दो कचौड़ी, एक समोसा…मर्दों का क्या भरोसा’:देवबंदी उलेमा बोले-सुरक्षा की चिंता जताने वाली लड़कियों की बात भी समझनी होगी, बेटों को महिलाओं के सम्मान की सीख देना जरूरी
सोशल मीडिया पर इन दिनों एक नारा चर्चा में है- “दो कचौड़ी, एक समोसा… मर्दों का क्या भरोसा।” नारे के शब्दों को लेकर जहां सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, वहीं देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने इसे सिर्फ नारे तक सीमित रखने के बजाय इसके पीछे की चिंता पर बात करने की जरूरत बताई है। कारी इसहाक गोरा ने कहा कि उन्होंने जब इस मामले के बारे में तहकीक की तो उन्हें बताया गया कि कुछ लड़कियां यह नारा अपनी सुरक्षा और तहफ्फुज की चिंता जाहिर करने के लिए लगा रही हैं। उनका कहना है कि नारे की भाषा और अंदाज पर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन अगर इसके पीछे लड़कियों की सुरक्षा को लेकर चिंता है तो उस पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। ‘मर्दों का क्या भरोसा’ पर सवाल से ज्यादा जरूरी है सवाल के पीछे की वजह इस नारे की सबसे ज्यादा चर्चा इसके आखिरी हिस्से ‘मर्दों का क्या भरोसा’ को लेकर हो रही है। इसे लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या कुछ लोगों के व्यवहार के कारण पूरे पुरुष समाज को एक ही नजर से देखना सही है? वहीं दूसरी तरफ यह भी सवाल है कि आखिर ऐसी भाषा इस्तेमाल करने की जरूरत लड़कियों को क्यों महसूस हो रही है। कारी इसहाक गोरा ने इसी बिंदु पर समाज और परिवार की जिम्मेदारी की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि बच्चों की पढ़ाई और करियर पर ध्यान देना जरूरी है, लेकिन उनकी तरबियत, अखलाक, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बेटों को सिर्फ पढ़ाएं नहीं, महिलाओं का सम्मान करना भी सिखाएं उन्होंने कहा कि बेटों को यह समझाना जरूरी है कि महिलाओं और लड़कियों के साथ सम्मान और शालीनता से व्यवहार किया जाए। किसी महिला के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए जिससे उसे असहजता या असुरक्षा महसूस हो। उन्होंने यह बात भी रखी कि समाज की महिलाओं को अलग नजर से देखने के बजाय उन्हें उसी सम्मान की नजर से देखा जाना चाहिए, जिसकी उम्मीद हम अपने घर की महिलाओं के लिए करते हैं। महिलाओं में हमारी अपनी मां, बहन, नानी और दादी भी शामिल हैं। डिग्री बड़ी हो गई, लेकिन तरबियत पीछे छूट गई तो क्या फायदा? कारी इसहाक गोरा के बयान का एक अहम हिस्सा बच्चों की परवरिश से जुड़ा है। उनका कहना है कि परिवार बच्चों को बड़ी-बड़ी डिग्रियां दिलाने पर जोर देता है, लेकिन उनके व्यवहार और सोच की तरबियत पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। तालीम इंसान को काबिल बनाने में मदद करती है, लेकिन अच्छी तरबियत उसे अपने व्यवहार और जिम्मेदारियों को समझने वाला इंसान बनाने में अहम भूमिका निभाती है। अब बहस सिर्फ नारे पर नहीं, घरों में होने वाली परवरिश पर भी इस पूरे मामले में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “दो कचौड़ी, एक समोसा… मर्दों का क्या भरोसा” जैसा नारा सही है या गलत। बड़ा सवाल यह भी है कि घर और समाज अगली पीढ़ी को महिलाओं के सम्मान, तहजीब और रिश्तों की कद्र करना कितना सिखा रहा है। नारे पर बहस अपनी जगह है, लेकिन अगर उसके पीछे सुरक्षा को लेकर चिंता जताई जा रही है तो उस चिंता को नजरअंदाज करने के बजाय उसके कारणों पर भी बात होनी चाहिए। बेहतर सामाजिक माहौल केवल नारों और सोशल मीडिया की बहस से नहीं बनेगा। इसकी शुरुआत घर से होगी, जहां बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ सम्मान, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की सीख दी जाएगी।
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