्षा और आत्मनिर्भरता से बदल सकती है तस्वीर

बाल विवाह को रोकने के लिए लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना बेहद जरूरी है। यदि लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा पूरी करने का अवसर मिले, तो वे अपने भविष्य के बारे में बेहतर निर्णय ले सकती हैं। शिक्षा से रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के रास्ते भी खुलते हैं। इसके साथ ही परिवारों को यह समझाना जरूरी है कि बेटी की कम उम्र में शादी करने के बजाय उसकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर ध्यान देना उसके बेहतर भविष्य की नींव बन सकता है।

बाल विवाह रोकने के लिए क्या कहता है कानून

भारत में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत विवाह के लिए लड़की की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़के की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष निर्धारित है। कानून के अंतर्गत बाल विवाह करवाने, उसमें शामिल होने या उसे बढ़ावा देने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है। कुछ परिस्थितियों में बाल विवाह करवाने या उसमें सहायता करने वाले व्यक्तियों को दो वर्ष तक की कैद और एक लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है। हालांकि, कानून का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने के लिए शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई करना और प्रभावित बच्चों को सुरक्षा देना भी जरूरी है।

उच्चतम न्यायालय ने भी बाल विवाह को बताया गंभीर समस्या

उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2017 में एक महत्वपूर्ण फैसले में नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध से जुड़े मामले पर स्पष्ट किया था कि विवाह की आड़ में नाबालिग लड़की के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। बाल विवाह बच्चों की सुरक्षा, सम्मान और स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर विषय है। इस तरह के मामलों में बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें शोषण से बचाना आवश्यक है। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक जागरूकता और कानूनी कार्रवाई साथ-साथ चलें, तभी इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।

तीन वर्षों में साढ़े पांच लाख से अधिक बाल विवाह रोकने का दावा

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन के संस्थापक भुवन ऋभु के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में पांच लाख पचास हजार से अधिक बाल विवाह रोके गए हैं। यह दावा बाल विवाह के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों और स्थानीय स्तर पर किए जा रहे हस्तक्षेपों की भूमिका को सामने लाता है। सरकार भी नागरिक संगठनों के सहयोग से वर्ष 2030 तक देश को बाल विवाह मुक्त बनाने के लक्ष्य पर काम कर रही है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता, समय पर शिकायत और प्रशासनिक कार्रवाई को और मजबूत करना होगा।

बाल विवाह का सबसे गंभीर असर लड़कियों के स्वास्थ्य पर

कम उम्र में शादी होने के बाद गर्भधारण की स्थिति में किशोरियों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं। कम उम्र में गर्भावस्था से मां और बच्चे दोनों में जटिलताओं का जोखिम बढ़ता है। समाचार में मध्य प्रदेश की 14 वर्ष की उम्र में विवाहित और 15 वर्ष की उम्र में मां बनी एक किशोरी का उदाहरण दिया गया है, जो गंभीर रक्ताल्पता से पीड़ित बताई गई। उसके बच्चे में भी कुपोषण की समस्या सामने आई। यह उदाहरण बताता है कि बाल विवाह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा गंभीर मुद्दा भी है।

बाल विवाह रोकने के लिए सरकारी योजनाओं की भूमिका

विशेषज्ञों के अनुसार, केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। गरीब परिवारों तक शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का लाभ पहुंचना चाहिए। यदि परिवारों को आर्थिक सहायता और बेटियों की पढ़ाई के लिए आवश्यक संसाधन मिलते हैं, तो कम उम्र में शादी करने का दबाव कम किया जा सकता है। बाल विवाह रोकने वाले अधिकारियों, विद्यालयों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के बीच बेहतर तालमेल भी जरूरी है, ताकि किसी नाबालिग की शादी की जानकारी मिलने पर समय रहते हस्तक्षेप किया जा सके।

वर्ष 2030 तक बाल विवाह मुक्त भारत का लक्ष्य कितना महत्वपूर्ण

भारत को वर्ष 2030 तक बाल विवाह मुक्त बनाने का लक्ष्य तभी हासिल हो सकता है, जब लड़कियों को अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार मिले। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की भारत प्रतिनिधि सिंथिया मैकफ्री के अनुसार, इस दिशा में प्रगति तेज करने के लिए लड़कियों की आवाज मजबूत करना, उनकी शिक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें स्वस्थ वातावरण देना आवश्यक है। समाज को भी यह समझना होगा कि माहवारी शुरू होना शादी की तैयारी का संकेत नहीं है। बालिकाओं को सुरक्षित बचपन, शिक्षा और अपनी क्षमता विकसित करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

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