तीन साल बाद बरेका में फिर एक सिर वाला रावण:70 फीट का है पूर्वांचल का सबसे ऊंचा रावण, मुस्लिम परिवार सालों कर रहा निर्माण

Oct 19, 2026 - 18:49
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तीन साल बाद बरेका में फिर एक सिर वाला रावण:70 फीट का है पूर्वांचल का सबसे ऊंचा रावण, मुस्लिम परिवार सालों कर रहा निर्माण
बरेका स्टेडियम में दशहरे पर होने वाले रावण दहन की तैयारियां पूरी हो गई हैं। रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले बनकर तैयार हैं। सोमवार को तीनों पुतलों को स्टेडियम में खड़ा कर दिया गया। इस बार तीनों पुतलों की ऊंचाई पिछले साल के मुकाबले पांच-पांच फीट बढ़ाई गई है। रावण 70 फीट, कुंभकरण 65 फीट और मेघनाद का पुतला 60 फीट ऊंचा है। खास बात यह है कि तीन साल बाद बरेका में फिर एक सिर वाला रावण बनाया गया है। पिछले तीन साल से दस सिर वाला रावण बनाया जा रहा था, लेकिन उसके संतुलन में परेशानी आ रही थी। पिछले साल तेज बारिश के कारण पुतला और ज्यादा असंतुलित हो गया था। इसे देखते हुए इस बार फिर परंपरागत रूप से एक सिर वाला रावण बनाया गया है। बरेका के पीआरओ राजेश कुमार के मुताबिक, इस बार पुतलों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर भी ध्यान दिया गया है। रंगीन कागज की जगह कपड़े का इस्तेमाल किया गया है, ताकि पुतलों का स्वरूप आकर्षक होने के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को भी कम किया जा सके। तीन साल बाद फिर एक सिर वाला रावण बरेका में बने दशान्नन को एक सिर है। पीआरओ राजेश कुमार के मुताबिक बरेका में परंपरागत रूप से एक सिर वाला रावण बनाया जाता रहा है। पिछले तीन साल से दस सिर वाला रावण बनाया जा रहा था, लेकिन उसका संतुलन बनाए रखने में परेशानी हो रही थी। पिछले साल तेज बारिश के कारण पुतला और ज्यादा असंतुलित हो गया था। इसे देखते हुए इस बार फिर एक सिर वाला रावण बनाया गया है। बरेका के पीआरओ राजेश कुमार ने बताया कि यहां एक सिर वाला रावण बनाने की परंपरा रही है। पिछले कुछ वर्षों में दस सिर वाला पुतला बनाया गया, लेकिन संतुलन की समस्या को देखते हुए इस बार परंपरागत स्वरूप अपनाया गया है। रावण 70, कुंभकरण 65 और मेघनाद 60 फीट का इस बार रावण का पुतला 70 फीट ऊंचा बनाया गया है। कुंभकरण का पुतला 65 फीट और मेघनाद का 60 फीट ऊंचा है। राजेश कुमार के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में तीनों पुतलों की ऊंचाई पांच-पांच फीट बढ़ाई गई है। इनके निर्माण में बांस, सुतली, बांस की फट्टी और कागज का इस्तेमाल किया गया है। केमिकल वाले रंगों का नहीं किया इस्तेमाल इस बार पुतलों को सजाने में पर्यावरण का ध्यान रखा गया है। राजेश कुमार के मुताबिक पुतलों पर केमिकल वाले रंगों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके बजाय कपड़े से सजावट की गई है, जिससे पुतलों का स्वरूप आकर्षक दिखे और दहन के दौरान पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सके। डेढ़ महीने में तैयार होते हैं पुतले रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले तैयार करने में करीब डेढ़ महीने का समय लगता है। इन्हें बनाने में 20 कारीगरों मिलकर ये पुतला बनाया है। राजेश कुमार ने बताया कि पहले स्थानीय निवासी बाबू खां पुतले बनाते थे। अब उनके परिवार की अगली पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। शमशाद और उनका परिवार पुतलों के निर्माण का काम कर रहा है। बरेका के निर्माण से पहले से हो रहा रावण दहन बरेका में रावण दहन की परंपरा बरेका निर्माण से पहले से की जा रही है। बरेका का निर्माण 1956 में हुआ था। लेकिन जब प्रशासन को पता चला कि यहां रावण दहन किया जाता है तो बरेका ने भी उस परंपरा को जारी रखा। ढाई घंटे की रामलीला के बाद होगा रावण दहन बरेका में रावण दहन के साथ रामलीला के रूपक का मंचन भी किया जाता है। इसमें राम के वनगमन से लेकर रावण वध तक की कथा दिखाई जाती है। यह मंचन करीब ढाई घंटे का होता है। इसके बाद आतिशबाजी और रावण दहन का कार्यक्रम होगा। इस तरह दर्शकों को एक ही आयोजन में रामलीला, आतिशबाजी और रावण दहन देखने का अवसर मिलेगा। 60 से 80 हजार लोगों के पहुंचने का अनुमान आयोजकों के मुताबिक, रावण दहन देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस बार करीब 60 से 80 हजार लोगों के आने का अनुमान है। भीड़ नियंत्रित करने के लिए तीन प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। अलग-अलग रंग के पास के आधार पर प्रवेश की व्यवस्था होगी। परिसर में लोगों के बैठने के लिए अलग-अलग स्थान भी तय किए गए हैं। सात गेट से निकासी की व्यवस्था राजेश कुमार के अनुसार, परिसर में कुल सात गेट हैं। तीन गेट से प्रवेश कराया जाएगा, जबकि अन्य गेट निकासी के लिए खुले रहेंगे। भीड़ प्रबंधन में जिला प्रशासन, पुलिस, रेलवे सुरक्षा बल, सिविल डिफेंस और स्काउट-गाइड के स्वयंसेवक तैनात रहेंगे। इसका उद्देश्य भीड़ को एक जगह जमा होने से रोकना और लोगों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है। चारपहिया वाहनों के प्रवेश पर रहेगी रोक आयोजन स्थल के आसपास जाम और भीड़ की समस्या न हो इसलिए चारपहिया वाहनों को रोका जाएगा। हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है बरेका का रावण बरेका के रावण की खास पहचान यह भी है कि इसे बनाने का काम शमशाद और उनका परिवार करता है। आयोजकों के मुताबिक, यह परंपरा हिंदू-मुस्लिम एकता और काशी की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। अलग-अलग समुदायों के लोग इस आयोजन में भाग लेते हैं और इसे सफल बनाने में सहयोग करते हैं।

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