न्यायपालिका पर फर्जी पोस्ट हटाने का आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायपालिका के खिलाफ प्रसारित किए जा रहे फर्जी, भ्रामक और अपमानजनक सोशल मीडिया पोस्ट्स को गंभीरता से लेते हुए विभिन्न सोशल मीडिया मंचों को 24 घंटे के भीतर ऐसी सामग्री हटाने का निर्देश दिया है। अदालत ने न्यायपालिका की गरिमा और संस्थागत विश्वास बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

न्यायपालिका पर फर्जी पोस्ट हटाने का आदेश

दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 21 जून 2026

न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा मामला

दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायपालिका के खिलाफ सोशल मीडिया पर प्रसारित की जा रही फर्जी, भ्रामक और अपमानजनक सामग्री को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने विभिन्न सोशल मीडिया मंचों को निर्देश दिया है कि ऐसी सामग्री को 24 घंटे के भीतर हटाया जाए। यह आदेश न्यायपालिका की साख और संस्थागत सम्मान की रक्षा के उद्देश्य से जारी किया गया है।

मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीशों को लेकर पोस्ट्स पर चिंता

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह बात लाई गई कि मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के संबंध में सोशल मीडिया पर कई ऐसे पोस्ट प्रसारित किए जा रहे हैं, जिनमें कथित रूप से झूठी, भ्रामक और अपमानजनक जानकारियां शामिल हैं। अदालत ने माना कि इस प्रकार की सामग्री न केवल संबंधित व्यक्तियों की प्रतिष्ठा को प्रभावित करती है, बल्कि न्यायिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को भी नुकसान पहुंचा सकती है।

24 घंटे में कार्रवाई का निर्देश

दिल्ली हाईकोर्ट ने संबंधित सोशल मीडिया मंचों को स्पष्ट निर्देश दिया कि आपत्तिजनक और फर्जी सामग्री की पहचान कर उसे 24 घंटे के भीतर हटाया जाए। अदालत ने कहा कि डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे मामलों में त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करें ताकि गलत सूचनाओं का प्रसार रोका जा सके।

न्यायिक संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना जरूरी

अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि न्यायपालिका लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। ऐसे में उसके खिलाफ झूठी और दुर्भावनापूर्ण सामग्री का प्रसार संस्थागत विश्वास को कमजोर कर सकता है। न्यायिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।

सोशल मीडिया की जवाबदेही पर जोर

सुनवाई के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि डिजिटल युग में सोशल मीडिया मंच सूचना प्रसार के प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। इसलिए इन मंचों की यह जिम्मेदारी है कि वे कानून और दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए फर्जी और आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ प्रभावी कदम उठाएं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का संतुलन

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अधिकार है, लेकिन इसका उपयोग किसी व्यक्ति या संस्था की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने अथवा झूठी जानकारी फैलाने के लिए नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का पालन भी उतना ही आवश्यक है।

आगे की सुनवाई पर रहेगी नजर

मामले में अदालत के निर्देशों के अनुपालन और सोशल मीडिया मंचों द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा आगामी सुनवाई में की जा सकती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश डिजिटल मंचों की जवाबदेही और न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।