इलाहाबाद-झांसी MLC चुनाव में 1952 से प्रयागराज का दबदबा:अब कौशांबी के डॉ. मानसिंह का जालौन के अशोक राठौड़ से मुकाबला
विधान परिषद की इलाहाबाद-झांसी खंड स्नातक निर्वाचन सीट पर मुकाबला प्रयागराज और बुंदेलखंड के बीच है। यहां का चुनावी इतिहास क्षेत्रीय प्रभाव, लंबे कार्यकाल और सियासी बदलावों की कहानी कहता है। वर्ष 1952 से अब तक इस सीट पर प्रयागराज से जुड़े नेताओं का दबदबा रहा है। शुरुआती दौर में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहासकार और प्रोफेसर डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लगातार जीत दर्ज की तो बाद में भाजपा के डॉ. यज्ञदत्त शर्मा ने 24 साल तक सीट का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 2020 में सपा के डॉ. मानसिंह यादव ने भाजपा के इस लंबे वर्चस्व को खत्म कर दिया। अब 2026 के चुनाव में कौशांबी के डॉ. मान सिंह यादव के सामने भाजपा के जालौन (बुंदेलखंड) निवासी अशोक कुमार राठौड़ की चुनौती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी गणित किसका भारी रहता है। इस चुनाव में क्षेत्रीय समीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र में प्रयागराज, कौशाम्बी और फतेहपुर के साथ बुंदेलखंड के सात जिले शामिल हैं। कुल 10 जिलों के स्नातक मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं। इनमें प्रयागराज में सबसे अधिक मतदाता हैं। ऐसे में यहां के मतदाताओं की भागीदारी और मतदान का रुझान चुनावी गणित में अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि, केवल मतदाताओं की संख्या के आधार पर किसी प्रत्याशी की जीत तय नहीं मानी जा सकती। 1952 में डॉ. ईश्वरी प्रसाद से चुनावी सफर इलाहाबाद-झांसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के शुरुआती चुनाव में वर्ष 1952 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहासकार और प्रोफेसर डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की। उन्होंने 1958 और 1966 के चुनावों में भी विजय हासिल की। इस तरह शुरुआती दशकों में इलाहाबाद के शिक्षाविद का इस सीट पर प्रभाव बना रहा। इसके बाद वर्ष 1978 में बांदा के जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव ने जीत दर्ज की। वर्ष 1984 में झांसी के रमेश चंद्र श्रीवास्तव विजयी हुए। उन्होंने 1990 में भी जीत हासिल की। इस दौर में बुंदेलखंड के नेताओं ने सीट पर अपनी उपस्थिति मजबूत की। हालांकि, चुनावी इतिहास में प्रयागराज से जुड़े चेहरों का प्रभाव लगातार बना रहा।
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