मोटर दुर्घटना दावों के लिए बीमा अधिकारियों को ट्रेनिंग:मीडिएशन फॉर द नेशन 3.0 अभियान 16 अक्टूबर तक, 2 लाख से ज्यादा मामले लंबित

Oct 12, 2026 - 23:49
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मोटर दुर्घटना दावों के लिए बीमा अधिकारियों को ट्रेनिंग:मीडिएशन फॉर द नेशन 3.0 अभियान 16 अक्टूबर तक, 2 लाख से ज्यादा मामले लंबित
मोटर दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजे के लिए लंबी कानूनी लड़ाई से राहत दिलाने और अदालतों में लंबित मामलों का बोझ घटाने के लिए बीमा कंपनियों को मध्यस्थता की प्रक्रिया से जोड़ा जा रहा है। इसी उद्देश्य से उत्तर प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने मीडिएशन फॉर द नेशन 3.0 अभियान के तहत बीमा कंपनियों के नामित अधिकारियों का 40 घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया है। यह कार्यक्रम 16 अक्टूबर तक चलेगा। रजिस्ट्रार मीडिएशन भगीरथ वर्मा के मुताबिक, प्रदेश के मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों में दो लाख से अधिक मामले लंबित हैं। इस आंकड़े में अपील और विशेष अनुमति याचिकाएं शामिल नहीं हैं। इन मामलों में बीमा कंपनियां भी पक्षकार होती हैं। ऐसे में दावों के निस्तारण के लिए उनके अधिकारियों की मध्यस्थता संबंधी दक्षता महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के संरक्षण, इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली के मार्गदर्शन और लखनऊ खंडपीठ के वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजन रॉय के निर्देश पर आयोजित किया जा रहा है। इसमें सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता एवं सुलह परियोजना समिति के मास्टर ट्रेनर्स अधिकारियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। नाबालिग दावेदारों के मामलों को प्राथमिकता मिले प्राधिकरण की ओर से बीमा कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ हुई बैठक में खास तौर पर नाबालिग दावेदारों के मामलों को प्राथमिकता से देखने पर जोर दिया गया। अधिकारियों से कहा गया कि जहां परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां निष्पक्ष और कानून के अनुरूप समझौते के जरिए दावों का निस्तारण किया जाए, ताकि पीड़ित पक्ष को राहत के लिए लंबे समय तक इंतजार न करना पड़े। प्रशिक्षण कार्यक्रम में अधिकारियों को पक्षकारों के बीच संवाद स्थापित करने, बातचीत के जरिए विवाद के समाधान के विकल्प तलाशने और दोनों पक्षों की सहमति से स्वीकार्य समाधान तक पहुंचने की तकनीक बताई जा रही है। प्राधिकरण का उद्देश्य उपयुक्त मामलों में मुकदमा दाखिल होने से पहले और अदालत में सुनवाई के दौरान मध्यस्थता को बढ़ावा देना है। इससे एक ओर दावेदारों को समय पर राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर अदालतों और अधिकरणों में लंबित मामलों के निस्तारण में भी मदद मिलेगी।

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