रासुका नजरबंदी आदेश रद्द, तुरंत रिहाई का आदेश:बुलंदशहर के मामले में हाईकोर्ट ने कहा यह कानून का दुरुपयोग है
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुलंदशहर के चर्चित यूरिया कालाबाजारी मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत की गई निरुद्धि आदेश को रद्द करते हुए सभी याचियों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने यह आदेश मोहम्मद हारून की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तथा तीन अन्य सह-अभियुक्तों रामेंद्र सिंह उर्फ गुड्डू, यश राघव और हरेंद्र प्रताप सिंह की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने दिया। क्या है मामला जानिये 10 मई 2026 को अनूपशहर (बुलंदशहर) पुलिस ने चेकिंग के दौरान तीन ट्रकों से इफको यूरिया की 525-525 बोरियाँ जब्त की थीं। आरोप था कि पीसीएफ बफर गोदाम के अधिकारियों की मिलीभगत से इस यूरिया को खुले बाजार में ऊँचे दामों पर बेचने और कालाबाजारी के उद्देश्य से ले जायी जा रही थी। इस आपराधिक मामले के आधार पर 23 मई 2026 को जिलाधिकारी बुलंदशहर ने रासुका के तहत निरुद्धि आदेश जारी किए थे। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची अधिवक्ता ने दलील दी कि कालाबाजारी और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा डालने के मामलों के लिए 'कालाबाजारी निवारण और आवश्यक वस्तु प्रदाय अधिनियम,' एक विशेष कानून है। ऐसे में सामान्य कानून यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 3(2) के तहत कार्रवाई करना कानूनी रूप से गलत है। यह विधिक सिद्धांत 'सामान्य कानून, विशेष कानून को बेअसर नहीं करता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब किसी विशिष्ट अपराध के लिए विशेष कानून मौजूद है, तो उसी के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विशेष अधिनियम के तहत अधिकतम निरुद्धि की अवधि केवल छह महीने होती है, जबकि रासुका में यह अवधि एक वर्ष है। सरकार ने महज छह महीने की जगह एक साल तक जेल में रखने की नीयत से रासुका के तहत गलत और दुर्भावनापूर्ण ढंग से कार्रवाई की है। कोर्ट ने कहा यह कानून का दुरुपयोग है कोर्ट ने कहा कि आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी से जुड़े मामलों में विशेष कानून लागू होता है, न कि रासुका । अदालत ने माना कि यदि कालाबाजारी रोकने के विशेष कानून के बजाय रासुका का सहारा लेकर किसी व्यक्ति को एक साल तक बंद रखा जाता है, तो यह कानून का दुरुपयोग है।
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