सियोल ने कैसे हराया ट्रैफिक जाम भारत के लिए बड़ी सीख
भारत में सड़कें चौड़ी करने, फ्लाईओवर बनाने और नए मार्ग तैयार करने के बावजूद यातायात जाम की समस्या लगातार बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन की कमी है। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल ने बस और मेट्रो को एकीकृत करके, अलग बस मार्ग और एकीकृत किराया व्यवस्था लागू कर यातायात सुधारने का सफल मॉडल पेश किया। भारत के लिए सबसे बड़ी सीख है कि केवल सड़कें बढ़ाना नहीं, बल्कि तेज, सस्ता, सुरक्षित और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन विकसित करना जरूरी है।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 8 अक्टूबर 2026
भारत में लगातार सड़कें चौड़ी करने, फ्लाईओवर बनाने और नए मार्ग तैयार करने के बावजूद बड़े शहरों में यातायात जाम की समस्या बनी हुई है। इसका बड़ा कारण निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन की कमी है। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल ने सड़कें बढ़ाने के बजाय बस और मेट्रो व्यवस्था को एकीकृत करके इस समस्या से काफी हद तक निपटने का रास्ता दिखाया है।
भारत में बढ़ते जाम की असली वजह क्या है
भारत के शहरों में यातायात का दबाव लगातार बढ़ रहा है। पहली बार हुए राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वेक्षण में सामने आया कि जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच देश के 14,274 गांवों और 10,377 शहरी क्षेत्रों में लाखों परिवारों और लोगों से यात्रा से जुड़ी जानकारी जुटाई गई। इस सर्वेक्षण के अनुसार काम पर जाने वाले लोगों में सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 15 प्रतिशत है।यदि ऑटो और ई-रिक्शा को अलग कर दिया जाए तो बस, रेल और मेट्रो जैसे बड़े सार्वजनिक परिवहन साधनों की हिस्सेदारी केवल करीब 9 प्रतिशत रह जाती है। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग मजबूरी में निजी दोपहिया और चारपहिया वाहनों पर निर्भर रहते हैं। यही कारण है कि केवल सड़कें बढ़ाने से यातायात का दबाव कम नहीं हो पा रहा है।
लोगों की पसंद नहीं, विकल्पों की कमी है बड़ी समस्या
अक्सर यह माना जाता है कि लोग अपनी बाइक या कार इसलिए चलाना पसंद करते हैं क्योंकि वे सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल नहीं करना चाहते। लेकिन असली समस्या कई शहरों में सार्वजनिक परिवहन की सुविधा, समय और पहुंच से जुड़ी है। यदि बस समय पर नहीं आती, मेट्रो स्टेशन घर से कई किलोमीटर दूर है और एक साधन से दूसरे साधन में जाने के लिए अलग-अलग किराया देना पड़े, तो निजी वाहन अधिक आसान विकल्प बन जाता है।इसका सीधा असर सड़कों पर दिखाई देता है। जितने अधिक लोग निजी वाहन लेकर निकलते हैं, उतना ही सड़क पर वाहनों का दबाव बढ़ता है। इसलिए यातायात की समस्या का समाधान केवल नई सड़कें और फ्लाईओवर बनाना नहीं, बल्कि लोगों को निजी वाहनों का बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना भी है।
सियोल भी कभी इसी समस्या से जूझ रहा था
दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल ने भी तेजी से बढ़ती आबादी और निजी वाहनों के कारण गंभीर यातायात समस्या का सामना किया था। वर्ष 1990 से 1995 के बीच सियोल में कारों की संख्या करीब 10 लाख से बढ़कर 20 लाख हो गई थी। यानी केवल पांच वर्षों में कारों की संख्या दोगुनी हो गई।सरकार ने सड़कें बढ़ाईं और मेट्रो का विस्तार किया, लेकिन यातायात जाम की समस्या खत्म नहीं हुई। वर्ष 1996 से 2002 के बीच कारों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई, जबकि बसों की हिस्सेदारी 30.1 प्रतिशत से घटकर 26.9 प्रतिशत रह गई। इससे साफ हुआ कि केवल ढांचागत निर्माण समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
ज्यादा सड़कें होने के बावजूद जाम क्यों नहीं घटा?
वर्ष 2000 तक सियोल में सड़क घनत्व बीजिंग और शंघाई जैसे बड़े शहरों की तुलना में तीन से चार गुना अधिक था। इसके बावजूद यातायात की समस्या बनी रही। मेट्रो का विस्तार भी हुआ, लेकिन उसका बड़ा लाभ उन यात्रियों को मिला जो पहले से बसों का इस्तेमाल करते थे।इससे निजी वाहनों की संख्या पर अपेक्षित असर नहीं पड़ा। सियोल में चलने वाली बस कंपनियों की संख्या भी घटने लगी और सार्वजनिक बस व्यवस्था कमजोर होती गई। तब शहर को समझ आया कि केवल सड़क और मेट्रो का विस्तार करने के बजाय पूरे सार्वजनिक परिवहन तंत्र को एक साथ सुधारना जरूरी है।
1 जुलाई 2004 को सियोल में हुआ बड़ा बदलाव
वर्ष 2002 में सियोल के तत्कालीन नगर प्रमुख ली म्युंग-बाक ने सड़कें बढ़ाने के बजाय बस व्यवस्था को नए सिरे से तैयार करने की योजना बनाई। इसके बाद करीब दो वर्षों तक यात्रियों की आवाजाही, सड़क के उपयोग और सार्वजनिक परिवहन से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया गया।1 जुलाई 2004 को सियोल ने सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में बड़ा बदलाव लागू किया। बस मार्गों का पुनर्गठन किया गया, बसों के लिए अलग मार्ग बनाए गए, बस और मेट्रो के बीच आवागमन आसान किया गया और एकीकृत किराया व्यवस्था शुरू की गई। इसका उद्देश्य लोगों को निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन की ओर आकर्षित करना था।
बस मार्गों का पूरा ढांचा बदला गया
सियोल में 400 से अधिक बस मार्गों को अलग-अलग श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया। नीली बसों को लंबी दूरी के मुख्य मार्गों के लिए रखा गया, जबकि हरी बसें मेट्रो स्टेशनों तक यात्रियों को पहुंचाने वाली छोटी दूरी की सेवा बनीं। लाल बसों को उपनगरों से शहर के मुख्य हिस्सों तक तेज यात्रा के लिए इस्तेमाल किया गया।इस व्यवस्था ने बस और मेट्रो के बीच बेहतर तालमेल बनाया। यात्री छोटी दूरी के लिए हरी बस का इस्तेमाल करके मेट्रो तक पहुंच सकते थे और फिर मेट्रो या नीली बस के माध्यम से लंबी दूरी तय कर सकते थे। इससे सार्वजनिक परिवहन को अलग-अलग साधनों के बजाय एक जुड़े हुए तंत्र के रूप में विकसित किया गया।
बसों के लिए बनाई गई अलग लेन
सियोल ने प्रमुख सड़कों के बीच में बसों के लिए अलग लेन तैयार की। इन मार्गों पर निजी कारों और अन्य वाहनों के प्रवेश को रोक दिया गया, जिससे बसों को यातायात में फंसने से काफी राहत मिली। जुलाई 2004 में कई प्रमुख मार्गों पर इसकी शुरुआत की गई।इसके बाद इन अलग बस मार्गों का लगातार विस्तार किया गया। वर्ष 2014 तक सियोल में ऐसे बस मार्गों की लंबाई करीब 117.5 किलोमीटर हो गई थी। जिन मार्गों पर पहले बसों की औसत गति करीब 11 किलोमीटर प्रति घंटा थी, वहां यह बढ़कर लगभग 20 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई।
एक ही टिकट से बस और मेट्रो की यात्रा
सियोल के बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा किराया व्यवस्था थी। पहले बस, मेट्रो और टैक्सी के लिए अलग-अलग भुगतान करना पड़ता था। वर्ष 2004 में ऐसी व्यवस्था शुरू की गई जिसमें यात्री एक ही भुगतान व्यवस्था के माध्यम से बस और मेट्रो की यात्रा कर सकते थे।यात्रियों को सीमित समय के भीतर एक सार्वजनिक परिवहन साधन से दूसरे साधन में बदलने पर दोबारा पूरा किराया नहीं देना पड़ता था। इसके लिए स्मार्ट यात्रा कार्ड की व्यवस्था शुरू की गई। इससे यात्रियों के लिए सार्वजनिक परिवहन सस्ता, आसान और सुविधाजनक हो गया।
सियोल ने फ्लाईओवर भी हटाया
सियोल ने यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए केवल नया निर्माण नहीं किया, बल्कि एक बड़े पुराने मार्ग को हटाने का भी फैसला किया। करीब 5.8 किलोमीटर लंबे चोंगग्येचोन मार्ग पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में निजी वाहन चलते थे। इसे हटाने के फैसले का शुरुआत में काफी विरोध और आशंका हुई।इसके स्थान पर नदी और आसपास के क्षेत्र को पुनर्जीवित किया गया तथा सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया गया। इसके बाद केंद्रीय सियोल में निजी वाहनों की संख्या में कमी देखने को मिली। बस और मेट्रो यात्रियों की संख्या भी बढ़ी, जिससे यह उदाहरण सामने आया कि हर समस्या का समाधान सड़क बढ़ाना नहीं होता।
सियोल में सार्वजनिक परिवहन का क्या असर हुआ
बदलावों के बाद सियोल में सार्वजनिक परिवहन लोगों की रोजमर्रा की यात्रा का महत्वपूर्ण साधन बन गया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वहां बड़ी संख्या में लोग बस और मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं तथा एक यात्रा में यात्री जरूरत के अनुसार कई बार साधन बदल सकते हैं।सियोल में सार्वजनिक परिवहन को इस तरह तैयार किया गया कि यात्रियों को घर से गंतव्य तक पहुंचने के लिए निजी वाहन पर निर्भर न रहना पड़े। सार्वजनिक परिवहन की पहुंच, गति, किराया और आपसी जुड़ाव ने लोगों को निजी कारों और दोपहिया वाहनों का विकल्प दिया।
भारत में सार्वजनिक परिवहन की स्थिति
भारत में सार्वजनिक परिवहन की स्थिति अभी भी कई शहरों में चुनौतीपूर्ण है। देश के शहरों में बसों की संख्या सीमित है और उपलब्ध बसों का बड़ा हिस्सा कुछ बड़े महानगरों में ही केंद्रित है। छोटे और मध्यम शहरों में सार्वजनिक परिवहन के सीमित विकल्प लोगों को निजी वाहनों पर निर्भर करते हैं।कुछ राज्यों और महानगरों में मेट्रो तथा स्थानीय रेल का उपयोग बढ़ा है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक परिवहन की हिस्सेदारी अभी भी कम है। जब तक बस, मेट्रो, स्थानीय रेल और अंतिम छोर तक पहुंचाने वाली सेवाओं को एक साथ नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक निजी वाहनों पर निर्भरता कम करना मुश्किल रहेगा।
दिल्ली की बस तीव्र परिवहन व्यवस्था से क्या सीख मिलती है
दिल्ली में वर्ष 2008 में अलग बस मार्ग वाली व्यवस्था शुरू की गई थी। हालांकि इसे कई दूसरी जरूरी सुविधाओं और नीतियों के साथ पर्याप्त रूप से नहीं जोड़ा जा सका। यात्रियों को अंतिम छोर तक पहुंचाने वाली सेवा, पार्किंग व्यवस्था और अन्य परिवहन नीतियों की कमी के कारण यह प्रयोग अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया।सियोल का उदाहरण बताता है कि केवल सड़क के एक हिस्से को बसों के लिए अलग कर देना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ बस मार्गों का पुनर्गठन, मेट्रो से जुड़ाव, एकीकृत किराया, समयबद्ध सेवा और यात्रियों के लिए आसान बदलाव की सुविधा भी जरूरी है।
भारत के लिए सियोल की सबसे बड़ी सीख क्या है
सियोल की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि यातायात जाम का स्थायी समाधान केवल सड़कें चौड़ी करना, फ्लाईओवर बनाना या नए मार्ग तैयार करना नहीं है। यदि निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ती रहेगी तो नई सड़कें भी कुछ समय बाद वाहनों से भर जाएंगी।भारत को ऐसा सार्वजनिक परिवहन तंत्र तैयार करने की जरूरत है जो तेज, सस्ता, सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध हो। बस और मेट्रो को एक-दूसरे से जोड़ना, एकीकृत किराया व्यवस्था लागू करना और हर इलाके तक अंतिम छोर की परिवहन सुविधा पहुंचाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
विकास की असली पहचान बेहतर यात्रा होनी चाहिए
शहर में सड़क और फ्लाईओवर बनना विकास का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन केवल निर्माण को विकास का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। असली सवाल यह होना चाहिए कि आम नागरिक अपने घर से काम की जगह तक कितनी आसानी, कम समय और कम खर्च में पहुंच पा रहा है।सियोल ने दिखाया कि यदि सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दी जाए तो लोग निजी वाहनों के बजाय बस और मेट्रो को चुन सकते हैं। भारत के बड़े शहर भी इस अनुभव से सीख लेकर ऐसा परिवहन तंत्र बना सकते हैं, जिसमें सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं बल्कि लोगों की सुविधाजनक यात्रा के लिए तैयार की जाएं।
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