प्रयागराज के दारागंज में काली स्वांग...VIDEO:ढोल-नगाड़ों के साथ आरती उतारी गई, मां काली के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु
तीर्थराज प्रयाग की सुप्रसिद्ध एवं सदियों पुरानी लोक परंपरा का प्रतीक 'दारागंज का काली स्वांग' शनिवार को पूरी श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक उल्लास के साथ संपन्न हो गई। स्वांग के समापन के साथ ही दारागंज क्षेत्र में कई दिनों से बना भक्ति और शक्ति की उपासना का माहौल अपने चरम पर पहुंच गया। मां भगवती के रौद्र और कल्याणकारी स्वरूप के दर्शन पाने के लिए दूर-दराज से आए हजारों श्रद्धालु सड़कों पर उमड़ पड़े। दारागंज की ऐतिहासिक रामलीला और दशहरा उत्सव के अभिन्न अंग के रूप में आयोजित होने वाले काली स्वांग में मां काली का स्वरूप धारण करने वाले कलाकार ने पारंपरिक वेशभूषा, मुंडमाला, हाथों में खड्ग और त्रिशूल लेकर नगर भ्रमण किया। ढोल-नगाड़ों की थाप, शंखनाद और डमरुओं की गूंज के बीच जैसे ही मां काली का स्वरूप धारण कर सड़कों पर निकली, पूरा क्षेत्र "जय काली, कल्याणी काली" के जयघोष से गुंजायमान हो उठा। काली स्वरूप के साथ भगवान शिव, भैरव, हनुमान और अन्य देवी-देवताओं के साथ-साथ भूत-प्रेत और दैत्यों का स्वांग रचे कलाकारों के बीच का अभिनय भी आकर्षण का मुख्य केंद्र रहा। राक्षसों का संहार और शक्ति के प्राकट्य का सजीव मंचन देख श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। समापन यात्रा के दौरान दारागंज के प्रमुख मार्गों, गलियों और चौराहों पर स्थानीय नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा पुष्पवर्षा कर मां के स्वरूप की भव्य आरती उतारी गई। श्रद्धालुओं ने सुख-समृद्धि, रोग-मुक्ति और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा की कामना करते हुए मां के चरणों में शीश नवाया और चरणामृत व प्रसाद ग्रहण किया। घरों की छतों और छज्जों से महिलाओं व बच्चों ने फूलों की वर्षा कर स्वागत किया। दारागंज का यह स्वांग केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रयागराज की गंगा-जमुनी तहजीब और समृद्ध लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। मान्यता है कि यह परंपरा क्षेत्र को सभी अनिष्टों से मुक्त रखने और बुराई पर अच्छाई की विजय के संदेश के साथ निभाई जाती है। समापन के अवसर पर पुलिस एवं प्रशासनिक अमला पूरी तरह मुस्तैद रही।
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