हाईकोर्ट ने कुलाधिपति का आदेश निरस्त किया:लखनऊ विश्वविद्यायल में दो एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियों को वैध माना

Oct 16, 2026 - 23:47
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हाईकोर्ट ने कुलाधिपति का आदेश निरस्त किया:लखनऊ विश्वविद्यायल में दो एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियों को वैध माना
हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने लखनऊ विश्वविद्यालय के दो एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्तियां रद्द करने के कुलाधिपति के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विषय में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए निर्धारित विशेष अर्हताओं को ही प्रभावी माना जाएगा। सामान्य पात्रता की शर्तों के आधार पर विशेष प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दोनों शिक्षकों के चयन को वैध ठहराते हुए उन्हें नियुक्ति से जुड़े सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में हुई थी नियुक्ति न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने डॉ. हिमांशु मोहन और डॉ. संगीता साहू की अलग-अलग याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। दोनों की नियुक्ति लखनऊ विश्वविद्यालय के वाणिज्य संकाय के बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर हुई थी। हालांकि, नियुक्तियों के खिलाफ शिकायत के बाद कुलाधिपति ने 27 नवंबर 2017 को उत्तर प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 68के तहत इन्हें निरस्त कर दिया था। दोनों नियुक्तियों को डॉ. ऋतु नारंग ने चुनौती दी थी। शिकायत में कहा गया था कि चयनित अभ्यर्थियों ने शोधार्थियों और डॉक्टरेट विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने से संबंधित प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए थे। यह शर्त विश्वविद्यालय की प्रथम परिनियमावली के सामान्य प्रावधानों में शामिल थी। इसी आधार पर कुलाधिपति ने नियुक्तियां रद्द करने का निर्णय लिया था। संबंधित विषय के विशेष प्रावधान लागू होंगे हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने तीन दिसंबर 2013 को विश्वविद्यालय की प्रथम परिनियमावली में यूजीसी के वर्ष 2010 के विनियमों को शामिल किया था। इसके तहत परिनियम 11.03.04 (जी) में प्रबंधन एवं बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विषय के शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विशेष अर्हताएं निर्धारित की गई थीं। अदालत ने कहा कि बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन विभाग वाणिज्य संकाय के अंतर्गत होने के बावजूद नियुक्तियों पर संबंधित विषय के विशेष प्रावधान लागू होंगे। जब चयन समिति ने इन्हीं विशेष प्रावधानों के तहत चयन किया और संबंधित दस्तावेज मांगे ही नहीं, तो केवल प्रमाण प्रस्तुत नहीं करने के आधार पर नियुक्तियों को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। खंडपीठ ने दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए नियुक्तियां रद्द करने का आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही, दोनों शिक्षकों को उनकी नियुक्तियों से जुड़े सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया।

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