मां को छोड़ने का बेटे पर दबाव बनाना मानसिक क्रूरता:पत्नी बोल रही थी बूढ़ी विधवा मां को छोड़ो, होईकोर्ट बोला- यह क्रूर कृत्य है

Oct 14, 2026 - 19:28
0
मां को छोड़ने का बेटे पर दबाव बनाना मानसिक क्रूरता:पत्नी बोल रही थी बूढ़ी विधवा मां को छोड़ो, होईकोर्ट बोला- यह क्रूर कृत्य है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए कहा- पत्नी का पति पर अपनी 68 वर्षीय विधवा मां को छोड़कर अलग रहने के लिए बार-बार दबाव बनाना मानसिक क्रूरता है। ऐसी स्थिति में पति हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक पाने का हकदार है। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने पति की अपील स्वीकार करते हुए मैनपुरी की फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी मां को उसके बेटे के साथ से वंचित करने का प्रयास क्रूर कृत्य है। मामले में पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी लगातार उसे अपनी बुजुर्ग मां से अलग रहने के लिए मजबूर करती थी और झूठे दहेज के मुकदमे में फंसाने की धमकी भी देती थी। 2000 में हुई थी शादी, दो बेटियां हैं मामले के अनुसार, पति और पत्नी का विवाह 17 फरवरी, 2000 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। दोनों की दो बेटियां हैं। पति अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है और उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में अपनी 68 वर्षीय विधवा मां के साथ रहता है। पति का आरोप था कि शादी की शुरुआत से ही पत्नी उस पर मां से अलग रहने का दबाव बनाती थी। वह उसे लेकर अपने मायके इटावा जाने की मांग करती थी। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उसकी मां का अपमान करती थी और पुलिसकर्मी की बेटी होने का फायदा उठाकर उसे झूठे दहेज के मुकदमों में फंसाने की धमकी देती थी। फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका पति के मुताबिक, 6 जुलाई, 2012 को पत्नी अपने गहने और स्त्रीधन लेकर मायके चली गई थी। पति ने आरोप लगाया कि इनमें उसकी मां के गहने और 50 हजार रुपये नकद भी शामिल थे। पत्नी ने 3 मार्च, 2015 को उसके साथ रहने से अंतिम रूप से इनकार कर दिया। इसके बाद पति ने मैनपुरी की फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल कर दांपत्य अधिकारों की बहाली और वैकल्पिक रूप से तलाक की मांग की। पत्नी को समन तामील नहीं होने पर समाचार पत्र में प्रकाशन के जरिए तामील की प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बाद 22 सितंबर, 2016 को मामले की एकतरफा सुनवाई का आदेश दिया गया। पत्नी न तो लिखित जवाब दाखिल करने पहुंची और न ही सुनवाई में शामिल हुई। 12 जुलाई, 2017 को फैमिली कोर्ट ने एकतरफा सुनवाई के बाद भी पति की याचिका खारिज कर दी और उस पर खर्च भी लगाया। कोर्ट ने माना कि पत्नी अलग रहने का दबाव बनाती रही हो सकती है, लेकिन गहने और नकदी ले जाने के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। इसके पीछे गवाह और गहनों की खरीद के बिल पेश नहीं किए जाने का तर्क दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा- वैवाहिक विवाद को चोरी के मुकदमे की तरह देखा पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील पर सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने वैवाहिक याचिका को चोरी के आपराधिक मुकदमे की तरह देखा और गहने व नकदी ले जाने का आरोप साबित नहीं होने के आधार पर मानसिक क्रूरता से जुड़े साक्ष्यों पर विश्वास नहीं किया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता का आधार केवल गहने और नकदी से जुड़ा आरोप नहीं था। पति को उसकी बुजुर्ग विधवा मां से अलग रहने के लिए मजबूर करने का आरोप भी था। कोर्ट ने इस पहलू को महत्वपूर्ण माना। खंडपीठ ने यह भी कहा कि किसी मामले में प्रतिवादी के पेश नहीं होने से याचिकाकर्ता को अपने आप राहत नहीं मिल जाती। उसे विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर अपना दावा साबित करना होता है। हालांकि, एकतरफा सुनवाई में दिए गए फैसले को भी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिए। झूठे मुकदमे की आशंका भी मानसिक क्रूरता हाईकोर्ट ने माना कि पति को झूठी शिकायत दर्ज कराए जाने की आशंका में जीने के लिए मजबूर करना भी मानसिक क्रूरता हो सकती है। कोर्ट के अनुसार, इस तरह की आशंका किसी सामान्य व्यक्ति को मानसिक रूप से परेशान कर सकती है। खंडपीठ ने कहा कि दांपत्य अधिकारों की बहाली और तलाक की वैकल्पिक मांग एक ही याचिका में की जा सकती है, हालांकि दोनों में से केवल एक ही राहत दी जा सकती है। फैमिली कोर्ट द्वारा पति की पूरी याचिका खारिज कर देने से उसे ऐसी अनिश्चित स्थिति में छोड़ दिया गया, जो न्याय के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है। फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द, विवाह समाप्त हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का फैसला और डिक्री रद्द कर दी। इसके साथ ही विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर पति-पत्नी का विवाह समाप्त कर दिया। दांपत्य अधिकारों की बहाली की वैकल्पिक मांग इसके बाद अप्रासंगिक हो गई। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी ने स्थायी गुजारा भत्ता देने की मांग नहीं की थी, इसलिए उसके लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत आवेदन करने का विकल्प खुला रहेगा।

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User