दुबई से आए परशुराम, मुंबई के CA कर रहे संचालन:परेड की रामलीला में 50 साल से मथुरा का चतुर्वेदी परिवार कर रहा अभिनय

Oct 16, 2026 - 08:12
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दुबई से आए परशुराम, मुंबई के CA कर रहे संचालन:परेड की रामलीला में 50 साल से मथुरा का चतुर्वेदी परिवार कर रहा अभिनय
कानपुर के परेड मैदान में रामलीला का मंचन करने वाले कलाकार किसी मंडली के नहीं बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त प्रोफेशनल हैं। कोई दुबई में नौकरी करता है तो कोई मुंबई में चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) है। कोई रेस्टोरेंट चलाता है तो कोई स्थानीय चैनल का संचालन करता है। ये सभी अपनी व्यस्त जिंदगी से वक्त निकालकर परेड मैदान की रामलीला में किरदार निभाने आते हैं। यहां दुबई से छुट्टी लेकर आए मंगलेश दत्त परशुराम की भूमिका निभा रहे हैं, जबकि मुंबई से आए सीए बृजेश दत्त चतुर्वेदी अपने पिता महेश दत्त चतुर्वेदी (व्यास जी) के साथ व्यास गद्दी संभाल रहे हैं। मथुरा के चतुर्वेदी परिवार के ये कलाकार करीब 50 साल से कानपुर के परेड मैदान में रामलीला का मंचन कर रहे हैं। छठवीं पीढ़ी तक पहुंची परंपरा रामलीला का संचालन महेश दत्त चतुर्वेदी (व्यास जी) कर रहे हैं। उनके बेटे बृजेश भी इसमें सहयोग कर रहे हैं। बृजेश ने बताया कि उनके परबाबा साकेतवासी गिरिराज दत्त चतुर्वेदी (खपाटा चाचे गुरु) ने मथुरा में इस परंपरा की शुरुआत की थी। इसके बाद बाबा मथुरेश दत्त चतुर्वेदी (दादू जी) ने इसे आगे बढ़ाया। अब उनके पिता इस विरासत को संभाल रहे हैं। परिवार की छठवीं पीढ़ी तक यह परंपरा पहुंच चुकी है और इस बार तीन पीढ़ियां एक साथ रामलीला में हिस्सा ले रही हैं। कोई नौकरीपेशा, कोई कारोबारी राम की भूमिका निभा रहे सूरज चतुर्वेदी मथुरा में रेस्टोरेंट चलाते हैं। लक्ष्मण बने जितेंद्र शर्मा और सीता का किरदार निभा रहे अर्पित शर्मा प्राइवेट नौकरी करते हैं। भरत बने कार्तिकेय चतुर्वेदी और शत्रुघ्न की भूमिका निभा रहे पीयूष चतुर्वेदी छात्र हैं। हनुमान का अभिनय कर रहे अभिषेक दत्त मथुरा में स्थानीय चैनल चलाते हैं। वहीं, दिनेश चतुर्वेदी रावण और दशरथ की भूमिका निभा रहे हैं। वह मथुरा में काली मां के मंदिर के महंत हैं। परंपरा से जुड़े रहने के लिए करते हैं मंचन बृजेश दत्त चतुर्वेदी ने बताया कि रामलीला में अभिनय करने का उद्देश्य परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाना और संस्कृति से जुड़े रहना है। सभी कलाकार सालभर अपने-अपने पेशे में व्यस्त रहते हैं, लेकिन रामलीला के लिए समय निकालते हैं और सात्विक जीवनशैली का पालन करते हैं। उनके लिए यह सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का माध्यम है।

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