काशी में सर्व पितृ अमावस्या पर पिंडदानियों का मेला:पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध के लिए उमड़ी भीड़, पुरोहित बोले-आज के दिन दान का विशेष महत्व
धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी में सर्व पितृ अमावस्या पर शनिवार को पिंडदानियों का मेला लगा। गंगा के विभिन्न घाटों से लेकर पिशाच मोचन कुंड तक सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगी। लोगों ने अपने पितरों की आत्मा की शांति, मुक्ति और मोक्ष की कामना से गंगा में स्नान किया। इसके बाद तीर्थ पुरोहितों के मार्गदर्शन में तर्पण, पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए। पिशाच मोचन कुंड पर विशेष रूप से अकाल मृत्यु से जुड़े पितरों की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कराने वाले श्रद्धालु पहुंचे। पहले 2 तस्वीर देखें… धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सर्व पितृ अमावस्या कहा जाता है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है। इस दिन उन सभी पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध पितृपक्ष के दौरान किसी कारण से नहीं हो पाया हो। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण और पिंडदान से पितरों को शांति मिलती है। पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध का विशेष महत्व काशी के पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध कराने की विशेष धार्मिक मान्यता है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों और अकाल मृत्यु को प्राप्त परिजनों की आत्मा की शांति के लिए कर्मकांड कराते हैं। त्रिपिंडी श्राद्ध में तीन पिंडों के माध्यम से पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है। श्रद्धालु संकल्प लेकर पुरोहितों के निर्देशन में पूजा-पाठ और तर्पण की प्रक्रिया पूरी करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वंश परंपरा में पितरों से संबंधित अनिष्टों की शांति के उद्देश्य से भी त्रिपिंडी श्राद्ध कराया जाता है। काशी में श्राद्ध करने का विशेष महत्व माना जाता है। पिशाच मोचन तीर्थ पर नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, सपिंडन, पार्वण और सांवत्सरिक सहित विभिन्न प्रकार के श्राद्ध कर्म कराए जाते हैं। दशाश्वमेध से अस्सी घाट तक श्रद्धालुओं की भीड़ सर्व पितृ अमावस्या पर दशाश्वमेध घाट, शीतला घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, केदार घाट, अस्सी घाट, तुलसी घाट, पंचगंगा घाट, चौकी घाट, पांडेय घाट और रविदास घाट सहित गंगा तट के विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालु पहुंचे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुरोहितों ने तर्पण और पिंडदान की विधियां संपन्न कराईं। कई परिवारों ने पूर्वजों के नाम पर दान-पुण्य किया और ब्राह्मण भोज भी कराया। संकल्प और तर्पण से पूरी होती है पूजा श्राद्ध कर्म की शुरुआत संकल्प से होती है। श्रद्धालु पवित्र जल हाथ में लेकर अपने पितरों का स्मरण करते हैं और उनके निमित्त तर्पण करते हैं। इसके बाद पुरोहितों के निर्देशन में पिंडदान और अन्य धार्मिक विधियां पूरी की जाती हैं। अनुष्ठान की अवधि पूजा की विधि और श्रद्धालु की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। कई स्थानों पर निर्धारित विधि से कर्मकांड लगभग तीन घंटे में पूरा कराया जाता है। तीर्थ पुरोहित बलराम मिश्र के अनुसार, सर्व पितृ अमावस्या पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त स्नान, दान, श्राद्ध और पिंडदान कर सकते हैं। जिन लोगों को अपने पितरों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती, वे भी इस दिन उनका श्राद्ध कराते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कौए, कुत्ते और गाय को भोजन कराने के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना भी पुण्यकारी माना जाता है।
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