प्रयागराज के अलोपशंकरी शक्तिपीठ में नहीं है माता की मूर्ति:यहां पालने की होती है पूजा, जानिए माता सती से जुड़ा इसका पौराणिक इतिहास
संगम नगरी प्रयागराज में आस्था का एक ऐसा अनोखा केंद्र है, जिसका वर्णन हमारे पुराणों में प्रमुखता से मिलता है। नवरात्रि के पावन अवसर पर, अलोपशंकरी शक्तिपीठ के महंत और महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव यमुना पुरी जी ने इस मंदिर के उद्भव और 51 शक्तिपीठों से जुड़े इसके गहरे इतिहास पर विस्तार से जानकारी दी। यह मंदिर अपनी एक अनूठी परंपरा के लिए विख्यात है, यहां माता की कोई मूर्ति या प्रतिमा नहीं है, बल्कि देवी की पूजा एक वेदी और पालने के रूप में की जाती है। राजा दक्ष का यज्ञ और सती का आत्मदाह महंत यमुना पुरी जी ने पौराणिक कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि हरिद्वार स्थित कनखल नगरी प्रजापति दक्ष की राजधानी थी। उनकी पुत्री माता सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। भगवान शिव के मना करने के बावजूद, माता सती बिना निमंत्रण के अपने पिता के घर चली गईं। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि यज्ञ में न तो भगवान शिव के लिए कोई आसन है और न ही आहुतियां निर्धारित की गई हैं। इसके अलावा, राजा दक्ष ने भगवान शिव के प्रति अशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया। अपने पति के इस अपमान से आहत होकर और उनकी आज्ञा की अवहेलना का पश्चाताप करते हुए, माता सती ने योगाग्नि में अपनी देह का त्याग कर दिया। भगवान शिव का वैराग्य और शक्तिपीठों की स्थापना जब भगवान शिव को इस दुखद घटना का पता चला, तो उन्होंने वीरभद्र और भद्रकाली के माध्यम से दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करवा दिया। इसके बाद, शिव जी ने सती के मृत शरीर को अपने कंधों पर उठा लिया और अत्यंत उदासीन भाव से भ्रमण करने लगे। जब सृष्टि का प्रमुख ही उदासीन हो गया, तो पूरे ब्रह्मांड में उदासीनता छा गई और सृष्टि का संचालन संकट में आ गया। सृष्टि को इस संकट से उबारने और शिव जी को इस मोह से मुक्त करने के लिए, भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के अंगों को काटना शुरू किया। धरती पर जहां-जहां माता सती के अंग गिरे, वे स्थान 'शक्तिपीठ' बन गए। हर शक्तिपीठ की रक्षा के लिए भगवान शिव स्वयं भैरव के रूप में वहां स्थापित हुए। अलोपशंकरी में गिरा था माता का दाहिना पंजा महंत जी ने बताया कि प्रयागराज के इस पावन स्थान पर माता सती के दाहिने हाथ का पंजा (करांगुलियां) गिरा था। इस शक्तिपीठ के भैरव का नाम 'भव' है। अलोपशंकरी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। यहां एक वेदी और पालने के रूप में भगवती के स्वरूप की आराधना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि सभी शक्तिपीठों की यात्रा के बाद अंतिम आशीर्वाद इसी स्थान पर प्राप्त होता है। सुख-समृद्धि और संस्कारों का केंद्र श्री महाविद्या के पीठों में शामिल यह शक्तिपीठ अपने भक्तों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। यहां दर्शन करने वालों में नवविवाहित जोड़ों की संख्या काफी होती है, जो अपने दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि की कामना लेकर माता का आशीर्वाद लेने आते हैं। इसके अलावा, परिवार में प्रथम संतान के जन्म के बाद बच्चों का पहला मुंडन संस्कार भी यहीं कराया जाता है। मुंडन के बाद बच्चे को विशेष रूप से मंदिर के पालने से छुआया जाता है, ताकि भगवती का आशीर्वाद उस बच्चे पर आजीवन बना रहे। महंत यमुना पुरी जी ने बताया कि इस दरबार में व्यक्ति की जैसी श्रद्धा और भावना होती है, माता उसी के अनुसार उसे सुख, समृद्धि और प्रफुल्लता का आशीर्वाद देती हैं।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)