काशी में बनकर तैयार हो रही 64 योगिनियों के चित्र:2 महीनों तैयार होकर उज्जैन के त्रिवेणी म्यूजियम में लगेंगे चित्र
आठ माताओं से तो सब परिचित है पर उनकी सहायक 64 मातृकाओं के बारे में अभी लोगों में इतनी जागरूकता नहीं है। इन 64 मातृकाओं को योगिनियां कहते हैं। इनके चित्र काशी में बनाए जा रहे हैं।उत्तर प्रदेश ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के ललित कला विभागाध्यक्ष डॉ. सुनील विश्वकर्मा इन चित्रों को बना रहे हैं। करीब 2 महीने में ये चित्र तैयार हो जाएंगे। इसके बाद इन्हें उज्जैन के त्रिवेणी म्यूजियम में प्रदर्शित किया जाएगा। अब तक 64 योगिनियों के करीब 35 चित्र तैयार हो चुके हैं। इस प्रोजेक्ट के साथ वे कृष्ण लीला के बाल स्वरूपों पर भी काम कर रहे हैं। इससे पहले वे हनुमान चालीसा की 40 चौपाइयों पर आधारित 40 चित्र बना चुके हैं। अयोध्या में रामलला के बाल स्वरूप की मूर्ति के लिए भी उन्होंने चित्र बनाया था। डॉ. सुनील विश्वकर्मा बताते हैं कि 64 योगिनियों के चित्र बनाने के लिए उन्होंने पहले ओडिशा और जबलपुर स्थित 64 योगिनी मंदिरों का दौरा किया और पुराणों का अध्ययन किया। इंटरनेट सहित जिन-जिन माध्यमों से उन्हें इन माताओं के स्वरूपों के बारे में जानकारी मिलती है, वे उसे एकत्र करते हैं। उन्होंने बताया कि उनकी कोशिश रहती है कि सभी चित्रों में योगिनियों के सौम्य और कल्याणकारी स्वरूप को उकेरा जाए। आठ मातृकाओं से जुड़ी हैं 64 योगिनियां डॉ.सुनील विश्वकर्मा बताते हैं कि 64 योगिनियों को समझने के लिए मातृका परंपरा को समझना जरूरी है। उनके अनुसार, आठ मातृकाओं में से प्रत्येक की आठ-आठ सहायक मातृकाएं मानी जाती हैं। इस तरह आठ गुणा आठ से 64 योगिनियों की अवधारणा बनती है। ये देवी शक्ति के अलग-अलग स्वरूपों से जुड़ी हैं। धार्मिक मान्यताओं में योगिनियों को देवी शक्ति के विभिन्न रूपों के तौर पर देखा जाता है। इनके स्वरूप एक-दूसरे से अलग हैं। कुछ का रूप सौम्य है, तो कुछ का रौद्र। इनके चित्रण में चेहरे, अस्त्र-शस्त्र, हाथों में मौजूद वस्तुओं और अन्य प्रतीकों का विशेष महत्व है। काशी में क्यों आई थीं 64 योगिनियां काशी के चौसठी घाट का नाम 64 योगिनियों से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिव जी ने राजा दिवोदास को प्रसन्न करने और काशी में अपने आगमन का रास्ता बनाने के लिए 64 योगिनियों को भेजा था। लेकिन काशी की सुंदरता देखकर योगिनियां यहीं रुक गईं। इसी मान्यता से चौसठी घाट पर स्थित चौसठी माता के मंदिर स्थित है। पुराणों से लेकर मंदिरों तक कर रहे अध्ययन डॉ.सुनील विश्वकर्मा बताते हैं कि 64 योगिनियों के चित्र बनाने का काम मिलने के बाद उन्हें संबंधित साहित्य दिया गया था। साथ ही, उन्हें स्वयं भी अध्ययन करने के लिए कहा गया। इसके बाद उन्होंने कालिका पुराण, स्कंद पुराण और अन्य ग्रंथों में योगिनियों के स्वरूपों का वर्णन देखा। उन्होंने जबलपुर और ओडिशा के चौसठ योगिनी मंदिर का भी दर्शन किया और वहां की प्रतिमाओं का अध्ययन किया। वह बताते हैं कि जबलपुर और ओडिशा के योगिनी मंदिरों में प्रतिमाओं की मुद्राओं में अंतर दिखाई देता है। जबलपुर में प्रतिमाएं बैठी हुई मुद्रा में हैं, जबकि ओडिशा के मंदिर में खड़ी मुद्रा वाली प्रतिमाएं हैं। कलाकार इन अंतरों के साथ पुराणों में दिए गए वर्णन और विद्वानों के व्याख्यानों का भी अध्ययन करते हैं। उनके मुताबिक, चित्र बनाते समय कलाकार को कुछ स्वतंत्रता भी मिलती है। जैसे त्रिशूल के स्वरूप या सर्प की प्रजाति के चित्रण में अलग-अलग रूप दिखाए जा सकते हैं। हालांकि, उनका प्रयास रहता है कि देवी के स्वरूप का मूल भाव और शास्त्रीय वर्णन बना रहे। रौद्र रूप में भी मां का कल्याणकारी भाव डॉ. सुनील विश्वकर्मा बताते हैं कि 64 योगिनियों में कुछ के स्वरूप बहुत रौद्र और डरावने हैं। उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और रूप भी अलग-अलग हैं। लेकिन इन सभी स्वरूपों के साथ मां का भाव जुड़ा है। इसलिए उन्होंने चित्रों में देवी के कल्याणकारी रूप को दिखाने का प्रयास किया है। वह कहते हैं कि घरों में लगाए जाने वाले धार्मिक चित्रों में सौम्यता और मंगलकामना का भाव होना चाहिए। उनके अनुसार, चित्र केवल किसी आकृति का चित्रण नहीं है, बल्कि वह उस वातावरण को भी प्रभावित करता है, जहां उसे रखा जाता है। इसी सोच के साथ वह देवी के रौद्र रूपों में भी मां के कल्याणकारी स्वरूप को उभारने की कोशिश कर रहे हैं। अब तक 35 योगिनियों और 22 कृष्ण लीला के चित्र तैयार डॉ. सुनील विश्वकर्मा बताते हैं कि 64 योगिनियों के कुल 64 चित्र बनाने हैं, जिनमें से अब तक करीब 35 चित्र तैयार हो चुके हैं। इसके साथ ही कृष्ण लीला के बाल स्वरूपों पर भी काम चल रहा है। उनके मुताबिक, कृष्ण लीला के करीब 60 चित्र बनाने हैं और अब तक लगभग 22 चित्र तैयार हो चुके हैं। वह बताते हैं कि एक चित्र बनाने में करीब तीन से चार दिन लगते हैं। हालांकि, चित्रकारी के साथ उनके दूसरे दायित्व भी हैं। वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के ललित कला विभाग में अध्यापन करते हैं और कलाकारों के हित से जुड़े कामों के लिए भी समय निकालते हैं। इसलिए स्टूडियो में मिलने वाले समय के अनुसार चित्रों को पूरा करने का प्रयास करते हैं। हनुमान चालीसा की 40 चौपाइयों पर बनाए 40 चित्र 64 योगिनियों और कृष्ण लीला से पहले सुनील विश्वकर्मा हनुमान चालीसा पर आधारित चित्रों की एक श्रृंखला बना चुके हैं। उन्होंने बताया कि हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयां हैं और हर चौपाई के लिए एक अलग चित्र बनाया गया। इस तरह कुल 40 चित्र तैयार किए गए। उनका प्रयास रहता है कि शास्त्रों में जिस रूप का वर्णन किया गया है, चित्र उसी के अनुरूप हो। साथ ही, चित्र में सौम्यता और शुभता का भाव भी बना रहे, ताकि उसे घरों में लगाया जा सके। रामलला के बाल स्वरूप का चित्र बनाने में लगा एक घंटा डॉ.सुनील विश्वकर्मा के काम में एक महत्वपूर्ण पड़ाव अयोध्या में रामलला की मूर्ति के लिए बाल स्वरूप का चित्र बनाना भी रहा। उन्होंने बताया कि राम जन्मभूमि ट्रस्ट की ओर से उनसे संपर्क किया गया था। ट्रस्ट के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने उन्हें पांच वर्ष के बालक के रूप में भगवान राम का चित्र बनाने के लिए कहा था। वह बताते हैं कि वह रोज पूजा-पाठ और गायत्री मंत्र लेखन करते हैं। एक सुबह पूजा के बाद उन्होंने कागज और पेंसिल उठाई और चित्र बनाना शुरू किया। उनके अनुसार, चित्र करीब एक घंटे में तैयार हो गया और उसमें उन्हें मिटाकर सुधार करने की जरूरत नहीं पड़ी। बाद में ट्रस्ट की ओर से फोन आया कि कमेटी को उनका चित्र पसंद आया है। इसके बाद मूल चित्र मंगाया गया और चयन प्रक्रिया आगे बढ़ी। चीन में सीखी चित्रकला, अब काशी में अध्यापन के साथ साधना सुनील विश्वकर्मा ने चित्रकला की पढ़ाई के लिए चीन में भी समय बिताया। उनके मुताबिक, उन्होंने 2003 से 2005 तक स्कॉलरशिप पर चीन में अध्ययन किया। इसके बाद 2006 में सेंट्रल हिंदू बॉयज स्कूल में कला अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए। 2011 के बाद से वह महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के ललित कला विभाग में कार्यरत हैं। वह बताते हैं कि उनके चित्र भारत के राष्ट्रपति भवन सहित विदेशों में भी पहुंचे हैं। चीन में अध्ययन के दौरान विदेशी विद्यार्थियों ने उनके चित्र खरीदे थे। उनके कुछ चित्र जापान, कोरिया और म्यांमार भी गए। वह कहते है कि मैं रोज चित्र बनाता हुं कभी किसी एक दिन में 4 चित्र बन जाते है कभी एक चित्र को बनाने में एक महीना भी लग जाता है। कलाकार के लिए चित्रकारी केवल पेशा नहीं, बल्कि रोज का अभ्यास है। वह बताते हैं कि हर दिन चित्र बनाने की कोशिश करते हैं और अब चित्रों की गिनती रखना भी छोड़ चुके हैं।
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