नरेंद्रानंद सरस्वती बोले- दशहरा केवल पुतला जलाने का पर्व नहीं:समाज की बुराइयों के अंत का संकल्प लें’, मंदिर को सरकार से मुक्त कराए सरकार
सुमेरु पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा- दशहरा केवल रावण का पुतला जलाने का पर्व नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त बुराइयों और रावणी प्रवृत्तियों के अंत का संकल्प लेने का अवसर भी है। महिलाओं के खिलाफ अपराध, अपहरण, मानव तस्करी और हिंसा जैसी घटनाओं को गंभीर चिंता बताते हुए उन्होंने कहा कि बेटियों की सुरक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। वाराणसी पहुंचे शंकराचार्य ने दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत में सनातन धर्म के सामने आ रही चुनौतियों, राष्ट्रीय एकता, धर्मांतरण, मंदिरों के प्रबंधन पर मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि देशवासियों को जाति, भाषा और प्रांत के आधार पर बंटने के बजाय राष्ट्रहित को प्राथमिकता देनी चाहिए। देश की एकता और सुरक्षा के लिए समाज का संगठित रहना जरूरी है। पढ़िए दैनिक भास्कर से खास बातचीत… सवाल: वाराणसी में संतों की बड़ी बैठक होने जा रही है। इसमें किन मुद्दों पर चर्चा होगी? जवाब: अभी हमें इस बैठक की सूचना मिली है। इस पर विचार-विमर्श किया जाएगा। बैठक में देश की आंतरिक और बाहरी चुनौतियों, सनातन धर्म की रक्षा और राष्ट्रीय एकता जैसे विषय प्रमुख रहेंगे। हमारा चिंतन है कि देश के 140 करोड़ लोग एकजुट रहें। जब देशवासी संगठित रहेंगे, तभी भारत सुरक्षित रहेगा। मंदिरों और मठों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने, धर्मांतरण पर कठोर कार्रवाई, देश की सीमाओं की सुरक्षा और सेना को आवश्यक अधिकार देने जैसे विषयों पर भी विचार होना चाहिए। सवाल: वर्तमान समय में सनातन धर्म को लेकर कई तरह की बहस और विवाद सामने आ रहे हैं। आप इसे किस रूप में देखते हैं? जवाब : भारत को अस्थिर करने वाली शक्तियों के प्रति समाज को सतर्क रहने की जरूरत है। सनातन धर्म की रक्षा के लिए लोगों में एकता और जागरूकता होनी चाहिए। हमें जाति, भाषा और प्रांत के आधार पर बंटने के बजाय राष्ट्रहित को प्राथमिकता देनी चाहिए। मेरा मानना है कि एकजुट समाज के सामने कोई भी बाहरी शक्ति देश को नुकसान नहीं पहुंचा सकती। सवाल: देश में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के पीछे विदेशी शक्तियों की भूमिका होने की आशंका पर आपका क्या कहना है? जवाब : सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें सामने आती हैं। ऐसे मामलों में वास्तविकता का पता लगाने के लिए निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। यदि किसी मामले में विदेशी हस्तक्षेप या देशविरोधी गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं, तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों और प्रमाणों की जांच आवश्यक है। देश में अशांति फैलाने की कोशिश करने वालों से सख्ती से निपटना चाहिए। सवाल: विजयादशमी के अवसर पर समाज को क्या संदेश देना चाहेंगे? रावण के पुतले के साथ आज किन बुराइयों का दहन होना चाहिए? जवाब: रावण का पुतला जलाने के साथ समाज में व्याप्त रावणी प्रवृत्तियों का भी विनाश होना चाहिए। आज महिलाओं के खिलाफ अपराध, अपहरण, मानव तस्करी और हिंसा गंभीर चिंताएं हैं। बेटियों की सुरक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें संकल्प लेना चाहिए कि किसी बेटी के साथ अन्याय न हो और महिलाओं को सुरक्षित वातावरण मिले। रावण विद्वान और तपस्वी था, लेकिन उसका अहंकार और अधर्म उसके विनाश का कारण बना। आज भी समाज में ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जिनका अंत जरूरी है। दशहरा हमें बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। इस दिन हमें अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए। सवाल: महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए आप किन उपायों को जरूरी मानते हैं? जवाब: महिलाओं की सुरक्षा के लिए कठोर कानूनों के साथ सामाजिक संस्कार भी जरूरी हैं। परिवार और शिक्षा व्यवस्था में बच्चों को महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव सिखाया जाना चाहिए। मानव तस्करी, अपहरण और हिंसा जैसे अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। समाज में ऐसा वातावरण बने, जहां बेटियां बिना भय के जीवन जी सकें। सवाल: आपने नशे को भी सामाजिक बुराइयों की एक बड़ी वजह बताया। इस पर आपकी क्या राय है? जवाब: नशा परिवार और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाता है। कई परिवारों में कमाई का बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च हो जाता है। इससे आर्थिक संकट बढ़ता है और घरेलू विवाद भी पैदा होते हैं। सरकार को नशामुक्ति के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। नशे की लत से लोगों को बाहर निकालने के लिए जागरूकता, उपचार और सामाजिक सहयोग जरूरी है। यदि नशे पर प्रभावी नियंत्रण हो, तो अनेक पारिवारिक समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है। सवाल: शिक्षा व्यवस्था में आप किस तरह के बदलाव चाहते हैं? जवाब: गुरुकुल परंपरा को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। प्राचीन भारत में गुरुकुलों में अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते थे। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो बच्चों में संस्कार, अनुशासन, ज्ञान और आपसी प्रेम विकसित करे। इसके साथ ही भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि विद्यार्थियों को अपनी भाषा में पढ़ने और आगे बढ़ने के अवसर मिलें। शिक्षा व्यवस्था में समान अवसर और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
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