गोरखपुर में 20 साल से रावण बन रहे समरकांत आचार्य:रामलीला से पहले प्रैक्टिस करते हैं, बोले-अभिनय ऐसा कि सच में लगे रावण आ गया
गोरखपुर की बर्डघाट रामलीला में रावण का किरदार निभाना सिर्फ अभिनय नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है। मंच पर रावण की दमदार आवाज, उसके संवाद और भव्य रूप को देखकर दर्शक रोमांचित हो उठते हैं। इस किरदार को पिछले 20 सालों से जीवंत कर रहे हैं। अयोध्या के रहने वाले समरकांत आचार्य। वह हर साल अपनी टीम के साथ बर्डघाट रामलीला में हिस्सा लेने गोरखपुर आते हैं। रामलीला का आयोजन चलने तक यहीं रहकर रावण की भूमिका निभाते हैं। खास बात यह है कि दो दशक का अनुभव होने के बावजूद समरकांत अपने अभिनय को लेकर कोई लापरवाही नहीं बरतते। मंच पर उतरने से पहले वह घंटों बैठकर अपने संवादों की प्रैक्टिस करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि जब वह रावण बनकर मंच पर आएं, तो दर्शक उनके अभिनय में इस तरह खो जाएं कि उन्हें लगे, मानो सचमुच रावण सामने आ गया हो। अयोध्या से हर साल गोरखपुर आते हैं समरकांत समरकांत आचार्य मूल रूप से अयोध्या के रहने वाले हैं। बर्डघाट रामलीला में रावण का किरदार निभाने के लिए उन्हें हर साल अपनी टीम के साथ गोरखपुर बुलाया जाता है। रामलीला शुरू होने से लेकर आयोजन समाप्त होने तक वह गोरखपुर में ही रहते हैं और मंच पर अपनी भूमिका निभाते हैं। पिछले 20 सालों से लगातार इस किरदार से जुड़े रहने के कारण रावण के व्यक्तित्व, संवाद और मंच पर उसके प्रभाव को लेकर उन्हें अच्छा अनुभव है। इसके बावजूद वह हर साल अपने अभिनय को और बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। 20 साल से निभा रहे किरदार समरकांत आचार्य के लिए रावण का किरदार केवल संवाद याद करके मंच पर बोल देने तक सीमित नहीं है। वह चाहते हैं कि उनके अभिनय में रावण का व्यक्तित्व, उसकी गंभीरता, उसका अहंकार और उसका प्रभाव साफ नजर आए। इसी वजह से मंचन से पहले वह घंटों बैठकर अपने डायलॉग की प्रैक्टिस करते हैं। लंबे अनुभव के बाद भी वह संवादों को दोहराते हैं, ताकि मंच पर बोलते समय आवाज, उतार-चढ़ाव और भाव सही तरीके से सामने आ सकें। उनकी कोशिश रहती है कि रावण के मंच पर आते ही रामलीला का माहौल बदल जाए। दर्शक उसके संवादों और हाव-भाव से जुड़ें और कुछ समय के लिए खुद को उसी प्रसंग का हिस्सा महसूस करें। समरकांत चाहते हैं कि उनका अभिनय देखकर लोगों को यह न लगे कि कोई कलाकार रावण का किरदार निभा रहा है, बल्कि ऐसा महसूस हो कि रावण वास्तव में उनके सामने खड़ा है। आधे घंटे में मेकअप करके धारण करते हैं रावण का रूप
रावण के किरदार को प्रभावशाली बनाने में उसकी वेशभूषा और मेकअप की भी अहम भूमिका होती है। समरकांत आचार्य को रावण के रूप में तैयार होने में करीब आधा घंटा लगता है। मेकअप पूरा होने और वेशभूषा धारण करने के बाद उनका भव्य रूप दर्शकों का ध्यान खींचता है। हालांकि, इस रूप के पीछे केवल बाहरी सज्जा नहीं, बल्कि संवादों का अभ्यास और किरदार को समझने की उनकी मेहनत भी शामिल है। मंच पर रावण के रूप में उतरने के बाद उनके लिए जरूरी होता है कि संवादों के साथ चेहरे के भाव, बोलने का अंदाज और शरीर की भाषा भी किरदार के अनुरूप रहे। यही वजह है कि वह तैयारी के हर पहलू पर ध्यान देते हैं। महान पंडित भी था रावण
रावण के चरित्र को लेकर समरकांत आचार्य का नजरिया भी दिलचस्प है। उनका कहना है कि रावण को केवल राक्षस के रूप में देखना उसके व्यक्तित्व के एक ही पक्ष को देखना है। रावण महान पंडित और विद्वान था, लेकिन उसके अहंकार और अधर्म ने उसे विनाश की ओर पहुंचा दिया। समरकांत ने बातचीत के दौरान रावण से जुड़ी एक पौराणिक व्याख्या भी साझा की। उनके अनुसार, रावण यह समझ चुका था कि परब्रह्म परमात्मा के अलावा उसका वध कोई नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि रावण ने अपने वंश के उद्धार के लिए भगवान श्रीराम से बैर किया था, ताकि उसके परिवार को मुक्ति मिल सके। यह रावण के चरित्र को लेकर समरकांत की अपनी व्याख्या है। उनका मानना है कि रावण का किरदार केवल बुराई का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि उसके माध्यम से यह भी समझा जा सकता है कि ज्ञान और शक्ति होने के बावजूद अहंकार तथा गलत कर्म किसी के पतन का कारण बन सकते हैं।
1858 से जुड़ा है बर्डघाट रामलीला का इतिहास
गोरखपुर की बर्डघाट रामलीला शहर की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यहां रामलीला के आयोजन का इतिहास वर्ष 1858 से जुड़ा है। वहीं, वर्ष 1862 में राय कृष्ण किशोर प्रसाद, जिन्हें राय साहब सरहरी के नाम से भी जाना जाता था, द्वारा आयोजन शुरू कराए जाने का उल्लेख मिलता है। इस रामलीला में हर साल रामायण के प्रमुख प्रसंगों का मंचन किया जाता है। भगवान श्रीराम के वनवास, माता सीता के हरण, हनुमान जी के लंका पहुंचने, अंगद-रावण संवाद, लक्ष्मण शक्ति, कुंभकर्ण वध और राम-रावण युद्ध जैसे दृश्य दर्शकों के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं। विजयादशमी पर रावण वध का मंचन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इन प्रसंगों में रावण की भूमिका विशेष आकर्षण रहती है।
राघव-शक्ति मिलन से जुड़ी है खास परंपरा
बर्डघाट रामलीला की पहचान केवल रामायण के मंचन तक सीमित नहीं है। यहां राघव-शक्ति मिलन की भी विशेष परंपरा है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इसकी शुरुआत वर्ष 1948 में हुई थी। विजयादशमी के अवसर पर भगवान श्रीराम की विजय यात्रा बसंतपुर तिराहे पर पहुंचती है, जहां दुर्गाबाड़ी की मां दुर्गा से उनका मिलन होता है। इस दौरान पूजा-अर्चना और आरती की जाती है। यह आयोजन गोरखपुर की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सालों से चली आ रही इस परंपरा में रामलीला देखने आने वाले श्रद्धालुओं की भागीदारी इसे और खास बनाती है।
कलाकार की मेहनत ही किरदार को बनाती है यादगार
समरकांत आचार्य की कहानी बताती है कि किसी किरदार को सालों तक निभाना और हर बार दर्शकों पर प्रभाव छोड़ना आसान नहीं है। अयोध्या से गोरखपुर आना, अपनी टीम के साथ रामलीला में हिस्सा लेना और मंचन से पहले घंटों संवादों का अभ्यास करना उनके समर्पण को दिखाता है। 20 साल के अनुभव के बाद भी समरकांत के लिए हर मंचन एक नई चुनौती है। वह चाहते हैं कि उनके अभिनय में रावण का हर संवाद प्रभावशाली हो और दर्शक रामलीला के दृश्य से पूरी तरह जुड़ जाएं। उनके लिए सबसे बड़ी सफलता यही होगी कि रावण के रूप में मंच पर आते ही दर्शकों के मन में यह भाव पैदा हो कि ‘सच में रावण आ गया है।’ यही सोच उन्हें हर साल अपने किरदार को नए उत्साह और तैयारी के साथ निभाने के लिए प्रेरित करती है।
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