नवरात्रि स्पेशल: दोनों हाथ गंवाए, मुंह से ब्रश थामा:जापान तक पहुंची हेमा की पेंटिंग, बिना हाथों के बनाती है पेंटिग

Oct 17, 2026 - 06:23
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नवरात्रि स्पेशल: दोनों हाथ गंवाए, मुंह से ब्रश थामा:जापान तक पहुंची हेमा की पेंटिंग, बिना हाथों के बनाती है पेंटिग
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गंगापुर कैंपस से बीएफए की पढ़ाई कर रहीं हेमा चौहान मुंह से ब्रश पकड़कर पेंटिंग बनाती हैं। उनकी बनाई पेंटिंग जापान में आयोजित एक प्रदर्शनी के लिए भी भेजी जा चुकी है। हेमा को 2013 में 11 हजार वोल्ट का करंट लगा था, जिसमें उन्होंने अपने दोनों हाथ खो दिए। इसके बाद वह छह साल तक बेडरेस्ट पर रहीं। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे मुंह से पेंसिल पकड़कर लिखना और ड्रॉ करना सीखा। गोरखपुर की रहने वाली हेमा परिवार से दूर वाराणसी में रहकर पढ़ाई कर रही हैं और अपनी कला के जरिए अलग पहचान बना रही हैं। हेमा बताती हैं कि मां की आंखों में आंसू देखकर उन्होंने तय कर लिया था कि वह अपनी जिंदगी को किसी की बेबसी की कहानी नहीं बनने देंगी। मां की उदासी ने उन्हें अपने काम खुद करना सीखने की प्रेरणा दी। इसी हौसले के साथ उन्होंने अपनी परिस्थितियों को स्वीकार किया और पेंटिंग को अपनी पहचान बनाने का रास्ता चुना। छत पर खेलते समय लगा करंट, बदल गई जिंदगी हेमा बताती हैं कि यह हादसा बचपन में हुआ था। उनके छत के उपर से हाई बोल्टेज तार लटक रहा था। वह छत पर खेल रही थी। उसने लोहे की रौड़ उठाई और करंट ने उसे अपनी ओर खींच लिया। डॉक्टर ने कहा कि बच्ची के दोनों हाथ पैर कटाने होगे। परिवार उन्हें इलाज के लिए दिल्ली ले गया। डॉक्टरों ने हाथ बचाने में असमर्थता जताई, लेकिन परिवार ने आखिरी समय तक कोशिश की। हेमा कहती हैं कि उनके माता-पिता ने कभी हार नहीं मानी। जब इलाज के दौरान उन्होंने मां की आंखों में अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंता और आंसू देखे, तो उन्होंने भी तय किया कि वह हार नहीं मानेंगी। वह कहती हैं, “घरवालों ने हार नहीं मानी, तो मैं उनकी संतान होकर कैसे हार मान सकती थी।” इलाज के बाद उन्होंने अपनी परिस्थितियों को स्वीकार किया और धीरे-धीरे अपने जीवन को नए तरीके से जीना शुरू किया। स्कूल में दूसरे बच्चों को लिखते देखा, तब सीखी पेंसिल पकड़ना हेमा के लिए हाथों के बिना पढ़ाई करना आसान नहीं था। वह बताती हैं कि परिवार ने मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद उन्हें स्कूल भेजना जारी रखा। वह बिना बैग के स्कूल जाती थी। उनकी मां ने स्कूल से झूठ बोला था कि डॉक्टर्स ने बोला है कि बच्ची को स्कूल भेजना है। स्कूल में जब उन्होंने दूसरे बच्चों को लिखते देखा, तो उनके मन में भी लिखने की इच्छा हुई। उन्होंने एक पेंसिल ली और उसे मुंह से पकड़ने की कोशिश की। शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती पेंसिल और ब्रश को सही तरीके से पकड़ना सीखना था। अभ्यास करते-करते उन्होंने मुंह से लिखना और ड्रॉ करना शुरू कर दिया। यही अभ्यास आगे चलकर उनकी पेंटिंग का आधार बना। हेमा बताती हैं कि जब उन्होंने पहली बार मुंह से ड्रॉ करना शुरू किया, तो उनके भीतर एक अलग ऊर्जा महसूस हुई। उन्हें लगा कि वह इस काम में और बेहतर कर सकती हैं। इसके बाद उन्होंने पेंटिंग करना जारी रखा और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। नौकरी नहीं, अपनी पहचान बनाना चाहती थीं हेमा कहती हैं कि वह किसी के अधीन नौकरी करने के बजाय अपनी अलग पहचान बनाना चाहती थीं। उनकी छोटी-सी ख्वाहिश थी कि लोग उन्हें उनके काम से जानें। इसी सोच ने उन्हें पेंटिंग की ओर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। पिछले दो-तीन वर्षों से वह लगातार पेंटिंग कर रही हैं। पढ़ाई के साथ अपनी कला को निखारने में जुटी हेमा अब तक कई पेंटिंग बना चुकी हैं। उनकी एक पेंटिंग जापान तक पहुंची। हेमा के मुताबिक, एक वेबसाइट के माध्यम से उनका संपर्क हुआ था। उन्होंने अपनी पेंटिंग की तस्वीर ईमेल से भेजी। इसके बाद उन्हें बताया गया कि उनकी पेंटिंग चयनित हुई है। फिर उन्होंने कूरियर के माध्यम से पेंटिंग जापान भेजी। परिवार से दूर रहकर पूरी कर रहीं पढ़ाई गोरखपुर से आने वाली हेमा पढ़ाई के लिए वाराणसी में रह रही हैं। परिवार से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई और अपनी दिनचर्या संभालना उनके लिए आसान नहीं है। वह बताती हैं कि रोजमर्रा के कई कामों में उन्हें मदद की जरूरत पड़ती है। ऐसे में उनकी रूममेट उनका काफी साथ देती हैं। दोनों के बीच ऐसा रिश्ता बन गया है, जिसमें बहन, दोस्त और सीनियर-जूनियर के रिश्ते का अपनापन एक साथ नजर आता है। हेमा कहती हैं कि उनकी रूममेट का सहयोग उन्हें वाराणसी में सहज महसूस कराता है। परिवार से दूर रहकर पढ़ाई जारी रखने और अपने सपनों पर काम करने में यह साथ उनके लिए काफी अहम है। सीनियर्स से सीखकर आगे बढ़ रही हैं हेमा अपनी पेंटिंग को बेहतर बनाने के लिए सीनियर्स से सीखती हैं। वह उनके काम को देखती हैं, उनसे बातचीत करती हैं और उनकी कल्पनाओं से प्रेरणा लेती हैं। उनके मुताबिक, सीनियर्स का मार्गदर्शन उन्हें नए विचारों और बेहतर काम की दिशा देता है। वह अपनी कला को लगातार आगे बढ़ाना चाहती हैं।

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