द्रौपदी गाथा नाटक में स्त्री सम्मान का सवाल उठा:प्रयागराज में मंचन, पांडवों के आगे बढ़ने और द्रौपदी के पीछे छूटने के दृश्य ने दर्शकों को भावुक किया
प्रयागराज उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र में चल रहे तीन दिवसीय त्रिवेणी कला उत्सव के दूसरे दिन मंगलवार को ‘द्रौपदी गाथा’ नाटक का मंचन किया गया। महाभारत की द्रौपदी के जीवन पर आधारित इस नाटक में उसके त्याग, संघर्ष, रिश्तों और आत्मसम्मान के सवालों को प्रभावी ढंग से मंच पर प्रस्तुत किया गया। नाटक की शुरुआत उस प्रसंग से हुई, जब पांडव स्वर्ग की ओर जा रहे होते हैं और द्रौपदी रास्ते में पीछे छूट जाती है। वह पीछे मुड़कर देखती है, लेकिन कोई उसके पास नहीं लौटता। इस दृश्य में द्रौपदी के मन में उठे सवालों ने दर्शकों को भावुक कर दिया। नाटक के जरिए यह दिखाया गया कि जिस स्त्री ने अपने परिवार और रिश्तों के लिए जीवनभर त्याग किया, उसके हिस्से में आखिर क्या आया। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में हुए इस मंचन का निर्देशन डॉ. संध्या शर्मा और सुनील मक्कड़ ने किया। नाटक में द्रौपदी के जन्म से लेकर मृत्यु तक की जीवन यात्रा को अलग-अलग प्रसंगों के जरिए दिखाया गया। इसमें उसके रिश्तों, संघर्ष, त्याग और अपने अस्तित्व के लिए किए गए सवालों को प्रमुखता दी गई। ‘द्रौपदी गाथा’ को स्वांग शैली में प्रस्तुत किया गया। इसमें पारंपरिक हरियाणवी लोकगीतों के साथ सारंगी, नगाड़ा, ढोलक और हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया गया। लोक संगीत और कलाकारों के संवाद ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया। नाटक में द्रौपदी को सिर्फ रानी या पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि अपने सम्मान और पहचान के लिए आवाज उठाने वाली महिला के रूप में दिखाया गया। महाभारत की कहानी के जरिए आज के समय में स्त्री के आत्मसम्मान और पहचान से जुड़े सवाल भी सामने रखे गए। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. अश्विनी कुमार सिंह, केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा, हरियाणा कला परिषद के उपाध्यक्ष महेश जोशी और सलाहकार कल्पना सहाय ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। राम प्रताप राजपूत, सुनील मक्कड़, दिनेश वशिष्ठ, रविंदर कुमार, राजबीर सिंह, कपिल, नरेश और राजेश समेत कलाकारों ने अभिनय किया। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि को पौधा और अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया।
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