गोरखपुर में विद्वत परिषद संगोष्ठी आयोजित:ऋचा सिंह बोलीं- विद्यालय, पाठ्यक्रम और समाज को शिक्षा व्यवस्था का आधार
गोरखपुर में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान से संबद्ध शिशु शिक्षा समिति, गोरक्ष प्रांत के तत्वावधान में संकुल पक्कीबाग द्वारा संत रविदास सरस्वती शिशु मंदिर, माधवपुर, गोरखपुर में “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं समकालीन विमर्श” विषय पर संकुल स्तरीय विद्वत परिषद संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र की सह-क्षेत्रीय संयोजिका (विद्वत परिषद) डॉ. ऋचा सिंह ने अपने उद्बोधन में विद्यालय, पाठ्यक्रम और समाज को शिक्षा व्यवस्था के तीन महत्त्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में केवल सफल शिक्षा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा का सार्थक, मूल्यपरक एवं जीवनोपयोगी होना भी आवश्यक है। विशिष्ट अतिथि, ध्यान साधक एवं प्रकृति प्रेमी नेविश भगत ने संत रविदास, संत कबीर एवं महात्मा बुद्ध के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति, समाज और जीवन के अनुभवों से भी प्राप्त होता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता तथा आत्ममंथन की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे समाजसेवी एवं प्रतिष्ठित व्यवसायी राधेश्याम यादव ने कहा कि किसी भी सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत परिवार और समाज से होती है। आधुनिकता को अपनाना समय की आवश्यकता है, लेकिन इसके साथ अपनी गौरवशाली भारतीय परंपराओं, संस्कारों एवं सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। गोरक्ष प्रांत के प्रांत संयोजक विनोद सिंह राठौर ने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों के बावजूद भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की मूल चेतना अक्षुण्ण बनी रही। कार्यक्रम का संचालन एस. एन. कुशवाहा ने प्रभावशाली ढंग से की। अतिथियों का स्वागत एवं परिचय संत रविदास सरस्वती शिशु मंदिर, माधवपुर के प्रधानाचार्य अवधेश चंद्र यादव ने कराया। कार्यक्रम के अंत में एस. एन. कुशवाहा ने सभी अतिथियों, विद्वतजनों एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में विनय, पंकज, सत्यानंद भट्ट, नागेंद्र, राजेश सहित गोरक्ष प्रांत के अनेक आचार्य उपस्थित रहे। सभी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन संदर्भों में समझने, उसके मूल्यों को जीवन में अपनाने तथा समाज में ज्ञान, संस्कार एवं सांस्कृतिक चेतना के प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।
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