प्रयागराज की लॉ यूनिवर्सिटी के वित्त-नियंत्रक भी मेडिकल-लीव पर गए:रजिस्ट्रार और विधि विभागाध्यक्ष पहले से छुट्टी पर, कुलपति पर तानाशाही का आरोप

Oct 05, 2026 - 20:24
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प्रयागराज की लॉ यूनिवर्सिटी के वित्त-नियंत्रक भी मेडिकल-लीव पर गए:रजिस्ट्रार और विधि विभागाध्यक्ष पहले से छुट्टी पर, कुलपति पर तानाशाही का आरोप
अपनी स्थापना के शुरुआती दौर से ही विवादों के घेरे में आई प्रयागराज की डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (RPNLU)में प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय संकट अब और गहरा गया है। एक के बाद एक प्रमुख अधिकारियों के लंबे मेडिकल लीव पर जाने से विश्वविद्यालय की व्यवस्था लड़खड़ा गई है। रजिस्ट्रार वरुण पांडेय और विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा के बाद अब वित्त नियंत्रक रविंद्र सिंह आर्य भी 4 अक्टूबर से एक महीने के मेडिकल लीव पर चले गए हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि संस्थान के अस्तित्व में आने के महज दो वर्षों के भीतर यह 10वें वित्त नियंत्रक हैं, जो इस पद को छोड़कर या तो हटे हैं या अवकाश पर गए हैं। ऐसे में यूनिवर्सिटी की वित्तीय व्यवस्था पर तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। फिर भी शासन ने अब तक यहां के वित्तीय मामलों को संज्ञान में नहीं लिया और जांच शुरू नहीं हुई। एक महीना भी नहीं टिके 10वें वित्त नियंत्रक 7 सितंबर 2026 को ही रविंद्र सिंह आर्य को गोरखपुर से इस यूनिवर्सिटी में स्थानांतरित किया गया था। उन्होंने यहां एक महीना भी पूरा नहीं किया और लंबे अवकाश पर चले गए। उनके इस तरह अचानक कार्य से हटने के कारण यूनिवर्सिटी में गंभीर वित्तीय संकट पैदा हो गया है। वित्त नियंत्रक के अवकाश पर होने के कारण कर्मचारियों और शिक्षकों का वेतन अटक गया है। इसके अलावा तमाम बिल पर भुगतान रुक गया है। सबसे बड़ी समस्या नवनियुक्त असिस्टेंट प्रोफेसरों के वेतन को लेकर खड़ी हो गई है, जिनकी भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर पहले से ही प्रमुख सचिव स्तर पर उच्चस्तरीय जांच चल रही है। अब तक इनको एक बार भी वेतन नहीं मिला। मेडिकल लीव पर गए वित्त नियंत्रक ने अपना फोन भी बंद कर लिया है, जिससे प्रशासनिक स्तर पर भी उनसे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। फाइलों पर हस्ताक्षर करने से क्यों बच रहे अधिकारी? विश्वविद्यालय के गलियारों में चर्चा है कि एक के बाद एक वित्त नियंत्रकों का इस तरह टिक न पाना किसी बड़े 'वित्तीय खेल' की ओर इशारा करता है। हाल ही में कार्यभार संभालने वाले वित्त नियंत्रक ने अपने करीबियों से साझा किया था कि वह पहले भी एक मामले में दो साल तक निलंबित रह चुके हैं। ऐसे में वह किसी भी संदेहास्पद या मनमाने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर अपनी नौकरी दोबारा जोखिम में नहीं डालना चाहते। इससे पहले यहां पर वित्त नियंत्रण रहे सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कुलपति डॉ ऊषा टंडन का 70,000 रुपए का एकेडमिक रोक दिया था। उन्होंने कहा था कि कुलपति को वेतन के अतिरिक्त एकेडमिक बिल नहीं दिया जा सकता है। यूनिवर्सिटी के शिक्षकों का आरोप है कि यहां आने वाले अधिकारी किसी भी संदेहास्पद वित्तीय फाइल पर साइन करने से घबरा रहे हैं, क्योंकि संस्थान में मनमाने ढंग से बिलों की स्वीकृति और सरकारी धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लग रहे हैं। रजिस्ट्रार और विधि विभागाध्यक्ष ने लगाए तानाशाही के आरोप इससे पहले मेडिकल लीव पर गए रजिस्ट्रार वरुण पांडेय और विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा ने कुलपति डॉ. उषा टंडन पर खुलकर तानाशाही के गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना है कि यूनिवर्सिटी में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हो रही हैं और कार्यपरिषद की बैठकों में मनमुताबिक प्रस्ताव पास करवाए जा रहे हैं। सामानों की खरीदारी अत्यधिक और बाजार मूल्य से अधिक दरों पर की जा रही है, जिसके कारण कोई भी वित्त नियंत्रक यहां टिक नहीं पा रहा है। इन तमाम व्यवस्थागत कमियों और विरोध के चलते, कुलपति ने विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा को पिछले दिनों निलंबित भी कर दिया था। किराए के भवन में चल रही यूनिवर्सिटी प्रयागराज की इस प्रतिष्ठित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की शुरुआत वर्ष 2024 में हुई थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके चेयरमैन हैं और इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस चांसलर है। दो साल बीत जाने के बाद भी यूनिवर्सिटी का अपना खुद का भवन नहीं बन पाया है और यह वर्तमान में एक किराए के भवन में संचालित हो रही है। शुरुआत से ही कुलपति की कार्यशैली को लेकर शिक्षकों, कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। इस पूरे गंभीर घटनाक्रम पर जब यूनिवर्सिटी के पीआरओ प्रकाश त्रिपाठी से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई।

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