नाथ नगरी बरेली में नवदेवी की चमत्कारिक शक्ति पीठ:प्राचीन नवदेवी मंदिर में 41 दिन की हाजिरी से सूनी गोद भी भरती हैं माता रानी
बरेली को देवाधिदेव महादेव की पावन नाथ नगरी के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस तपोभूमि पर बाबा भोलेनाथ के साथ-साथ आदिशक्ति मां भगवती भी दिव्य स्वरूप में विराजमान हैं। शहर के प्राचीन साहूकारा क्षेत्र में स्थित नवदेवी मंदिर आस्था और चमत्कार का ऐसा केंद्र है, जहां मां के नौ स्वरूप एक ही दरबार में विराजते हैं। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर मंदिर में श्रद्धा का सैलाब उमड़ रहा है। ढोल-नगाड़ों और शंखध्वनि के बीच मां के जयकारों से पूरा परिसर गुंजायमान रहता है। शिव की पावन भूमि पर, शक्ति भई साकार।
नौ देवी मंदिर बने, जीवन का आधार॥
इकतालीस दिन जो जपे, माँ के नौ-नौ नाम।
सूनी गोद भराई के, पूरण कीन्हे काम॥ जय जय जय नवदुर्गा माता। सकल मनोरथ पूरण दाता॥
नाथ धाम साहूकारा सोहे। दर्शन करत सकल मन मोहे॥
जो नर निसिदिन द्वारे आवै। जनम जनम के कष्ट नसावै॥ 41 दिन हाजिरी लगाने का अटूट नियम
मंदिर के महंत योगी रवींद्रनाथ बताते हैं कि यह पावन स्थल सिद्ध संत योगी काशीनाथ महाराज की तपोभूमि है। लगभग 70 वर्ष पूर्व उन्होंने एक पैर पर खड़े होकर कठोर तपस्या की थी और मां भगवती की प्रेरणा से इस पावन धाम की आधारशिला रखी थी। मंदिर में यह नियम और अटूट मान्यता स्थापित है कि जो भी श्रद्धालु नियमपूर्वक लगातार 41 दिन मां की आरती में सम्मिलित होता है, मां उसकी झोली कभी खाली नहीं रखतीं। महंत का कहना है— 'जो नर आएगा, वो नर पाएगा, घर बैठे कुछ नहीं मिल पाएगा।' नियम, संयम और अटूट विश्वास के साथ मंदिर आने वाले हर आस्तिक की मनोकामना सिद्ध होती है। भक्तों के चमत्कार: सूनी गोद भरी, हर मुराद हुई पूरी
नवदेवी मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के अनुभव चमत्कारों से भरे हैं। एक महिला श्रद्धालु ने भावुक होते हुए बताया कि शादी के कई वर्षों बाद तक वे संतान सुख से वंचित थीं, लेकिन जब उन्होंने माता रानी के दरबार में 41 दिन तक हाजिरी लगाई और सच्चे मन से अरदास की, तो मां की कृपा से उनकी सूनी गोद भर गई और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। वहीं अन्य भक्तों का कहना है कि रोग, शोक या व्यापारिक संकट—जिसने भी इस चौखट पर माथा टेका, मां ने उसके सभी संकट हर लिए। छप्पर से भव्य शक्तिपीठ बनने का सफर
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 10 अक्टूबर 1966 को संस्थापक योगी काशीनाथ को मां भगवती ने स्वप्न में साक्षात दर्शन देकर अपने नौ स्वरूपों की प्रतिष्ठा का आदेश दिया था। इसके बाद साहूकारा में एक साधारण छप्पर (फूस की छत) डालकर भजन-कीर्तन का क्रम शुरू हुआ। धीरे-धीरे मां की महिमा फैली और जनसहयोग से 3 मार्च 1968 को बसंत पंचमी के पावन दिन मां के नौ स्वरूपों की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। गुरु परंपरा और शक्ति की इस अखंड ज्योति के दर्शन करने हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं। शारद नवरात्र सुहावन में, भइ मंगल आरती धाम महा।
जगदम्ब दयाल कृपालु भई, हर लीन्ह व्यथा सब कष्ट अहा॥
तप सिद्ध पीठ अखंडित ज्योति, मिटे भव-बंधन के सब फेर।
सुख-संपत्ति संतति देत भवानी, करे न कभी निज भक्तन देर॥
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