काशी में 2022 से 2024 में आत्महत्या 21% बढ़ा:197 लोगों ने जान गंवाई; विशेषज्ञ बोले- अकेलापन, तनाव और बातचीत की कमी बढ़ा रही परेशानी

Sep 25, 2026 - 08:31
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काशी में 2022 से 2024 में आत्महत्या 21% बढ़ा:197 लोगों ने जान गंवाई; विशेषज्ञ बोले- अकेलापन, तनाव और बातचीत की कमी बढ़ा रही परेशानी
जिंदगी से हार मानने का फैसला अक्सर अचानक नहीं होता। कई बार इसके पीछे लंबे समय से चल रहा तनाव, अकेलापन, रिश्तों में परेशानी और मन की बात किसी से न कह पाने की स्थिति होती है। वाराणसी शहर में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी इस चिंता की ओर इशारा करते हैं। 2022 में शहर में 163 आत्महत्या दर्ज हुई थीं, जो 2024 में बढ़कर 197 हो गईं। यानी दो साल में 34 मामले और 20.9% की बढ़ोतरी हुई। 2023 में भी 197 मामले दर्ज हुए थे। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक अब 13-14 साल के बच्चों तक में आत्महत्या से जुड़े विचार देखने को मिल रहे हैं। वहीं टेली-मानस के आंकड़े बताते हैं कि मानसिक परेशानी को लेकर युवा बड़ी संख्या में मदद मांग रहे हैं। 2022 में 163, 2024 में 197; दो साल में 34 मामले बढ़े एनसीआरबी की ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया’ रिपोर्ट के मुताबिक 2022 में वाराणसी में 163 आत्महत्या दर्ज हुई थीं। उस साल आत्महत्या की दर 11.3 प्रति लाख थी। 2023 में यह संख्या बढ़कर 197 हुई और 2024 में भी 197 रही। यानी 2022 के मुकाबले 2024 में 34 ज्यादा मामले दर्ज हुए। प्रतिशत में यह बढ़ोतरी 20.9% है। 2024 में आत्महत्या की दर 13.7 प्रति लाख रही। यानी वाराणासी में प्रति लाख 14 लोग आत्महत्या कर रहे है। ‘आत्महत्या अचानक नहीं होती, पीछे मानसिक परेशानी होती है’ मनोचिकित्सक डॉ. उपासना राय ने बताया कि आत्महत्या को सिर्फ एक घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक इसके पीछे मानसिक परेशानी के साथ-साथ मनोसामाजिक कारण भी होते हैं। लोगों में धैर्य और चीजों को सहने की क्षमता कम होना, रिश्तों में परेशानी और परिवार में एडजस्टमेंट की समस्या बढ़ना इसके कारणों में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पहले संयुक्त परिवार में लोग एक-दूसरे से अपनी बातें साझा करते थे। परिवार में कोई परेशानी होती थी तो कई लोग मिलकर उसे सुलझाते थे। अब परिवार छोटे हो गए हैं। लोग एक-दूसरे से अपनी भावनाएं साझा कम कर रहे हैं। मोबाइल और ऑनलाइन दुनिया में व्यस्तता बढ़ी है, लेकिन आमने-सामने बातचीत कम हुई है। बच्चों में भी बढ़ रहा बातचीत का गैप डॉ. उपासना राय के मुताबिक बच्चों के मामले में माता-पिता और उनके बीच बातचीत का गैप बढ़ना चिंता की बात है। कई बार बच्चा परेशान होता है, लेकिन माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं होती। जब बच्चे से अलग बैठकर बात की जाती है तो ऐसी परेशानियां सामने आती हैं, जिनके बारे में परिवार को पहले पता ही नहीं था। मानसिक बीमारी को लेकर समाज में अब भी झिझक है। कई लोग इस डर से इलाज के लिए नहीं जाते कि लोग क्या कहेंगे। दवाओं को लेकर गलत धारणाएं भी इलाज में बाधा बनती हैं। इससे ट्रीटमेंट गैप बढ़ता है। 13-14 साल के बच्चों तक पहुंच रहे आत्महत्या से जुड़े विचार मनोचिकित्सक डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि बच्चों में आत्महत्या से जुड़े मामले चिंता का विषय हैं। उनके अनुसार पहले 20 साल से कम उम्र के बच्चों में ऐसे मामले कम देखने को मिलते थे, लेकिन अब 13-14 साल तक के बच्चों में भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने इसके पीछे सोशल मीडिया, मोबाइल और इंडोर गेम्स में ज्यादा व्यस्त रहना, बाहर खेलना कम होना और परिवार के दूसरे सदस्यों से संपर्क कम होना जैसे कारण बताए। पहले संयुक्त परिवार में दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची और दूसरे सदस्य बच्चों के साथ रहते थे। अब परिवार छोटे हो रहे हैं और माता-पिता के कामकाजी होने से बच्चों को पर्याप्त समय न मिल पाने की स्थिति भी बन रही है। डॉ. अरविंद कुमार ने यह भी कहा कि मोबाइल पर कुछ ऐसा कंटेंट या गेम भी बच्चों के सामने आ सकता है, जिसमें आत्महत्या को बढ़ावा देने वाली चीजें दिखाई जाती हैं। बच्चों में धैर्य कम होना, सोशल रिलेशन कम होना और पढ़ाई समेत दूसरे दबाव भी परेशानी बढ़ा रहे हैं। ओपीडी में डिप्रेशन और आत्महत्या के विचार वाले मरीज भी आ रहे मनोचिकित्सक डॉ. अरविंद कुमार के मुताबिक पहले से मानसिक बीमारी वाले मरीजों में आत्महत्या का जोखिम रहता है, लेकिन अब ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें पहले से कोई मानसिक बीमारी नहीं मानी जाती थी और उनमें भी आत्महत्या की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। ‘एक फोन ने रोक दिया’, समय पर मदद मिलने से संभले मरीज मनोचिकित्सक डॉ. उपासना राय ने बताया कि हाल में उनके पास ऐसे मरीज भी आए, जिनमें आत्महत्या का गंभीर विचार था। एक मरीज ने बताया कि वह आत्महत्या करने के लिए निकल चुका था, तभी घर से फोन आ गया। परिवार से बात होने के बाद वह वापस लौट आया। एक अन्य मरीज को गांव के लोग समय रहते अस्पताल लेकर पहुंचे। दोनों मरीज अब स्वस्थ हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ बातचीत और समय पर मदद लेने को महत्वपूर्ण मानते हैं। किस मानसिक स्थिति में आत्महत्या का खतरा दिख सकता है? डॉ. उपासना राय के मुताबिक आत्महत्या के विचार अलग-अलग मानसिक परेशानियों और परिस्थितियों के साथ दिखाई दे हैं। डिप्रेशन, एंग्जायटी, रिश्तों की समस्या, गुस्से और एडजस्टमेंट की परेशानी जैसे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे आत्महत्या के प्रेरित करने का कारण होते है। आत्महत्या को केवल एक कारण से जोड़ना सही नहीं है। मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दोनों तरह के कारण जुड़े हो सकते हैं। मौसम बदलने पर भी मूड में बदलाव महसूस हो सकता है डॉ. उपासना राय ने सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक मौसम का असर मूड पर पड़ सकता है। इसे आत्महत्या का सीधा कारण नहीं माना जा सकता। डॉक्टर ने इसे मूड में बदलाव से जुड़ी स्थिति के रूप में बताया है। ‘न्यूक्लियर फैमिली और नौकरी का दबाव भी बढ़ा रहा स्ट्रेस’ टेली-मानस समाजसेवी मनोचिकित्सक पंकज कुमार यादव के मुताबिक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कॉल में स्ट्रेस, रिलेशनशिप और फैमिली कॉन्फ्लिक्ट जैसी समस्याएं लगातार सामने आती हैं। उन्होंने बताया कि आज की भागदौड़ वाली जिंदगी, छोटे परिवार, नौकरी का दबाव और सफलता को लेकर बनी अपेक्षाएं भी तनाव बढ़ा रही हैं। उनका कहना है कि युवाओं में पढ़ाई, भविष्य, नौकरी और रिश्तों को लेकर परेशानी से जुड़े कॉल आते हैं। परीक्षा के समय छात्रों के कॉल बढ़ने की बात भी उन्होंने बताई। टेली-मानस में रोज करीब 150 कॉल, कभी 200 तक पहुंचते हैं पंकज कुमार यादव के मुताबिक केंद्र पर रोजाना करीब 150 से ज्यादा कॉल आते हैं। कभी यह संख्या करीब 200 तक पहुंचती है और कभी करीब 120 रहती है। जनवरी से अगस्त 2026 के उपलब्ध रिकॉर्ड में कुल 28,244 कॉल दर्ज हैं। इनमें 27,548 इनकमिंग और 696 आउटगोइंग कॉल हैं। अगस्त में 14-30 साल के युवाओं के 1,783 कॉल अगस्त 2026 के उम्रवार आंकड़ों में 21-30 साल के लोगों के सबसे ज्यादा 1,181 कॉल आए। 14-20 साल के युवाओं के 602 कॉल रहे। दोनों आयु समूहों को मिलाकर 1,783 कॉल हुए, जो अगस्त के 4,228 कुल कॉल का करीब 42.2% है। यहां एक सावधानी जरूरी है: इन आंकड़ों में 21-30 साल का पूरा समूह दिया गया है, इसलिए पूरे 1,783 कॉल को केवल जेन-जी का कॉल कहना सही नहीं होगा। लेकिन जेन-जी की बड़ी उम्र-सीमा इन्हीं समूहों में आती है। तनाव को मन में न रखें, भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें टेली-मानस समाजसेवी मनोचिकित्सक पंकज कुमार यादव ने सलाह दी कि अगर आपको आत्महत्या का विचार आता है तो किसी करीबी से बात रहें। एंजायटी और डिप्रेशन को दूर करने के लिए नियमित नींद, दिनचर्या, शारीरिक व्यायाम, योग-मेडिटेशन, परिवार से संपर्क बनाए रखने और भरोसेमंद व्यक्ति से अपनी परेशानी साझा करें। छात्रों को पढ़ाई और भविष्य के दबाव के बीच परिवार और पुराने दोस्तों से संपर्क बनाए रखे।

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