जंतर-मंतर पर धरना दिया तो होगी कार्रवाई दो नेता तिहाड़ जेल भेजे गए
दिल्ली के जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद बिना अनुमति धरना देने वालों पर कानूनी कार्रवाई का खतरा बढ़ गया है। कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया है। जानिए प्रदर्शन के अधिकार, प्रशासनिक प्रतिबंधों और जमानत से जुड़े कानूनी पहलुओं के बारे में।
दि राइजिंग न्यूज़ | नई दिल्ली | 14 अक्टूबर 2026
दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने वालों के लिए कानूनी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। प्रदर्शन स्थल को लेकर प्रशासनिक पाबंदियों के बाद अब यहां धरना देने और भीड़ जुटाने की अनुमति पर सवाल उठ रहे हैं। बिना अनुमति प्रदर्शन करने पर संबंधित लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे लोगों के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है।जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न जनसमूहों के विरोध प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां लोग अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए धरना देते रहे हैं। लेकिन किसी स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति समाप्त होने या प्रतिबंध लागू होने के बाद वहां सभा करने की कानूनी स्थिति बदल सकती है। इसलिए प्रदर्शनकारियों को प्रशासन के आदेशों और लागू कानूनों का पालन करना जरूरी है।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला
दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर को निर्धारित विरोध प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। पुलिस के अनुसार, यह कदम उच्चतम न्यायालय के 9 अक्टूबर के आदेश के बाद उठाया गया, जिसमें विरोध प्रदर्शन के लिए उपयुक्त वैकल्पिक स्थान निर्धारित करने की बात कही गई थी। इसके बाद दिल्ली में प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को वैकल्पिक स्थानों के रूप में निर्धारित किया गया। इस फैसले के बाद जंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने वालों के सामने कानूनी कार्रवाई का खतरा बढ़ गया है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में विरोध प्रदर्शन करना पूरी तरह प्रतिबंधित हो गया है। नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन उचित प्रतिबंध लगा सकता है। किसी कार्रवाई की वैधता संबंधित आदेशों, परिस्थितियों और लागू कानूनों पर निर्भर करेगी।
प्रदर्शन करने पर दो नेताओं को भेजा गया तिहाड़ जेल
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मामले में कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा गया है। पुलिस के अनुसार, दोनों नेताओं पर निर्धारित प्रदर्शन स्थल में कथित तौर पर बिना अनुमति प्रवेश करने और पहले दिए गए शांति बनाए रखने संबंधी आश्वासनों का उल्लंघन करने के आरोप हैं। अधिकारियों ने उनकी पिछली गतिविधियों और आदेशों के कथित उल्लंघन को भी कार्रवाई का आधार बताया है। रिपोर्टों के अनुसार, 13 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने कथित तौर पर अवरोधक पार करके जंतर-मंतर परिसर में प्रवेश किया था। वहां राष्ट्रीय ध्वज लहराने और नारे लगाने के बाद पुलिस ने संबंधित लोगों को हिरासत में लिया। इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया गया। इस कार्रवाई के बीच प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।
क्या जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पर सीधे जेल होगी
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद वहां बिना अनुमति सभा करने पर पुलिस कानूनी कार्रवाई कर सकती है। हालांकि, हर प्रदर्शनकारी को स्वतः जेल भेजे जाने या प्रत्येक मामले में जमानत न मिलने का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित व्यक्ति ने कौन-सा आदेश तोड़ा, उस पर क्या आरोप लगाए गए और न्यायालय मामले के तथ्यों को किस तरह देखता है।यदि कोई व्यक्ति प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करता है, अवैध रूप से परिसर में प्रवेश करता है या अन्य दंडनीय गतिविधि में शामिल पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध लागू कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है। गिरफ्तारी, हिरासत, न्यायिक हिरासत और जमानत अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इसलिए केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर सभी लोगों के लिए एक जैसी सजा या जमानत की स्थिति मान लेना उचित नहीं है।
विरोध प्रदर्शन का अधिकार और प्रशासनिक प्रतिबंध
भारतीय संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, इन अधिकारों पर सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य वैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रशासन प्रदर्शन के स्थान, समय और व्यवस्था को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन प्रतिबंधों की वैधता और उचित होने का प्रश्न न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है। जंतर-मंतर को निर्धारित स्थल की सूची से हटाने के फैसले पर भी कानूनी सवाल उठे हैं। भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष उदय भानु चिब ने वहां प्रदर्शन की अनुमति नहीं दिए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। दिल्ली उच्च न्यायालय में इस मामले पर सुनवाई के दौरान पुलिस ने बताया कि स्थल को उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया गया है। ऐसे में आगे की न्यायिक सुनवाई यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि प्रदर्शन की अनुमति और वैकल्पिक स्थानों से जुड़े नियम किस तरह लागू होंगे।
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